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जीवन से गायब होती सहजता को साकार करती है नई कविता

विक्रम विश्वविद्यालय में नई कविता के विविध आयामों पर हुआ राष्ट्रीय परिसंवाद


उज्जैन विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन की हिंदी अध्ययनशाला और पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययनशाला द्वारा राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन किया गया। इस अवसर पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ से पधारे वरिष्ठ आचार्य डॉ. अजय बिसारिया, विक्रम विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा, डॉ जगदीश चंद्र शर्मा आदि ने नई कविता के विविध आयामों पर विचार व्यक्त किए।

मुख्य वक्ता प्रो. अजय बिसारिया, अलीगढ़ ने अपने व्याख्यान में कहा कि कवि के भाव और विचार ही कविता है। कविता करना कहीं से सीखा नहीं जाता। यह सहज रूप से आने वाला भाव है, जो सर्जक की अपनी दृष्टि को व्यक्त करता है। कविता में सहजता, विचारों की अभिव्यक्ति और लाक्षणिक भाषा का प्रयोग होना चाहिए। जीवन से सहजता ग़ायब होती जा रही है, जो नई कविता में भी व्यक्त हो रही है। पहले की कविता कांतासम्मित होती थी, किंतु आज की कविता में परिवर्तन हुआ है, जो विचारणीय है।


चीफ की दावत, वापसी आदि कहानियों में पारिवारिक स्थितियों में आ रहे परिवर्तन को देखा जा सकता है। प्रेमचंद ने बड़े घर की बेटी में संयुक्त परिवार के महत्व को समझाने का प्रयास किया था, किंतु आज के समाज में परिवार व्यवस्था संकटग्रस्त है। जो आज हमने खोया है वह है परिवार और उसकी सहजता। संयुक्त परिवार का आज विघटन हो गया है। परिवार के मूलभूत ढांचे में जो रागतत्व था वह राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, न्यायिक व्यवस्था के कारण खो सा गया है। हम आभासी दुनिया में रहने के आदी हो गए हैं। आज के विज्ञापन आक्रामक हो गए हैं। हम कविता, कहानियों के माध्यम से परिवार और अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों को उठा सकते हैं और जन साधारण तक अपनी बात पहुंचा सकते हैं। जरूरत है बस उस भाव तत्व की जो पाठक के मन को सोचने के लिए प्रेरित करे। जो भाव मीरा के प्रेम की पीर में दिखाई देते हैं, जो रहस्यवाद महादेवी की कविताओं में है, जो भाव बोध और अनुभूति अज्ञेय की कहानियों में थी आज उस भाव बोध की कमी है। हमें उसे समझना होगा और उस तरह की कविता और साहित्य की रचना करनी होगी।

कुलानुशासक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने कहा कि नई कविता और उसके बाद के दौर में जीवन और समाज के तमाम विषयों को लेकर पूरी प्रामाणिकता के साथ सृजन हुआ है। आज रचनाकार स्वयं अपने दौर के दबावों और विसंगतियों के द्रष्टा बन कर कविताओं में जीवंत कर रहे हैं। समकालीन कविता नयी चेतना, नयी संवेदना, नयी भाव - भूमि और नये शिल्प के बदलाव को साकार कर रही है। समाज में जवाबदेही समाप्त हो रही है, जिसकी चिंता नई कविता में दिखाई देती है। नए कवियों ने कविता के प्रतीकों, बिम्बों और उपमानों को बदलने में तत्परता दिखाई है। नए दौर के कवियों ने मानव जीवन को उसकी सम्पूर्णता में स्वीकार किया है। मानव जीवन की समस्याओं को गहरे भावबोध के साथ प्रकट करना समकालीन कविता की प्रमुख पहचान रही है। मालवा नई कविता के लिए उर्वर भूमि रहा है।

प्रारंभ में विषय की प्रस्तावना डॉ जगदीश चंद्र शर्मा ने प्रस्तुत करते हुए कहा कि जीवन और जगत के सभी पक्षों को देखने की कोशिशें नई कविता को जीवंत बनाती है।

कार्यक्रम में प्रो गीता नायक, श्री महेश कुमार, डॉ भास्कर शर्मा, डॉ सुशील शर्मा, डॉ अजय शर्मा, श्रीमती हीना तिवारी आदि सहित अनेक शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. जगदीश चंद्र शर्मा ने किया और आभार प्रदर्शन डॉ श्वेता पंड्या, कायथा ने किया।



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