Skip to main content

घुमंतू एवं विमुक्त जातियों के समृद्ध साहित्य, लोक परंपरा और भाषाओं पर शोध की जरूरत – डॉ धर्मेंद्र पारे

विक्रम विश्वविद्यालय की हिंदी अध्ययनशाला में हुआ लोक और जनजातीय साहित्य एवं संस्कृति: अनुसंधान के नए आयाम पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन 

लोक साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए  लोक संस्कृतिविद् डॉ धर्मेंद्र पारे का हुआ सारस्वत सम्मान


उज्जैन। विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन की हिंदी अध्ययनशाला एवं पत्रकारिता और जनसंचार अध्ययनशाला द्वारा  लोक और जनजातीय साहित्य एवं संस्कृति: अनुसंधान के नए आयाम विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। आयोजन के प्रमुख अतिथि वक्ता मध्यप्रदेश आदिवासी बोली विकास अकादमी, भोपाल के निदेशक एवं लोक संस्कृति मनीषी डॉ धर्मेंद्र पारे थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पांडेय ने की। आयोजन में विक्रम विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष एवं कुलानुशासक प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा, प्रो जगदीश चंद्र शर्मा, डॉ उमा गगरानी, मंदसौर, डॉ शशि जोशी, उज्जैन ने संगोष्ठी में विचार व्यक्त किए। 

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ धर्मेंद्र पारे, भोपाल ने कहा कि लोक और जनजातीय साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में शोध कार्य की अपार संभावनाएं हैं। मध्यप्रदेश में पचास से अधिक घुमंतू एवं विमुक्त जातियों के लोग निवास करते हैं।  उनके समृद्ध साहित्य, लोक परंपरा और भाषाओं पर पर्याप्त शोध कार्य की जरूरत है। लोक गाथाओं के अभिप्राय, प्रतीकार्थों पर भी अनुसंधान से अनेक नवीन तथ्य उजागर हो सकते हैं। उन्होंने विक्रम विश्वविद्यालय की हिंदी अध्ययनशाला द्वारा देश के विभिन्न क्षेत्रों के लोक एवं जनजातीय समुदायों की संस्कृति और साहित्य पर किए जा रहे धरातलीय कार्यों की विशेष प्रशंसा की।

अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पांडेय ने कहा कि नए दौर में शोध में गुणवत्ता और मौलिकता वृद्धि आवश्यक है। इसके साथ ही किसी भी क्षेत्र में अनुसंधान के लिए समयबद्धता बहुत जरूरी है। अन्यथा किया गया शोध कार्य अप्रासंगिक हो सकता है। हमें अपनी विरासत पर गर्व होना चाहिए। वर्तमान में लोक एवं जनजातीय समुदायों के सामने अपनी भाषा और संस्कृति को बचाए रखने की चुनौती है। इस दिशा में युवा पीढ़ी और शोधकर्ता सक्रिय हों।

कुलानुशासक प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि लोक एवं जनजातीय संस्कृति और साहित्य ज्ञान और अनुभव के अक्षय स्रोत हैं। लोक भाषाओं के विलुप्त होने से उनमें समाहित विराट ज्ञान से हम वंचित हो जाएंगे। लोक और जनजातीय भाषाएं सदियों से लोक जागरण करती आ रही हैं। उनमें रचित साहित्य, परम्पराएं और संस्कृति पर शोध की नई संभावनाएं उदित हो रही है। लोक साहित्य एवं संस्कृति के नए शास्त्र का निर्माण लोकतंत्र के प्रति गहरी निष्ठा और जागरूकता से सम्भव हुआ है। 

इस अवसर पर लोक एवं जनजातीय साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए वरिष्ठ लोक संस्कृतिविद् डॉ धर्मेंद्र पारे को शॉल, श्रीफल एवं साहित्य भेंट कर उनका सारस्वत सम्मान कुलपति प्रोफेसर अखिलेश कुमार पांडेय, कुलानुशासक प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा एवं उपस्थित जनों ने किया।

आयोजन में डॉ डी डी बेदिया, डॉ प्रतिष्ठा शर्मा,  डॉ सुशील शर्मा, डॉ अजय शर्मा, श्रीमती हीना तिवारी, डॉ श्वेता पंड्या, सूरज त्रिपाठी, सोनल बड़ोले आदि सहित अनेक शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित थे। 

कार्यक्रम का संचालन प्रो जगदीश चंद्र शर्मा ने किया। आभार प्रदर्शन उमा गगरानी, मंदसौर ने किया।

Comments

Popular posts from this blog

आधे अधूरे - मोहन राकेश : पाठ और समीक्षाएँ | मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे : मध्यवर्गीय जीवन के बीच स्त्री पुरुष सम्बन्धों का रूपायन

  आधे अधूरे - मोहन राकेश : पीडीएफ और समीक्षाएँ |  Adhe Adhure - Mohan Rakesh : pdf & Reviews मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और कथाकार मोहन राकेश का जन्म  8 जनवरी 1925 को अमृतसर, पंजाब में  हुआ। उन्होंने  पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए उपाधि अर्जित की थी। उनकी नाट्य त्रयी -  आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे भारतीय नाट्य साहित्य की उपलब्धि के रूप में मान्य हैं।   उनके उपन्यास और  कहानियों में एक निरंतर विकास मिलता है, जिससे वे आधुनिक मनुष्य की नियति के निकट से निकटतर आते गए हैं।  उनकी खूबी यह थी कि वे कथा-शिल्प के महारथी थे और उनकी भाषा में गज़ब का सधाव ही नहीं, एक शास्त्रीय अनुशासन भी है। कहानी से लेकर उपन्यास तक उनकी कथा-भूमि शहरी मध्य वर्ग है। कुछ कहानियों में भारत-विभाजन की पीड़ा बहुत सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुई है।  मोहन राकेश की कहानियां नई कहानी को एक अपूर्व देन के रूप में स्वीकार की जाती हैं। उनकी कहानियों में आधुनिक जीवन का कोई-न-कोई विशिष्ट पहलू उजागर

मालवी भाषा और साहित्य : प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा

MALVI BHASHA AUR SAHITYA: PROF. SHAILENDRAKUMAR SHARMA पुस्तक समीक्षा: डॉ श्वेता पंड्या Book Review : Dr. Shweta Pandya  मालवी भाषा एवं साहित्य के इतिहास की नई दिशा  लोक भाषा, लोक साहित्य और संस्कृति का मानव सभ्यता के विकास में अप्रतिम योगदान रहा है। भाषा मानव समुदाय में परस्पर सम्पर्क और अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। इसी प्रकार क्षेत्र-विशेष की भाषा एवं बोलियों का अपना महत्त्व होता है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति से जुड़े विशाल वाङ्मय में मालवा प्रदेश, अपनी मालवी भाषा, साहित्य और संस्कृति के कारण महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ की भाषा एवं लोक-संस्कृति ने  अन्य क्षेत्रों पर प्रभाव डालते हुए अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। मालवी भाषा और साहित्य के विशिष्ट विद्वानों में डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। प्रो. शर्मा हिन्दी आलोचना के आधुनिक परिदृश्य के विशिष्ट समीक्षकों में से एक हैं, जिन्होंने हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं के साथ-साथ मालवी भाषा, लोक एवं शिष्ट साहित्य और संस्कृति की परम्परा को आलोचित - विवेचित करने का महत्त्वपूर्ण एवं सार्थक प्रयास किया है। उनकी साहित्य

खाटू नरेश श्री श्याम बाबा की पूरी कहानी | Khatu Shyam ji | Jai Shree Shyam | Veer Barbarik Katha |

संक्षेप में श्री मोरवीनंदन श्री श्याम देव कथा ( स्कंद्पुराणोक्त - श्री वेद व्यास जी द्वारा विरचित) !! !! जय जय मोरवीनंदन, जय श्री श्याम !! !! !! खाटू वाले बाबा, जय श्री श्याम !! 'श्री मोरवीनंदन खाटू श्याम चरित्र'' एवं हम सभी श्याम प्रेमियों ' का कर्तव्य है कि श्री श्याम प्रभु खाटूवाले की सुकीर्ति एवं यश का गायन भावों के माध्यम से सभी श्री श्याम प्रेमियों के लिए करते रहे, एवं श्री मोरवीनंदन बाबा श्याम की वह शास्त्र सम्मत दिव्यकथा एवं चरित्र सभी श्री श्याम प्रेमियों तक पहुंचे, जिसे स्वयं श्री वेद व्यास जी ने स्कन्द पुराण के "माहेश्वर खंड के अंतर्गत द्वितीय उपखंड 'कौमारिक खंड'" में सुविस्तार पूर्वक बहुत ही आलौकिक ढंग से वर्णन किया है... वैसे तो, आज के इस युग में श्री मोरवीनन्दन श्यामधणी श्री खाटूवाले श्याम बाबा का नाम कौन नहीं जानता होगा... आज केवल भारत में ही नहीं अपितु समूचे विश्व के भारतीय परिवार ने श्री श्याम जी के चमत्कारों को अपने जीवन में प्रत्यक्ष रूप से देख लिया हैं.... आज पुरे भारत के सभी शहरों एवं गावों में श्री श्याम जी से सम्बंधित संस्थाओं द