शब्दों का संयम सिखाती है शमशेर जी की कविता – प्रो जितेंद्र श्रीवास्तव
प्रणय, प्रकृति सौंदर्य और जीवन राग के कवि हैं शमशेर जी - प्रो शर्मा
Ujjain | सम्राट् विक्रमादित्य विश्वविद्यालय, उज्जैन की हिंदी अध्ययनशाला द्वारा प्रेमचंद सृजन पीठ एवं शमशेर साहित्य संस्थान उज्जैन के संयुक्त तत्वावधान में नई कविता आंदोलन और शमशेरबहादुर सिंह पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। आयोजन के मुख्य अतिथि इग्नू नई दिल्ली के कुलसचिव एवं वरिष्ठ कवि - आलोचक प्रो जितेंद्र श्रीवास्तव थे। अध्यक्षता वरिष्ठ विद्वान प्रो आनंदप्रकाश त्रिपाठी, सागर ने की। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता कुलानुशासक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा, गुजरात विद्यापीठ के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो जसवंतभाई डी. पंड्या, अहमदाबाद, छत्रसाल विश्वविद्यालय के विभागाध्यक्ष प्रो बहादुरसिंह परमार, छतरपुर, पूर्व प्राचार्य डॉ जय श्रीवास्तव, पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो हरिमोहन बुधौलिया, ललित कला विभागाध्यक्ष प्रो जगदीश चंद्र शर्मा, प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक श्री मुकेश जोशी ने विचार व्यक्त किए।
मुख्य अतिथि कवि - समालोचक प्रो. जितेंद्र श्रीवास्तव, नई दिल्ली ने अपने उद्बोधन में कहा कि जीवन में संयम कैसे रखें यह तो हमें हर कोई सिखा सकता है। नए कवि के तौर पर कविता में संयम कैसे रखना चाहिए वह मैंने नई कविता के तीन वरिष्ठ कवियों शमशेरबहादुर सिंह, अज्ञेय और केदारनाथ सिंह से सीखा। कविता कैसे की जानी चाहिए, कैसे शब्दों का संयम रखें, नए प्रयोग कैसे करते हैं, यह हमें शमशेरबहादुर सिंह से सीखना चाहिए। वे हिंदी और उर्दू के सेतु थे। कवि का कर्म भाषा विवाद नहीं, कविता का विस्तार करना है।
समालोचक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने कहा कि शमशेर जी की कविताएँ गहरी संवेदना, चित्रात्मक सौंदर्य और सुगठित शिल्प का संगम हैं। वे प्रणय, प्रकृति सौंदर्य और जीवन राग के कवि हैं, जिन्होंने नई कविता आंदोलन को नया मोड़ दिया। उन्होंने बाद की पीढ़ियों के कई कवियों पर प्रभाव डाला। उन्होंने संकेत किया है कि शब्द और उनका सत्य स्वयं ही बोलते हैं, रचनाकार को अलग से कुछ कहने की ज़रूरत नहीं होती।
प्रो. आनंदप्रकाश त्रिपाठी, सागर ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि अपनी परम्परा में शमशेर अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जो किसी वाद, विचार या दुराग्रह से जुड़े नहीं थे। कवि कैसे अपने को विकसित करता है यह शमशेर जी के काव्य में दिखाई देता है। उनके लेखन में काव्यधर्मिता मिलती है। यह आयोजन मेरे लिए सौभाग्य की बात है क्योंकि आज तक मुझे कभी शमशेरबहादुर सिंह को आयोजन के रूप में स्मरण करने का अवसर नहीं मिल पाया।
शमशेर साहित्य संस्थान के निदेशक डॉ. जय श्रीवास्तव ने प्रख्यात कवि श्री शमशेरबहादुर सिंह के जीवन के प्रेरणादायक प्रसंग सुनाए। उन्होंने कहा कि वे बड़े ही उदार और दूसरों को प्रेरित करने वाले व्यक्ति थे। हमें उनके साहित्य से प्रेरणा लेना चाहिए।
प्रो. जसवंत भाई पंड्या, अहमदाबाद ने अपने उद्बोधन में बताया कि कविता करना ही कवि का उद्देश्य नहीं होना चाहिए बल्कि उसमें जीवन बोध होना चाहिए, रचनाधर्मिता होना चाहिए।
प्रो. जगदीश चंद्र शर्मा ने अपने उद्बोधन में शमशेरबहादुर सिंह जी के जीवन के प्रसंग सुनाते हुए बताया कि वे जितने महत्वपूर्ण कवि है, उतने ही बड़े गद्यकार और उतने ही बड़े आलोचक है। उन्हें समझना है तो निराला पर लिखी गई उनकी आलोचनाओं को पढ़ना चाहिए।
प्रारम्भ में अतिथियों ने नई कविता के समर्थ कवि एवं प्रेमचंद सृजन पीठ के प्रथम निदेशक रहे स्व. श्री शमशेरबहादुर सिंह के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की। अतिथियों को अंगवस्त्र और साहित्य भेंट कर उनका सारस्वत सम्मान विभागाध्यक्ष प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा, प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक श्री मुकेश जोशी, शमशेर साहित्य संस्थान के निदेशक श्री जय श्रीवास्तव, प्रो हरिमोहन बुधौलिया एवं प्रो जगदीश चंद्र शर्मा ने किया। अतिथियों द्वारा अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका अक्षरवार्ता एवं कृष्ण बसन्ती का लोकार्पण किया गया। आयोजन में कला मनीषी श्री लक्ष्मीनारायण सिंहरोड़िया, डॉ महिमा मरमट आदि सहित अनेक शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित थे।
कार्यक्रम का संचालन पूजा परमार ने किया और आभार प्रदर्शन प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक श्री मुकेश जोशी ने किया।



Comments