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मॉरीशस में हिंदी और भारतीय संस्कृति : अतीत, वर्तमान और संभावनाएँ पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

मॉरीशस में सोना जमीन के नीचे से नहीं, वहाँ उगाया गया है - डॉ गंगू

हमारे गौरव, अस्मिता और संस्कृति की प्रतीक है हिंदी – कुलपति प्रो पांडेय

मॉरीशस में हिंदी और भारतीय संस्कृति : अतीत, वर्तमान और संभावनाएँ पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न


उज्जैन। विक्रम विश्वविद्यालय की हिंदी अध्ययनशाला एवं पत्रकारिता और जनसंचार अध्ययनशाला द्वारा एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। मॉरीशस में हिंदी और भारतीय संस्कृति : अतीत, वर्तमान और संभावनाएँ पर केंद्रित इस संगोष्ठी की अध्यक्षता विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पांडेय ने की। मुख्य अतिथि के रूप में मॉरीशस के विख्यात साहित्यकार डॉ उदयनारायण गंगू, कुलानुशासक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा, श्री धरमदेव गंगू, प्रेमिला सुरतन, राजवीर अवतार, मॉरीशस ने व्याख्यान दिए।
मुख्य अतिथि विख्यात साहित्यकार डॉ उदयनारायण गंगू, मॉरीशस ने कहा कि इतिहास की दृष्टि से पुरातन देश नहीं है। उन्होंने कहा कि वहाँ तूफान बहुत आते हैं, लेकिन वरदान के रूप में भी आते हैं। वहां अनेक दशकों पहले भारतवंशियों को छलावा देकर ले जाया गया था। उन लोगों द्वारा जमीन खोदकर सोना तो नहीं निकला लेकिन लोगों ने खेती कर के सोना उगाया। मॉरीशस एक जंगल के रूप में था जिसे भारतवंशियों ने अपने श्रम से उद्यान के रूप में विकसित कर दिया। वह प्राकृतिक सौंदर्य के लिए आज पूरी दुनिया में विख्यात है। चीनी लोग मॉरीशस में व्यापार करने आए तो वे भी भोजपुरी और हिंदी भाषा में संवाद करने के लिए बाध्य थे। मैं उस धरती को नमन करने आया हूं, जहां से मैंने हिन्दी पढ़ी। 45 वर्ष पूर्व विक्रम विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र रहे श्री गंगू ने मॉरीशस के अनेक हिंदी सेवियों और साहित्यकारों के अविस्मरणीय योगदान पर प्रकाश डाला।

विश्व हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित इस संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पांडेय ने कहा कि मॉरीशस एक लघु भारत है। अतिथि देवो भवः भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र है। भारत से ज्यादा भारतीय संस्कृति का सम्पोषण भारत के बाहर हो रहा है। हिन्दी हमारी मातृभाषा है, वह हमारी गौरव, अस्मिता और संस्कृति का प्रतीक है।

कुलानुशासक प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा ने कहा कि मॉरीशस ने आज भी भारत की संस्कृति और परंपरा को संजोए रखा गया है। विपरीत परिस्थितियों के बीच जीवन यापन करने के बाद भी मॉरीशस वासियों ने अपनी आस्था को नहीं खोया। उनके द्वारा गंगा तालाब बनाया गया, जिसे आज तीर्थ स्थान के रूप में मान्यता प्राप्त है‌। वहां पर स्थापित अनेक देवालय भारतभूमि से जुड़ाव बनाते हैं। मॉरीशस में भारत का हृदय बसता है। बैठका और रामचरितमानस के माध्यम से उन्होंने अपनी परंपराओं को जीवंत रखा। भारतवंशियों के अपार श्रम के कारण अफ्रीका की दूसरी बड़ी अर्थ व्यवस्था मॉरीशस है। मॉरीशस के धरमदेव गंगू ने मॉरीशस की हिंदी पत्रकारिता पर व्याख्यान देते हुए कहा कि भाषा रूपी पात्र में सभी चीजें संस्कृति, परम्परा और धरोहर समाहित हैं। भारत से मॉरीशस गए लोगों के हाथ खाली थे, लेकिन उनके साथ भाषा थी। मॉरीशस के शुरुआती हिंदी अखबार हिंदोस्थान है, मणिलाल डॉक्टर इसके संस्थापक थे। इसी प्रकार के कई समाचार पत्र प्रकाशित हुए, जिनसे हिन्दी का व्यापक प्रसार और विकास हुआ। जागृति समाचार पत्र ने लोगों के बीच जागरूकता फैलाने का काम किया। कवयित्री प्रेमिला सुरतन, मॉरीशस ने मॉरीशस के हिंदी कवियों मुनीश्वरलाल चिंतामणि एवं भुवनेश्वर सोनू की देशभक्ति से ओतप्रोत कविताएं सुनाईं।

मॉरीशस के युवा वक्ता श्री राजवीर अवतार ने मॉरीशसवासियों की भावनाओं से जुड़े भारत पर अपनी बात कहीं। उन्होंने कहा कि मॉरीशस अधूरा शब्द है और भारत उस अधूरे शब्द को पूरा करता है। आधे शब्द के आगे और पीछे वाले शब्द उसे पूरा करते हैं। इसी रूप में हम भारत को देखते हैं। कार्यक्रम में अतिथियों द्वारा शॉल, पुष्पमाल एवं पुस्तक अर्पित कर मॉरीशस के हिंदी सेवियों विख्यात साहित्यकार डॉ उदयनारायण गंगू, धरमदेव गंगू आदि का सम्मान किया गया।

इस अवसर पर डॉ जगदीश चंद्र शर्मा एवं डॉ प्रतिष्ठा शर्मा ने भी अपने विचार व्यक्त किए। कवि डॉ राजेश रावल सुशील एवं श्री संतोष सुपेकर ने अपनी कविताएं सुनाईं। डॉ राजेश रावल सुशील द्वारा संपादित पत्रिका संस्कृति संवाद के नवीन अंक का विमोचन अतिथियों द्वारा किया गया। कार्यक्रम में डॉ सुशील कुमार शर्मा, डॉ अजय शर्मा, हीना तिवारी, डॉ राजेश रावल ‘सुशील’ सहित अनेक शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।


कार्यक्रम का संचालन डॉ जगदीशचंद शर्मा ने किया। आभार डॉ प्रतिष्ठा शर्मा ने माना‌।

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