Skip to main content

प्रबंध की नई पीढ़ी ज्ञान प्रबन्धन एवं वित्तीय वैयक्तिक सन्तुष्टि को उपनिषदों के माध्यम से आत्मसात करें - प्रो. पी.के. सिंह, निदेशक, आई.आई.एम.

विक्रम विश्वविद्यालय में विशिष्ट व्याख्यान संपन्न

उज्जैन। पंडित जवाहरलाल नेहरू व्यवसाय प्रबंधन संस्थान, भारत अध्ययन केंद्र, विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन एवं मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद के संयुक्त तत्वाधान में शनिवार, 17 सितंबर 2022 को श्री महर्षि अरविंद सार्धशती महोत्सव अंतर्गत विशिष्ट व्याख्यान "उपनिषदों में जीवन प्रबंधन एवं श्री अरविंद के आलोक में वेद रहस्य विषय पर" शलाका दीर्घा, माधव भवन, विक्रम विश्वविद्यालय परिसर उज्जैन में संपन्न हुआ । 

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री विभाष जी उपाध्याय (उपाध्यक्ष मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद), कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो.अखिलेश कुमार पाण्डेय, कुलपति, विक्रम विश्वविद्यालय, मुख्य वक्ता प्रो. पवन कुमार सिंह निदेशक एवं प्रबंध चिंतक भारतीय प्रबंधन संस्थान, तिरुचिरापल्ली , अतिथिद्वय डॉ.गोविंद जी गंधे एवं श्री सचिन जी दवे कार्यपरिषद सदस्य द्वारा भी श्री अरविंद के विग्रह एवं मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण दीप प्रज्वलन कर व्याख्यान का शुभारंभ किया गया।

अपनी चिर परिचित प्रखर शैली में अविस्मरणीय विशिष्ट व्याख्यान देते हुए प्रो.सिंह ने प्रबन्ध की नई पीढ़ी एवं अनुभवी श्रोताओं के समक्ष, विद्या बनाम अविद्या, पराविद्या, आनुपातिक विकास बनाम समग्र विकास, मानव बुद्धि की सीमाओं को विभिन्न उपनिषदों से उदधृत करते हुए, गर्भ से मोक्ष, वित्त उपार्जन से उपभोग तक जोड़ते हुए, वैदिक ऋचाओं, उपनिषदों के प्रसिद्ध सूत्र वाक्यों के साथ ही मशहूर शायर बशीरबद्र के अल्फाजों के माध्यम से जीवंत एवं बहु उपयोगी शिक्षाप्रद रोचक सूत्रों को पिरोकर प्रस्तुत किया।

मुख्य अतिथि श्री विभाष जी उपाध्याय, उपाध्यक्ष मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद ने अपने उदबोधन में उपस्थित समस्त विद्यार्थियों को श्री अरविंद के जीवन चरित्र से प्रेरणा लेने का आव्हान करते हुए, समाज में अपनी सकारात्मक भूमिका को नव ऊर्जा एवं नव अंकुरण के साथ निभाने के लिए उद्धरणों से प्रेरित किया।

सर्वप्रथम अतिथि परिचय डॉ. धर्मेंद्र मेहता निदेशक पंडित जवाहरलाल नेहरू व्यवसाय प्रबंधन संस्थान, सम्मान-स्वागत भाषण डॉ. प्रशांत पौराणिक कुलसचिव विक्रम विश्वविद्यालय द्वारा दिया गया । कार्यक्रम के प्रमुख अतिथियों का स्वागत आयोजन समिति की ओर से डॉ.सचिन राय, प्रभारी निदेशक भारत अध्ययन केंद्र विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन, श्री शिवप्रसाद मालवीय संभाग समन्वयक मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद उज्जैन द्वारा किया गया।

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर प्रो. एच.पी. सिंह, प्रो. डॉ. दीपक गुप्ता, अध्यक्ष प्रबंध अध्ययन मंडल, डॉ.उमेश सिंह निदेशक कंप्यूटर वि.सं., एस. के. मिश्रा, डीएसडब्ल्यू, डॉ. संदीप तिवारी, डॉ ज्योति उपाध्याय, डॉ कामरान सुल्तान, डॉ. डी.डी. बेदिया, डॉ कमलेश दशोरा, डॉ निश्चल यादव, समाजशास्त्री विद्वान डॉ.शैलेंद्र पाराशर, उपकुलसचिव द्वय डॉ. डी.के. बग्गा, डॉ. रविशंकर सोनवाल, डॉ नयनतारा डामोर, डॉ मनु गौराह, डॉ कमल बुनकर, श्री राकेश खोती, डॉ. अजय शर्मा, सभी स्टाफ मेम्बर्स, श्री सचिन शिंपी जिला समन्वयक मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद, श्री अरुण व्यास, श्री मोहन सिंह परिहार, श्री संदीप मालवीय, विकासखंड समन्वयक, जय दीक्षित एवं विक्रम विश्वविद्यालय अध्यययनशालाओं के विभागाध्यक्षगण, छात्र-छात्राएं, प्रस्फुटन समिति नवांकुर संस्थाएं प्रतिनिधि, स्वैच्छिक संगठन प्रतिनिधि, परामर्शदाता सीएम डीएलपी, पूर्व विद्यार्थी श्री जयवंत दाभाड़े, डॉ.अतुल जैन, वरिष्ठ उद्योग सलाहकार श्री डांगे जी, वैष्णव विद्यापीठ, प्रेस्टीज प्रबन्ध संस्थान, इंदौर शहर के प्राध्यापकगण एवं सुधिजन भी भारी संख्या में उपस्थित रहे।

Comments

Popular posts from this blog

आधे अधूरे - मोहन राकेश : पाठ और समीक्षाएँ | मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे : मध्यवर्गीय जीवन के बीच स्त्री पुरुष सम्बन्धों का रूपायन

  आधे अधूरे - मोहन राकेश : पीडीएफ और समीक्षाएँ |  Adhe Adhure - Mohan Rakesh : pdf & Reviews मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और कथाकार मोहन राकेश का जन्म  8 जनवरी 1925 को अमृतसर, पंजाब में  हुआ। उन्होंने  पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए उपाधि अर्जित की थी। उनकी नाट्य त्रयी -  आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे भारतीय नाट्य साहित्य की उपलब्धि के रूप में मान्य हैं।   उनके उपन्यास और  कहानियों में एक निरंतर विकास मिलता है, जिससे वे आधुनिक मनुष्य की नियति के निकट से निकटतर आते गए हैं।  उनकी खूबी यह थी कि वे कथा-शिल्प के महारथी थे और उनकी भाषा में गज़ब का सधाव ही नहीं, एक शास्त्रीय अनुशासन भी है। कहानी से लेकर उपन्यास तक उनकी कथा-भूमि शहरी मध्य वर्ग है। कुछ कहानियों में भारत-विभाजन की पीड़ा बहुत सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुई है।  मोहन राकेश की कहानियां नई कहानी को एक अपूर्व देन के रूप में स्वीकार की जाती हैं। उनकी कहानियों में आधुनिक जीवन का कोई-न-कोई विशिष्ट पहलू उजागर

हिंदी कथा साहित्य / संपादक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा

हिंदी कथा साहित्य की भूमिका और संपादकीय के अंश : किस्से - कहानियों, कथा - गाथाओं के प्रति मनुष्य की रुचि सहस्राब्दियों पूर्व से रही है, लेकिन उपन्यास या नॉवेल और कहानी या शार्ट स्टोरी के रूप में इनका विकास पिछली दो सदियों की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। हिंदी में नए रूप में कहानी एवं उपन्यास  विधा का आविर्भाव बीसवीं शताब्दी में हुआ है। वैसे संस्कृत का कथा - साहित्य अखिल विश्व के कथा - साहित्य का जन्मदाता माना जाता है। लोक एवं जनजातीय साहित्य में कथा – वार्ता की सुदीर्घ परम्परा रही है। इधर आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य का विकास संस्कृत - कथा - साहित्य अथवा लोक एवं जनजातीय कथाओं की समृद्ध परम्परा से न होकर, पाश्चात्य कथा साहित्य, विशेषतया अंग्रेजी साहित्य के प्रभाव रूप में हुआ है।  कहानी कथा - साहित्य का एक अन्यतम भेद और उपन्यास से अधिक लोकप्रिय साहित्य रूप है। मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना - सुनना मानव का स्वभाव बन गया। सभी प्रकार के समुदायों में कहानियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में तो कहानियों की सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा रही है। वेद - उपनिषदों में वर्णित यम-य

मालवी भाषा और साहित्य : प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा

MALVI BHASHA AUR SAHITYA: PROF. SHAILENDRAKUMAR SHARMA पुस्तक समीक्षा: डॉ श्वेता पंड्या Book Review : Dr. Shweta Pandya  मालवी भाषा एवं साहित्य के इतिहास की नई दिशा  लोक भाषा, लोक साहित्य और संस्कृति का मानव सभ्यता के विकास में अप्रतिम योगदान रहा है। भाषा मानव समुदाय में परस्पर सम्पर्क और अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। इसी प्रकार क्षेत्र-विशेष की भाषा एवं बोलियों का अपना महत्त्व होता है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति से जुड़े विशाल वाङ्मय में मालवा प्रदेश, अपनी मालवी भाषा, साहित्य और संस्कृति के कारण महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ की भाषा एवं लोक-संस्कृति ने  अन्य क्षेत्रों पर प्रभाव डालते हुए अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। मालवी भाषा और साहित्य के विशिष्ट विद्वानों में डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। प्रो. शर्मा हिन्दी आलोचना के आधुनिक परिदृश्य के विशिष्ट समीक्षकों में से एक हैं, जिन्होंने हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं के साथ-साथ मालवी भाषा, लोक एवं शिष्ट साहित्य और संस्कृति की परम्परा को आलोचित - विवेचित करने का महत्त्वपूर्ण एवं सार्थक प्रयास किया है। उनकी साह