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भारतीय वैज्ञानिक दृष्टिकोण और भगवान शिव चरित्र पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न

महाकाल लोक लोकार्पण अवसर पर हुई विक्रम विश्वविद्यालय के प्राणिकी एवं जैव प्रौद्योगिकी अध्ययनशाला में राष्ट्रीय संगोष्ठी 

उज्जैन। विक्रम विश्वविद्यालय के विज्ञान और जीवविज्ञान संकाय के विभागों द्वारा संयुक्त रूप से भारतीय वैज्ञानिक दृष्टिकोण और भगवान शिव चरित्र विषय पर राष्ट्रीय परिसंवाद एवं संगोष्ठी का आयोजन  प्राणिकी एवं जैव प्रौद्योगिकी अध्ययनशाला में किया गया। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के करकमलों से आगामी 11 अक्टूबर को महाकाल लोक के लोकार्पण के ऐतिहासिक अवसर पर विक्रम विश्वविद्यालय द्वारा  भारतीय वैज्ञानिक दृष्टिकोण और भगवान शिव चरित्र विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं परिसंवाद का आयोजन प्राणिकी एवं जैव प्रौद्योगिकी अध्ययनशाला में किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रोफेसर अखिलेश कुमार पाण्डेय ने की। 

उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि भगवान शिव का विज्ञान से घनिष्ट सम्बन्ध रहा है। अपनी बात को समझाते हुए उन्होंने बताया कि भगवान शिव सृष्टि के पहले पर्यावरण विशेषज्ञ थे और उनके द्वारा गंगा को जटा में धारण करना जल संरक्षण का प्रथम उदाहरण है। उन्होंने यह भी कहा कि शिव परिवार में अलग-अलग प्रवृत्ति के जीवों जैसे गाय, मूषक, सर्प, मोर आदि का साथ में रहना फ़ूड चैन का एक अच्छा उदाहरण है। यह भी दर्शाता कि किस प्रकार किस प्रकार सभी प्राणियों के परस्पर विपरीत स्वभाव का होने के बाद भी सद्भावना से रहना चाहिए।

कार्यक्रम के अतिथि वक्ता डॉ हरीश व्यास विभागाध्यक्ष वनस्पति विज्ञान, शासकीय कालिदास कन्या महाविद्यालय ने आपने वक्तव्य में कहा कि भगवान शिव वैज्ञानिक दृष्टिकोण से एक बहुत प्रख्यात वैज्ञानिक थे। उनके द्वारा कंठ में विष धारण करना बायोऐकुमलैशन  का उदाहरण है और शिव द्वारा धारण किए जाने वाले विभिन्न तत्व जैसे सिर पर चंद्र, गले में रुद्राक्ष और सर्प, हर बात का अपना वैज्ञानिक महत्त्व है। अपनी बात को बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि रुद्राक्ष धारण करने से रक्तचाप नियंत्रित किया जा सकता है और शिव का डमरू वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। 

कार्यक्रम के विशिष्ट वक्ता डॉ शिवम् शर्मा सह प्राध्यापक पाणिनि एवं वैदिक विश्वविद्यालय ने कहा कि भगवान शिव का त्रिशूल लक्ष भेदन में आज की मिसाइल से भी ज्यादा निपुण था। उन्होंने सृष्टि की उत्पत्ति के समय शिव के रूद्र रूप की उत्पत्ति को बिग बैंग थ्योरी के समान बताया।

विक्रम विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ प्रशांत पुराणिक ने बताया कि शिव सर्वत्र, सर्वज्ञ एवं सनातन हैं अर्थात् शिव से सम्बंधित ऐसी कई बातें हैं, जिसका ज्ञान आज की पीढ़ी को होना आवश्यक है। इसलिए ऐसे कार्यक्रमों की निरंतरता विश्वविद्यालय में बनी रहनी चाहिए। 

पीठिका रखते हुए विक्रम विश्वविद्यालय के कुलानुशासक प्रोफेसर शैलेन्द्र कुमार शर्मा ने कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम सार्थक प्रयास हैं, जिनसे शिव चरित्र के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को समझा एवं समझाया जा सकता है। उज्जयिनी में त्रेता युग के पहले से महाकालेश्वर की उपासना की जा रही है। राम और कृष्ण दोनों के द्वारा पूजित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग एवं शिव तत्त्व की मनोवैज्ञानिक, पर्यावरणीय और दार्शनिक महिमा है।

प्राणिकी एवं जैव प्रौद्योगिकी अध्ययनशाला के विभागाध्यक्ष डॉ सलिल सिंह ने बताया कि ऐसे आयोजन विभाग एवं छात्रों का ज्ञानवर्धन करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। हमारा विभाग ऐसे आयोजनों के लिए सदैव तत्पर रहता है। 

कार्यक्रम में स्वागत भाषण भौतिकी विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ स्वाति दुबे द्वारा दिया गया। इस अवसर पर प्रोफेसर अलका व्यास, डॉ हरीसिंह कुशवाह, डॉ निश्छल यादव, डॉ अरविन्द शुक्ल, डॉ संतोष कुमार ठाकुर, डॉ अपूर्वा मुले, डॉ स्मिता सोलंकी, डॉ कंचन थूल, डॉ मोहित प्रजापति, डॉ पूर्णिमा त्रिपाठी सहित अनेक शिक्षक, कर्मचारीगण उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन डॉ गरिमा शर्मा ने किया एवं आभार डॉ शिवी भसीन ने माना।

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