Skip to main content

रूस की प्राध्यापक डॉ इंदिरा ग़ाज़ीएवा और अध्येता साईं मेंखोनोशिना का सारस्वत सम्मान और अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ विश्वविद्यालय में

रूस और भारत गहरे जुड़े हैं सांस्कृतिक और वैचारिक आदान प्रदान के माध्यम से - डॉ ग़ाज़ीएवा

हिंदी - रूसी साहित्य के परस्पर अनुवादों ने दोनों की संस्कृतियों के बीच सेतु बनाने का विलक्षण कार्य किया है – प्रो शर्मा

सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय उज्जैन के वाग्देवी भवन में रूसी साहित्य और अनुवाद की परम्परा पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी और मॉस्को की प्राध्यापक डॉ इंदिरा ग़ाज़ीएवा का सारस्वत सम्मान  समारोह आयोजित किया गया। संगोष्ठी में रूस से आए अतिथियों सहित कुलानुशासक एवं विभागाध्यक्ष प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा, प्रो जगदीश चंद्र शर्मा आदि ने विचार व्यक्त किए। 

मॉस्को यूनिवर्सिटी ऑफ ह्यूमैनिटीज, रूस की हिंदी प्राध्यापक प्रो. इंदिरा ग़ाज़ीएवा ने अपने उद्बोधन में कहा कि रूसी और हिंदी भाषा के साहित्य में अनेक समानता है। रूस और भारत अनेक दशकों से साहित्यिक अनुवाद के साथ ही सांस्कृतिक और वैचारिक आदान प्रदान के माध्यम से गहरे जुड़े हैं। भारत की संस्कृति और हिंदी से उनके छात्रों का गहरा अनुराग है। रूस में अनेक विद्यार्थी भारतीय संस्कृति से जुड़ने के लिए हिन्दी सीख रहे हैं। उज्जैन के साहित्य जगत और हिंदी विभाग से जुड़ना उनके लिए सौभाग्य की बात है। भविष्य में रूस और हिंदी अध्ययनशाला के  विद्यार्थियों के साथ मिल कर सेमिनार आयोजित किए जाएंगे, जिनमें हिंदी और रूसी रचनाकारों के जीवन एवं रचनाओं पर गहन चर्चा होगी।

कुलानुशासक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने कहा कि हिंदी और रूसी साहित्य के परस्पर अनुवादों ने दोनों देशों के साहित्य प्रेमियों और संस्कृतियों के बीच सेतु बनाने का कार्य किया है। टॉल्स्टॉय, पुश्किन, दोस्तोयव्स्की और गोर्की जैसे लेखकों के अनुवाद ने भारतीय पाठकों को रूसी साहित्य की गहराई, मानवीय संवेदनाओं, यथार्थवाद और प्रकृतिराग से परिचित कराया। ये अनुवाद सांस्कृतिक आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। प्रो शर्मा ने पुश्किन की कविताओं के अंशों का पाठ करते हुए उन्हें भावनात्मक गहराई, आत्म साक्षात्कार और व्यापक मानवीय अनुभव का कवि निरूपित किया।

मॉस्को से पधारीं अध्येता साईं मेंखोनोशिना ने कहा कि उनका जन्म भारत में ही हुआ और नौ वर्ष की आयु तक वे यही रहीं और स्कूली शिक्षा प्राप्त की। पुनः भारत आकर उन्हें अच्छा लगा। यहाँ आना उनके लिए अपने घर आने जैसा है।

प्रो. जगदीशचंद्र शर्मा ने अपने उद्बोधन में रूसी साहित्य और उनके हिन्दी अनुवाद पर चर्चा करते हुए कहा कि हिंदी में अनुवाद की बात आती हैं तो हमें कुछ अच्छे अनुवादकों के नाम याद आते हैं मदनलाल मधु, हरिवंश राय बच्चन, निर्मल वर्मा, रामविलास शर्मा आदि। उन्होंने अनेक रूसी रचनाओं के हिंदी अनुवाद कर भारतीय पाठकों को उनसे परिचित कराया। 

अतिथियों को अंगवस्त्र, मौक्तिक माल और साहित्य अर्पित कर उनका सारस्वत सम्मान किया गया। हिंदी अध्ययनशाला और ललित कला अध्ययनशाला द्वारा आयोजित सम्मान एवं संगोष्ठी सत्र में प्रो अंजना पांडे, प्रो बी के आंजना, रूसी शिक्षिका निशा चौरसिया डॉ अजय शर्मा, एल एन सिंहरोड़िया, डॉ महिमा मरमट, शोधार्थी पूजा परमार, अजय सूर्यवंशी, राकेश, सुजल जायसवाल, सतीश कुमार पटेल, लेखन सिंह लोधी, रामसुखेन यादव, इंद्रेश, रणधीर आठिया, शैलेश निषाद आदि सहित अनेक विद्यार्थियों ने भाग लिया। 

संचालन शोधार्थी पूजा परमार ने किया। आभार प्रदर्शन डॉ अजय शर्मा ने किया।

Comments

मध्यप्रदेश समाचार

देश समाचार

Popular posts from this blog

खाटू नरेश श्री श्याम बाबा की पूरी कहानी | Khatu Shyam ji | Jai Shree Shyam | Veer Barbarik Katha |

संक्षेप में श्री मोरवीनंदन श्री श्याम देव कथा ( स्कंद्पुराणोक्त - श्री वेद व्यास जी द्वारा विरचित) !! !! जय जय मोरवीनंदन, जय श्री श्याम !! !! !! खाटू वाले बाबा, जय श्री श्याम !! 'श्री मोरवीनंदन खाटू श्याम चरित्र'' एवं हम सभी श्याम प्रेमियों ' का कर्तव्य है कि श्री श्याम प्रभु खाटूवाले की सुकीर्ति एवं यश का गायन भावों के माध्यम से सभी श्री श्याम प्रेमियों के लिए करते रहे, एवं श्री मोरवीनंदन बाबा श्याम की वह शास्त्र सम्मत दिव्यकथा एवं चरित्र सभी श्री श्याम प्रेमियों तक पहुंचे, जिसे स्वयं श्री वेद व्यास जी ने स्कन्द पुराण के "माहेश्वर खंड के अंतर्गत द्वितीय उपखंड 'कौमारिक खंड'" में सुविस्तार पूर्वक बहुत ही आलौकिक ढंग से वर्णन किया है... वैसे तो, आज के इस युग में श्री मोरवीनन्दन श्यामधणी श्री खाटूवाले श्याम बाबा का नाम कौन नहीं जानता होगा... आज केवल भारत में ही नहीं अपितु समूचे विश्व के भारतीय परिवार ने श्री श्याम जी के चमत्कारों को अपने जीवन में प्रत्यक्ष रूप से देख लिया हैं.... आज पुरे भारत के सभी शहरों एवं गावों में श्री श्याम जी से सम्बंधित संस्थाओं...

आधे अधूरे - मोहन राकेश : पाठ और समीक्षाएँ | मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे : मध्यवर्गीय जीवन के बीच स्त्री पुरुष सम्बन्धों का रूपायन

  आधे अधूरे - मोहन राकेश : पीडीएफ और समीक्षाएँ |  Adhe Adhure - Mohan Rakesh : pdf & Reviews मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और कथाकार मोहन राकेश का जन्म  8 जनवरी 1925 को अमृतसर, पंजाब में  हुआ। उन्होंने  पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए उपाधि अर्जित की थी। उनकी नाट्य त्रयी -  आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे भारतीय नाट्य साहित्य की उपलब्धि के रूप में मान्य हैं।   उनके उपन्यास और  कहानियों में एक निरंतर विकास मिलता है, जिससे वे आधुनिक मनुष्य की नियति के निकट से निकटतर आते गए हैं।  उनकी खूबी यह थी कि वे कथा-शिल्प के महारथी थे और उनकी भाषा में गज़ब का सधाव ही नहीं, एक शास्त्रीय अनुशासन भी है। कहानी से लेकर उपन्यास तक उनकी कथा-भूमि शहरी मध्य वर्ग है। कुछ कहानियों में भारत-विभाजन की पीड़ा बहुत सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुई है।  मोहन राकेश की कहानियां नई कहानी को एक अपूर्व देन के रूप में स्वीकार की जाती ...

दुर्गादास राठौड़ : जिण पल दुर्गो जलमियो धन बा मांझल रात - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा

अमरवीर दुर्गादास राठौड़ : जिण पल दुर्गो जलमियो धन बा मांझल रात। - प्रो शैलेन्द्रकुमार शर्मा माई ऐड़ा पूत जण, जेहड़ा दुरगादास। मार मंडासो थामियो, बिण थम्बा आकास।। आठ पहर चौसठ घड़ी घुड़ले ऊपर वास। सैल अणी हूँ सेंकतो बाटी दुर्गादास।। भारत भूमि के पुण्य प्रतापी वीरों में दुर्गादास राठौड़ (13 अगस्त 1638 – 22 नवम्बर 1718)  के नाम-रूप का स्मरण आते ही अपूर्व रोमांच भर आता है। भारतीय इतिहास का एक ऐसा अमर वीर, जो स्वदेशाभिमान और स्वाधीनता का पर्याय है, जो प्रलोभन और पलायन से परे प्रतिकार और उत्सर्ग को अपने जीवन की सार्थकता मानता है। दुर्गादास राठौड़ सही अर्थों में राष्ट्र परायणता के पूरे इतिहास में अनन्य, अनोखे हैं। इसीलिए लोक कण्ठ पर यह बार बार दोहराया जाता है कि हे माताओ! तुम्हारी कोख से दुर्गादास जैसा पुत्र जन्मे, जिसने अकेले बिना खम्भों के मात्र अपनी पगड़ी की गेंडुरी (बोझ उठाने के लिए सिर पर रखी जाने वाली गोल गद्देदार वस्तु) पर आकाश को अपने सिर पर थाम लिया था। या फिर लोक उस दुर्गादास को याद करता है, जो राजमहलों में नहीं,  वरन् आठों पहर और चौंसठ घड़ी घोड़े पर वास करता है और उस पर ही बैठकर बाट...