श्रीमहाकाल महोत्सव के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में हुआ शिव तत्व, श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग और शिवोपासना पर वैश्विक मंथन, देश दुनिया के तीस से अधिक विद्वानों ने व्याख्यान दिए
Ujjain | वीर भारत न्यास एवं श्रीमहाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति द्वारा 14 से 18 जनवरी 2026 तक महाकाल महालोक में श्रीमहाकाल महोत्सव आयोजित किया जा रहा है। इस महोत्सव के अंतर्गत 15 जनवरी, गुरुवार को प्रातः सन्ध्या तक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। शिव तत्त्व और श्रीमहाकाल: पुरातिहास, साहित्य और संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में पर केंद्रित इस संगोष्ठी में दुनिया के दस से अधिक देशों और भारत के बारह से अधिक राज्यों के विद्वानों ने विषय के विविध पक्षों पर प्रकाश डाला।
संगोष्ठी का शुभारंभ आयरलैंड में भारत के महामहिम राजदूत श्री अखिलेश मिश्रा के मुख्य आतिथ्य में हुआ। अध्यक्षता पूर्व कुलपति प्रो बालकृष्ण शर्मा ने की। शुभारम्भ सत्र में पद्मश्री डॉ भगवतीलाल राजपुरोहित, कला मनीषी श्री नर्मदाप्रसाद उपाध्याय, इंदौर, वीर भारत न्यास के सदस्य श्री नरेश शर्मा, पुरातत्वविद डॉ नारायण व्यास, भोपाल, डॉ पूरन सहगल, मनासा, मुख्य समन्वयक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा आदि ने विचार व्यक्त किए।
मुख्य अतिथि आयरलैंड में भारत के माननीय राजदूत श्री अखिलेश मिश्रा ने अपने उद्बोधन में शिवतत्व पर विचार करते हुए कहा कि प्रकृति में जितने तत्व हैं वे शिवमय हैं। शिव समस्त ज्ञान के उद्गम भी और ज्ञाता भी हैं। शिव एक मात्र देव हैं जो निर्गुण भी हैं और सगुण भी। शिव वेदों, पुराणों से चली आ रही सनातन परम्परा के अभिन्न अंग हैं।
पद्मश्री डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित ने अपने उद्बोधन में शिलालेखों के आधार पर कहा कि महाकाल काल का विस्तार है। हमारे शास्त्रों में शिव की अनेक प्रतिमाओं का उल्लेख मिलता है। महाकाल मंदिर परिसर में तीन महत्वपूर्ण शिलालेखों हैं, जिनमें एक में शिव की अर्चना है, एक में मंदिर बनाने वाले कारीगरों के नाम है।
पूर्व कुलपति प्रो बालकृष्ण शर्मा ने अपने उद्बोधन में साहित्य में शिव वर्णन की चर्चा करते हुए कहा कि शिवमहिम्न स्तोत्र में कहा गया है कि हे शिव आप जैसे हैं हम वैसे ही आपको प्रणाम करते हैं। आपके गुणों के कथन से मेरी वाणी पवित्र होती है इसलिए मैं आपका कथन कहूंगा। त्रयी का हमारे शास्त्रों में बहुत महत्व है वेदों की संख्या तीन, त्रिभुवन, वृत्ति तीन, इस तरह सबकी संख्या तीन है।
कला चिंतक श्री नर्मदाप्रसाद उपाध्याय, इंदौर ने अपने उद्बोधन में शिवतत्व के सार की बात करते हुए बताया कि यदि आप लोक के लिए गरल पान कर लें तो आप अमरत्व प्राप्त कर लेते हैं। शिव, महाकाल इसलिए है क्योंकि काल स्वयं उनके सामने विनीत है। शिव कला के अधिष्ठाता है। चिदंबरम् नटराज की शिव मूर्ति में कला की सारी भंगिमाएँ विद्यमान हैं। सृजन और संहार के सेतु हैं शिव।
संगोष्ठी के मुख्य समन्वयक एवं कुलानुशासक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने कहा कि शिवतत्व और शिवोपासना ने विश्व सभ्यता पर व्यापक प्रभाव डाला है। समस्त प्रकार के वैपरीत्य को साधने का कार्य शिव के आख्यानों में मिलता है। कम्बोडिया, लाओस, थाईलैंड और इंडोनेशिया से लेकर अफगानिस्तान और ईरान तक शैव परम्परा का प्रभाव मिलता है।
डॉ. ऋषिकेश मिश्रा, टोक्यो जापान ने अपने उद्बोधन में जापान में शिव का कैसा रूप है इस विषय पर बात की। उन्होंने बताया कि शिवतत्व में मूल यह है कि वह एक है। दूसरी संस्कृतियां भोगवादी रही हैं किंतु एकमात्र भारतीय संस्कृति ही है जो आत्मवादी है। वह जगत को परिवर्तनशील मानती है। शिव का जो स्वरूप है, उस पूरे स्वरूप में सामंजस्य है।
डॉ. सदाशिव कुमार द्विवेदी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी ने अपने वक्तव्य में कहा कि भगवान शंकर के आठ नाम, आठ स्वरूप, अष्ट मूर्ति और आठ रूप है। शिव दुनिया के प्रपंच को समाप्त कर उसके सारभूत तत्व को भस्म के रूप में धारण करते हैं। विभिन्न स्वरूप, शिव के विभिन्न अंगों में विद्यमान माने जाते हैं जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि शिवमयी दिखाई देती है।
मॉरीशस के विश्व हिंदी सचिवालय के उप महासचिव डॉ. शुभंकर मिश्रा ने मॉरीशस में शिव की महिमा पर बात की। तमिलनाडु शैव स्थापत्य कला में प्रथम स्थान पर है। मॉरिशस में अनेक शिव मंदिर हैं। वहां के लोग ज्योतिर्लिंग के रूप में भी शिव की उपासना करते हैं। यहां घरों के बाहर शिवमूर्ति अवश्य रूप से होती है। बिहार में शिव को उगना के रूप में जाना जाता है। विद्यापति के साहित्य में शिव विद्यमानभें। जो व्यक्ति अपने इतिहास को भूल जाता है वह अपने भविष्य का निर्माण कभी अच्छे से नहीं कर सकता। भारत और भारत के बाहर भी स्थापत्य कला का बहुत विस्तार हुआ है।
संगोष्ठी में भाग लेने वाले विद्वानों में डॉ रामा तक्षक, नीदरलैंड, डॉ सोमदत्त काशीनाथ, वकोका, मॉरीशस, डॉ आशुतोष द्विवेदी, फिजी, डॉ बीर बहादुर महतो नेपाल, डॉ मीरा सिंह फिलाडेल्फिया यूएसए, डॉ सदाशिवकुमार द्विवेदी वाराणसी, डॉ शुभंकर मिश्रा मॉरीशस, पुरातिहासकार डॉ आर सी ठाकुर महिदपुर, डॉ अजय कुमार झा, जनकपुर नेपाल, डॉ हरिसिंह पाल नई दिल्ली, श्री हरेराम बाजपेयी इंदौर, डॉ नारायण व्यास भोपाल, श्रीमती रितु शर्मा नन्नन पांडे, नीदरलैंड, श्री नर्मदाप्रसाद उपाध्याय इंदौर, डॉ अरुण कुमार उपाध्याय, भुवनेश्वर उड़ीसा, प्रो विरुपाक्ष जड्डीपाल, प्रो केदारनारायण जोशी, प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा उज्जैन, डॉ प्रशांत पुराणिक उज्जैन, डॉ रमण सोलंकी उज्जैन, प्रो शारदा प्रसाद, बिहार, डॉ सुनीता मंडल कोलकाता पश्चिम बंगाल, प्रो जगदीश चंद्र शर्मा, डॉ चिट्टी अन्नपूर्णा चेन्नई तमिलनाडु आदि सम्मिलित थे।
डॉ. प्रशांत पुराणिक ने कहा कि ग्रंथों में शिव के अनेक स्वरूपों और उनकी प्रतिमाओं आदि पर चर्चा की गई है। जिनमें परमार वंश, कल्चुरी कला आदि का बहुत महत्व है।
डॉ. पूरन सहगल ने अपने उद्बोधन में कहा कि शिव नाम के उच्चारण मात्र से प्राणी का कैसे उद्धार होता है यह लोक कथा के माध्यम से बताया। उन्होंने बताया कि लोक साहित्य में किस प्रकार से बात को कहा जाता है। अगर मन में भाव नहीं है तो भक्ति का कोई अर्थ नहीं होता।
डॉ. रमण सोलंकी ने कहा कि महाकाल महोत्सव आज से 2000 हजार साल पहले से चली आ रही परम्परा का अंग है। यह पहले विक्रमादित्य के समय, फिर हर्ष और सिंधिया काल के समय में भी होता था। तीन सौ वर्षों बाद अब माननीय मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने फिर से यह उत्सव मनाना प्रारंभ किया है।
यह जानकारी देते हुए वीर भारत न्यास के न्यासी सचिव श्रीराम तिवारी ने बताया कि संगोष्ठी में आयरलैंड, मॉरीशस, यूएसए, नीदरलैंड, फीजी, जापान, थाईलैंड, श्रीलंका, नेपाल आदि के अलावा भारत के बारह से अधिक राज्यों के विद्वानों ने शैव परम्परा पर विचार प्रकट किए।
संगोष्ठी के तकनीकी सत्रों की अध्यक्षता प्रो केदारनारायण जोशी और डॉ हरेराम वाजपेयी इंदौर ने की। संस्कृत विद्वान डॉ सदानंद त्रिपाठी, डॉ पूजा उपाध्याय, डॉ शुभम शर्मा, डॉ प्रीति पांडेय, डॉ अंजना सिंह गौड़, डॉ महेंद्र पंड्या, डॉ गोपाल कृष्ण शुक्ल, डॉ उपेंद्र भार्गव आदि सहित अनेक शोधकर्ताओं ने शोधपत्रों की प्रस्तुति की। त्रिवेणी कला एवं पुरातत्व संग्रहालय, महाकाल लोक में 15 जनवरी को आयोजित संगोष्ठी में देश - विदेश के विविध क्षेत्रों में शिवोपासना, पुराख्यान, पुरातत्व, इतिहास, शैव दर्शन, शिवपरक साहित्य, वास्तु, मुद्राशास्त्र, शिल्प, चित्र, लोक एवं जनजातीय संस्कृति, परम्परा आदि पर गहन मंथन किया गया। संगोष्ठी में विदेशों से विद्वानों के साथ भारत के राज्यों में उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, केरल, मध्य प्रदेश, झारखंड आदि के विशेषज्ञ विद्वान सम्मिलित थे।
प्रारम्भ में वैदिक मंगलाचरण एवं शिव स्तुति पाठ श्रीमहाकालेश्वर वैदिक शोध संस्थान के बटुकों द्वारा किया गया।
संचालन डॉ प्रीति पांडेय, डॉ अंजना सिंह गौड़ एवं पूजा परमार ने किया। आभार प्रदर्शन प्रो जगदीश चंद्र शर्मा, डॉ रमण सोलंकी एवं डॉ महेंद्र पंड्या ने किया।




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