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शिव हैं सर्वोपास्य और वैज्ञानिक तथ्य भी, उनके चरित्र से प्रेरणा लें युवा

महाकाल लोक के लोकार्पण के पूर्व अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के माध्यम से हुआ शिव तत्व पर महत्त्वपूर्ण मंथन

भाषा, कला और साहित्य के परिप्रेक्ष्य में शिव तत्व और आख्यान पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी विक्रम विश्वविद्यालय में संपन्न

उज्जैन। ज्योतिर्लिंग श्रीमहाकालेश्वर परिसर स्थित महाकाल लोक के लोकार्पण के पूर्व 7 अक्टूबर शुक्रवार को विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन की हिंदी अध्ययनशाला और पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययनशाला द्वारा भाषा, कला और साहित्य के परिप्रेक्ष्य में शिव तत्व और आख्यान  विषय पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया  माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के करकमलों से 11 अक्टूबर को महाकाल लोक के लोकार्पण के ऐतिहासिक अवसर पर विक्रम विश्वविद्यालय द्वारा अनेक सारस्वत संगोष्ठियों एवं व्याख्यानों का आयोजन किया जा रहा है। इस कड़ी में शुक्रवार को भाषा, कला और साहित्य के परिप्रेक्ष्य में शिव तत्व और आख्यान विषय पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति अखिलेश कुमार पांडेय ने की। इस अवसर पर देश-विदेश के अनेक विद्वानों ने भाग लिया। इनमें ओस्लो, नॉर्वे से श्री सुरेशचंद्र शुक्ल शरद आलोक, डॉ मुक्ता, वाराणसी, पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक, दूरदर्शन एवं आकाशवाणी श्री राजशेखर व्यास, प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा, प्रो गीता नायक, डॉ जगदीश चंद्र शर्मा, डॉ संकल्प मिश्र, डॉ शैलेंद्र कुमार, नागपुर, श्रीमती वसुधा गाडगिल, श्रीमती अंतरा करवड़े, इंदौर, डॉ प्रतिष्ठा शर्मा, कवि श्री सूरज नागर उज्जैनी, डॉ महेश शर्मा अनुराग आदि ने शिव तत्त्व के विविध आयामों पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में वैदिक संस्कृति में शिव, भारतीय साहित्य में शिव का अंकन, दर्शन, भाषा एवं कला चिंतन में शिव आदि विषयों पर महत्त्वपूर्ण व्याख्यान हुए। 

कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पांडेय ने कहा कि भगवान शिव का चरित जीवन में अनेक आदर्शों की प्रेरणा देता है। भगवान शिव ने गंगावतरण प्रसंग के माध्यम से जल संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण संदेश दिया है। ज्योतिर्लिंग की अर्चना के माध्यम से रेडिएशन पर अंकुश लगाया जा सकता है। पुरातन साहित्य में छुपे ज्ञान और रहस्यों को युवा पीढ़ी के मध्य लाने की आवश्यकता है।

हिंदी के शिखर आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल की सुपुत्री मुक्ता, वाराणसी ने कहा कि उज्जयिनी और वाराणसी दोनों शिव तत्त्व से सम्बद्ध हैं। काशी में स्वयं शिव तारक मंत्र देकर मुक्ति प्रदान करते हैं। मनुष्य को मृत्यु के बाद योगिनी चक्र से होकर गुजरना होता है, तभी मुक्ति संभव है। काशी सदियों से विद्वानों और साहित्यकारों के लिए उर्वरा भूमि रही है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल एवं अन्य विद्वानों ने हिंदी साहित्य को विश्व स्तर पर ले जाने के लिए अविस्मरणीय योगदान दिया।

श्री सुरेशचंद्र शुक्ल शरद आलोक, ऑस्लो, नॉर्वे ने कहा कि दुनिया के सभी महाद्वीपों में शैव परंपरा और शिव उपासना स्थल मौजूद हैं। इंडोनेशिया और श्रीलंका से लेकर मॉरीशस तक, डेनमार्क और स्वीडन से लेकर अमेरिका तक दुनिया के कई देशों में शिव के विविध रूपों को देवालयों और आख्यानों के माध्यम से लोगों तक पहुंचाया जा रहा है।

श्री राजशेखर व्यास ने कहा कि महाकाल केवल देवता नहीं, वैज्ञानिक तथ्य भी हैं। उनके माध्यम से उज्जैन स्टैंडर्ड टाइम का संकेत मिलता है। शिव की उपासना में सबका प्रवेश है, वे सर्वहारा के देवता हैं। महाकालेश्वर मंदिर में जगद्गुरु शंकराचार्य का शास्त्रार्थ हुआ था और उससे समाज को नई दिशा मिली। 

प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि उज्जैन अनेक सहस्राब्दी से शैव भूमि के रूप में विख्यात है। भारत में शास्त्र और लोक की आपसदारी हजारों वर्षों से रही है, शिव दोनों के लिए आस्था और श्रद्धा के केंद्र हैं। शिव की महिमा अत्यंत पुरातन पुराण - विद्या ने गाई है, तो लोक धारा उन्हें प्रत्यक्ष देव के रूप में पूजती आ रही है। पुराणों का स्पष्ट संकेत है कि समस्त दृश्य शिव ही है। जहाँ संवेदना है वहाँ शिव है। शिव के दो रूपों का संकेत शिव पुराण करता है – सकल और निष्कल। ब्रह्मभाव निष्कल रूप है, तो महेश्वरभाव सकल रूप। कला युक्त और अकल ये दोनों ही शिव के रूप हैं। 

प्रो गीता नायक ने कहा कि हिंदी के अनेक उपन्यासों में शिव चरित्र का वर्णन हुआ है। कामायनी में शिव दर्शन की प्रतिष्ठा हुई है। 

इस अवसर पर कुलपति प्रो पांडेय, डॉ मुक्ता, श्री व्यास एवं अतिथियों द्वारा विश्व पत्रकारिता एवं जनसंचार संग्रहालय और अभिलेखन केंद्र का फीता काटकर लोकार्पण किया गया।

डॉ संकल्प मिश्र ने कहा कि पुराण ग्रंथ मूल तत्व तक पहुंचने के लिए महत्वपूर्ण साधन हैं। विष्णु सर्वोत्कृष्ट वस्तुओं को प्रदान करने वाले देवता हैं तो शिव छोटी से छोटी इच्छाओं की भी पूर्ति कर देते हैं। वेद में द्वंद्व भाव की परिकल्पना है। शिव तत्व को शक्ति से अलग नहीं किया जा सकता। द्वंद्व भाव के बिना शिव को नहीं समझा जा सकता है। वेदों में संकेत है कि पुं एवं स्त्री धर्म दोनों के सहयोग से ही सृष्टि होती है। शिव उपासना इस बात की ओर संकेत करती है।

डॉ जगदीश चंद्र शर्मा ने कहा कि भारतीय साहित्य में शिव का रूपांकन अनेक स्थानों पर मिलता है। महाकवि कालिदास ने कुमारसंभव के माध्यम से उनके दांपत्य भाव को सुंदर ढंग से व्यक्त किया है।

डॉ शैलेंद्र कुमार, नागपुर ने कहा कि शिव के डमरू से विभिन्न ध्वनियों की उत्पत्ति हुई है। संस्कृत दुनिया की प्राचीनतम और अत्यंत वैज्ञानिक भाषा है। उसके वैयाकरण पाणिनि को शिव से ही ऊर्जा प्राप्त हुई। 

श्रीमती वसुधा गाडगिल, इंदौर ने कहा कि शिव पर्यावरण प्रेमी हैं। उन्होंने पर्यावरण को  नष्ट होने से बचाया। वे प्रकृति के प्रति प्रेम करना सिखाते हैं। शिव चैतन्य रूप हैं, वे आनंद रूप हैं और जैव विविधता के रक्षक हैं।

श्रीमती अंतरा करवड़े, इंदौर ने शिव मानस पूजा और शिव रुद्राष्टक पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि एक ओर मानस पूजा में कल्याण का भाव है तो दूसरी ओर रुद्राष्टक में रक्षण का भाव है।

डॉ प्रतिष्ठा शर्मा ने कहा कि शिव स्वयंभू हैं, उनका ना आदि है और ना अंत। शिव तत्व का दार्शनिक आधार है। अनेक रचनाकारों ने शिव के चरित का सुंदर वर्णन किया है। मनुष्य निर्मल बने, वह पारदर्शी रहे, यह प्रेरणा शिव का चरित्र देता है।

कवि श्री सूरज नागर उज्जैनी ने शिव, शिवत्व और शिव तत्व गीत की प्रस्तुति की।

डॉ महेश शर्मा अनुराग ने कहा कि प्राचीन मान्यता है कि भगवान विष्णु और ब्रह्मा क्रमशः पहले और दूसरे शैव हैं। भगवान शिव सर्वोपास्य हैं।

कार्यक्रम में डॉ शैलेंद्र भारल, डॉ डी डी बेदिया, संतोष सुपेकर, डॉ सुशील शर्मा, डॉ नेहा माथुर, डॉ अजय शर्मा, परिमिता सिंह आदि सहित बड़ी संख्या में शिक्षकों, विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने सहभागिता की।

संगोष्ठी का संचालन डॉ जगदीश चंद्र शर्मा ने किया। आभार प्रदर्शन श्रीमती हीना तिवारी ने किया।









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