Skip to main content

अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रकृति, वन्यजीव एवं सरीसृप वैज्ञानिक प्रो व्यास को प्रो हरस्वरूप गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया

जेनेटिक इंजीनियरिंग, मालीकुलर और डेवपमेंटल बायोलॉजी - जीवन विज्ञान के 20 वीं शताब्दी के उत्कृष्टतम जीव वैज्ञानिक डॉक्टर हरस्वरूप को जन्म शताब्दी के अवसर पर प्राणिकी अध्ययनशाला, विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में अप्रतिम पुष्पांजलि एवं श्रद्धांजलि आयोजित की गई, इस अनन्य श्रद्धा युत कार्यक्रम के भारत एवम विदेशों आए डॉ हरस्वरूप के छात्रों ने अभिवादन एवं सहृदयता की पुष्पांजलि अर्पित की।


इसी अवसर पर अंतरराष्ट्रीय प्रकृति निधि संरक्षण संघ ग्लैंड, स्विटजरलैंड के भारतीय उप महाद्वीप के एम्फीबियन एवं रेप्टीलियंस के विशेषज्ञ एवं राष्ट्र के शीर्षस्थ प्रसिद्ध प्राणी शास्त्री डॉ तेज़ प्रकाश पूर्णानंद व्यास को (जेड एस आई) जूलोजिकल सोसाइटी आप इंडिया द्वारा डॉ हरस्वरूप गोल्ड मेडल एवम प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। आपके अन्तरराष्ट्रीय स्तर के सरीसृप विज्ञान, अंतः स्त्राविकी एवम पादप पोषक तत्वों से मानव हृदय सुरक्षा विषय पर सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय विषय के अप्रतिम कार्य हेतु सम्मानित किया गया।
इसी अवसर पर राष्ट्रीय प्राणिकी संस्थान जूलोजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय प्रेसिडेंट डॉ बी एन पांडे (बोध गया), डॉ कमल जायसवाल (विभागाध्यक्ष प्राणिकी विभाग, अंबेडकर विश्वविद्यालय एवं सचिव, जेड एस आय लखनऊ,), डॉ भरत शरण सिंह (म प्र निजी विश्वविद्यालय विनिमायक आयोग भोपाल), डॉ अनूप स्वरूप (से नि कुलपति जागरण विश्वविद्यालय भोपाल, वर्तमान में मेलबॉर्न से ), डॉ अखिलेश कुमार पांडेय ( कुलपति विक्रम विश्व विद्यालय, उज्जैन) , डॉ प्रशान्त पुराणिक ( कुल सचिव , विक्रम वि वि, उज्जैन), डॉ डी के बेलसरे (पूर्व विभागाध्यक्ष बायोसाइंस विभाग, भोपाल वि वि, वर्तमान में नागपुर से), एवं डॉक्टर केशरी (बोधगया) की गरिमामय उपस्थित में सारस्वत सम्मान सहित गोल्ड मेडल प्रदान किया गया।
डॉ व्यास प्राणिकी अध्ययनशाला के छात्र रहे हैं। आपने 43 वर्षों तक मध्य प्रदेश उच्च शिक्षा में प्राणी शास्त्र का अध्यापन किया। आप शासकीय राजा भोज स्नातकोत्तर महाविद्यालय धार में प्राचार्य पद से से नि हुए हैं।

Comments

Popular posts from this blog

आधे अधूरे - मोहन राकेश : पाठ और समीक्षाएँ | मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे : मध्यवर्गीय जीवन के बीच स्त्री पुरुष सम्बन्धों का रूपायन

  आधे अधूरे - मोहन राकेश : पीडीएफ और समीक्षाएँ |  Adhe Adhure - Mohan Rakesh : pdf & Reviews मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और कथाकार मोहन राकेश का जन्म  8 जनवरी 1925 को अमृतसर, पंजाब में  हुआ। उन्होंने  पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए उपाधि अर्जित की थी। उनकी नाट्य त्रयी -  आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे भारतीय नाट्य साहित्य की उपलब्धि के रूप में मान्य हैं।   उनके उपन्यास और  कहानियों में एक निरंतर विकास मिलता है, जिससे वे आधुनिक मनुष्य की नियति के निकट से निकटतर आते गए हैं।  उनकी खूबी यह थी कि वे कथा-शिल्प के महारथी थे और उनकी भाषा में गज़ब का सधाव ही नहीं, एक शास्त्रीय अनुशासन भी है। कहानी से लेकर उपन्यास तक उनकी कथा-भूमि शहरी मध्य वर्ग है। कुछ कहानियों में भारत-विभाजन की पीड़ा बहुत सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुई है।  मोहन राकेश की कहानियां नई कहानी को एक अपूर्व देन के रूप में स्वीकार की जाती हैं। उनकी कहानियों में आधुनिक जीवन का कोई-न-कोई विशिष्ट पहलू उजागर

मालवी भाषा और साहित्य : प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा

MALVI BHASHA AUR SAHITYA: PROF. SHAILENDRAKUMAR SHARMA पुस्तक समीक्षा: डॉ श्वेता पंड्या Book Review : Dr. Shweta Pandya  मालवी भाषा एवं साहित्य के इतिहास की नई दिशा  लोक भाषा, लोक साहित्य और संस्कृति का मानव सभ्यता के विकास में अप्रतिम योगदान रहा है। भाषा मानव समुदाय में परस्पर सम्पर्क और अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। इसी प्रकार क्षेत्र-विशेष की भाषा एवं बोलियों का अपना महत्त्व होता है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति से जुड़े विशाल वाङ्मय में मालवा प्रदेश, अपनी मालवी भाषा, साहित्य और संस्कृति के कारण महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ की भाषा एवं लोक-संस्कृति ने  अन्य क्षेत्रों पर प्रभाव डालते हुए अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। मालवी भाषा और साहित्य के विशिष्ट विद्वानों में डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। प्रो. शर्मा हिन्दी आलोचना के आधुनिक परिदृश्य के विशिष्ट समीक्षकों में से एक हैं, जिन्होंने हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं के साथ-साथ मालवी भाषा, लोक एवं शिष्ट साहित्य और संस्कृति की परम्परा को आलोचित - विवेचित करने का महत्त्वपूर्ण एवं सार्थक प्रयास किया है। उनकी साह

हिंदी कथा साहित्य / संपादक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा

हिंदी कथा साहित्य की भूमिका और संपादकीय के अंश : किस्से - कहानियों, कथा - गाथाओं के प्रति मनुष्य की रुचि सहस्राब्दियों पूर्व से रही है, लेकिन उपन्यास या नॉवेल और कहानी या शार्ट स्टोरी के रूप में इनका विकास पिछली दो सदियों की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। हिंदी में नए रूप में कहानी एवं उपन्यास  विधा का आविर्भाव बीसवीं शताब्दी में हुआ है। वैसे संस्कृत का कथा - साहित्य अखिल विश्व के कथा - साहित्य का जन्मदाता माना जाता है। लोक एवं जनजातीय साहित्य में कथा – वार्ता की सुदीर्घ परम्परा रही है। इधर आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य का विकास संस्कृत - कथा - साहित्य अथवा लोक एवं जनजातीय कथाओं की समृद्ध परम्परा से न होकर, पाश्चात्य कथा साहित्य, विशेषतया अंग्रेजी साहित्य के प्रभाव रूप में हुआ है।  कहानी कथा - साहित्य का एक अन्यतम भेद और उपन्यास से अधिक लोकप्रिय साहित्य रूप है। मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना - सुनना मानव का स्वभाव बन गया। सभी प्रकार के समुदायों में कहानियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में तो कहानियों की सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा रही है। वेद - उपनिषदों में वर्णित यम-य