Skip to main content

विक्रम विश्वविद्यालय में आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी जयन्ती समारोह एवं राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न

उच्च कोटि के विद्वान और आलोचक थे आचार्य त्रिपाठी – प्रो मेनन

आचार्य त्रिपाठी एक संपूर्ण समालोचक हैं – प्रो शर्मा
विक्रम विश्वविद्यालय में आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी जयन्ती समारोह एवं राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न

उज्जैन। विक्रम विश्वविद्यालय के वाग्देवी भवन स्थित हिंदी अध्ययनशाला सभागार में प्रख्यात मनीषी और समालोचक आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी जयंती समारोह एवं उनके आलोचना कर्म और समग्र अवदान पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। समारोह के मुख्य अतिथि महर्षि पाणिनि संस्कृत और वैदिक विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलपति प्रो सी. जी. विजयकुमार मेनन थे। अध्यक्षता विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के प्रभारी कुलपति प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने की। कार्यक्रम में वरिष्ठ संस्कृतविद् डॉ गोविंद गन्धे को आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी सम्मान से अलंकृत किया गया। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि डॉ शिव चौरसिया, डॉ राजपालसिंह जादौन, ग्वालियर, प्रो हरिमोहन बुधौलिया, डॉ जगदीश चंद्र शर्मा, संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ डी डी बेदिया आदि ने आचार्य त्रिपाठी के जीवन, व्यक्तित्व और उनके योगदान पर प्रकाश डाला। साहित्यकार श्री संतोष सुपेकर ने काव्य पाठ किया।

कुलपति प्रो सी. जी. विजयकुमार मेनन ने कहा कि आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी उच्च कोटि के विद्वान और आलोचक थे। उन्होंने साहित्य शास्त्र के सभी प्रमुख पक्षों पर लिखा है। उनके ग्रंथ भारतीय काव्यशास्त्र के उज्ज्वल पक्षों को उजागर करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति उनके कम से कम एक ग्रंथ को एक वर्ष में पूरी तरह पढ़ने का संकल्प अवश्य ले।

विक्रम विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलपति प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने कहा कि आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी की आलोचना व्यापक दृष्टि लिए हुए है। वे एक समावेशी और सम्पूर्ण समालोचक हैं। उसमें भारतीय काव्यशास्त्र, दर्शन, धर्म साधना, भक्ति और ज्ञान विविध आयामों का सार्थक समावेश दिखाई देता है। काव्य के रसात्मक प्रतिमान को उन्होंने सर्वोपरि माना। उन्होंने काव्य चिंतन और सौंदर्यशास्त्र की दृष्टि से भारतीय ज्ञान प्रणाली के उदात्त तत्वों को अनेक दशकों पूर्व नए सिरे से प्रतिष्ठित किया। उन्होंने आलोचना को कृति की मूल संवेदना का साक्षात्कार माना है, जिसका सर्जनात्मक पुनराख्यान आलोचक करता है। वर्तमान दौर में इस आलोचना दृष्टि की प्रासंगिकता बढ़ती जा रही है। वर्ष 2028 से आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी के जन्म शताब्दी वर्ष को बड़े पैमाने पर मनाया जाएगा। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ शिव चौरसिया ने कहा कि आचार्य त्रिपाठी उज्जयिनी की महान विद्वत परंपरा के उज्ज्वलतम नक्षत्र हैं। उन्होंने ऐसे अनेक शिष्यों को तैयार किया, जो उनकी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो हरिमोहन बुधौलिया ने कहा कि आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी ने अनेक पीढ़ियों के युवाओं को प्रेरणा दी। उनके द्वारा बताए गए मूल्यों को जीवन में उतारने की चेष्टा करें। डॉ गोविंद गन्धे ने कहा कि संस्कृत भाषा के क्षेत्र में नए नए प्रयोग हो रहे हैं। हिंदी संस्कृत के बहुत अधिक निकट है। संस्कृत बहुत सरल भाषा है, जिसे बड़ी आसानी से निरन्तर अभ्यास के माध्यम से सीखा जा सकता है।

डॉक्टर जगदीश चंद्र शर्मा ने आचार्य त्रिपाठी के सादगीपूर्ण जीवन से जुड़े अनेक आत्मीय संस्मरण सुनाए। वरिष्ठ संस्कृतविद् डॉ गोविंद गन्धे को अतिथियों द्वारा शॉल, श्रीफल एवं सम्मान राशि अर्पित कर उन्हें आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी सम्मान से अलंकृत किया गया। इस दौरान विद्यार्थी कल्याण संकायाध्यक्ष डॉ एस के मिश्रा, डॉ सुशील शर्मा, श्रीमती हीना तिवारी आदि सहित अनेक साहित्यकार, विभिन्न प्रान्तों के शोधकर्ता, एवं विद्यार्थी उपस्थित थे।

संगोष्ठी का संचालन डॉ जगदीश चंद्र शर्मा ने एवं आभार प्रदर्शन शिक्षा देवी, नई दिल्ली ने किया।

Comments

Popular posts from this blog

आधे अधूरे - मोहन राकेश : पाठ और समीक्षाएँ | मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे : मध्यवर्गीय जीवन के बीच स्त्री पुरुष सम्बन्धों का रूपायन

  आधे अधूरे - मोहन राकेश : पीडीएफ और समीक्षाएँ |  Adhe Adhure - Mohan Rakesh : pdf & Reviews मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और कथाकार मोहन राकेश का जन्म  8 जनवरी 1925 को अमृतसर, पंजाब में  हुआ। उन्होंने  पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए उपाधि अर्जित की थी। उनकी नाट्य त्रयी -  आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे भारतीय नाट्य साहित्य की उपलब्धि के रूप में मान्य हैं।   उनके उपन्यास और  कहानियों में एक निरंतर विकास मिलता है, जिससे वे आधुनिक मनुष्य की नियति के निकट से निकटतर आते गए हैं।  उनकी खूबी यह थी कि वे कथा-शिल्प के महारथी थे और उनकी भाषा में गज़ब का सधाव ही नहीं, एक शास्त्रीय अनुशासन भी है। कहानी से लेकर उपन्यास तक उनकी कथा-भूमि शहरी मध्य वर्ग है। कुछ कहानियों में भारत-विभाजन की पीड़ा बहुत सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुई है।  मोहन राकेश की कहानियां नई कहानी को एक अपूर्व देन के रूप में स्वीकार की जाती हैं। उनकी कहानियों में आधुनिक जीवन का कोई-न-कोई विशिष्ट पहलू उजागर

मालवी भाषा और साहित्य : प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा

MALVI BHASHA AUR SAHITYA: PROF. SHAILENDRAKUMAR SHARMA पुस्तक समीक्षा: डॉ श्वेता पंड्या Book Review : Dr. Shweta Pandya  मालवी भाषा एवं साहित्य के इतिहास की नई दिशा  लोक भाषा, लोक साहित्य और संस्कृति का मानव सभ्यता के विकास में अप्रतिम योगदान रहा है। भाषा मानव समुदाय में परस्पर सम्पर्क और अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। इसी प्रकार क्षेत्र-विशेष की भाषा एवं बोलियों का अपना महत्त्व होता है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति से जुड़े विशाल वाङ्मय में मालवा प्रदेश, अपनी मालवी भाषा, साहित्य और संस्कृति के कारण महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ की भाषा एवं लोक-संस्कृति ने  अन्य क्षेत्रों पर प्रभाव डालते हुए अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। मालवी भाषा और साहित्य के विशिष्ट विद्वानों में डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। प्रो. शर्मा हिन्दी आलोचना के आधुनिक परिदृश्य के विशिष्ट समीक्षकों में से एक हैं, जिन्होंने हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं के साथ-साथ मालवी भाषा, लोक एवं शिष्ट साहित्य और संस्कृति की परम्परा को आलोचित - विवेचित करने का महत्त्वपूर्ण एवं सार्थक प्रयास किया है। उनकी साह

हिंदी कथा साहित्य / संपादक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा

हिंदी कथा साहित्य की भूमिका और संपादकीय के अंश : किस्से - कहानियों, कथा - गाथाओं के प्रति मनुष्य की रुचि सहस्राब्दियों पूर्व से रही है, लेकिन उपन्यास या नॉवेल और कहानी या शार्ट स्टोरी के रूप में इनका विकास पिछली दो सदियों की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। हिंदी में नए रूप में कहानी एवं उपन्यास  विधा का आविर्भाव बीसवीं शताब्दी में हुआ है। वैसे संस्कृत का कथा - साहित्य अखिल विश्व के कथा - साहित्य का जन्मदाता माना जाता है। लोक एवं जनजातीय साहित्य में कथा – वार्ता की सुदीर्घ परम्परा रही है। इधर आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य का विकास संस्कृत - कथा - साहित्य अथवा लोक एवं जनजातीय कथाओं की समृद्ध परम्परा से न होकर, पाश्चात्य कथा साहित्य, विशेषतया अंग्रेजी साहित्य के प्रभाव रूप में हुआ है।  कहानी कथा - साहित्य का एक अन्यतम भेद और उपन्यास से अधिक लोकप्रिय साहित्य रूप है। मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना - सुनना मानव का स्वभाव बन गया। सभी प्रकार के समुदायों में कहानियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में तो कहानियों की सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा रही है। वेद - उपनिषदों में वर्णित यम-य