Skip to main content

राज्यस्तरीय राष्ट्र निर्माता सम्मान डॉ. चौधरी को इन्दौर में मिला


इंदौर। राज्यस्तरीय साहित्यकार-लेखक का सम्मान दैनिक विनय उजाला इन्दौर द्वारा साहित्यकार एवं लेखक डॉ. प्रभु चौधरी को राष्ट्र निर्माता सम्मान  24 सित. शनिवार को इन्दौर के जाल सभागृह में  विशिष्ट अतिथि सांसद श्री शंकर लालवानी, महापौर श्रीमती  भार्गव, विधायक श्री आकाश विजयवर्गीय एवं अध्यक्ष भाजपा श्री गौरव रणदिवे एवं सम्पादक श्रीमती शोभना मिश्रा प्रदान करेंगे।

उल्लेखनीय यह है कि डॉ. प्रभु चौधरी द्वारा लिखित पुस्तक देवनागरी लिपि तब से अब तक, विश्व पटल पर हिन्दी सहित 10 पुस्तके प्रकाशित हुई है। डॉ. चौधरी राष्ट्रीय महासचिव, राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना के द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर 27 भव्य समारोहो में संगोष्ठी-काव्यगोष्ठी एवं लगभग 2800 सम्मान पत्र साहित्यकारों एवं डॉ. राधाकृष्णन श्रेष्ठ शिक्षक सम्मान से अभिनंदन करते आ रहे है। 

डॉ. चौधरी को सम्मान में सम्मानित होने पर ईष्ट मित्रो एवं शिक्षक संचेतना के पदाधिकारियों ने बधाई एवं शुभकामनाएं दी है। जिसमें प्रमुख बधाईदाता श्री हरेराम वाजपेयी, श्री ब्रजकिशोर शर्मा, डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा, डॉ. जी.डी. अग्रवाल अनिल ओझा राजश्री परिहार,सुनीता सिंह  मणिमाला शर्मा, अर्चना लबानिया, संगीता केसवानी, ज्योतिसिंह, अर्पणा जोशी, कोमल विश्वकर्मा, ऋतु शर्मा, अर्चना गौड, करूणा प्रजापति, संगीता हडके, माया पांचोली, संगीतासिंह, कल्पना शाह, प्रगति बैरागी, गीता पंवार, ज्योति जलज, केतन जोशी, सीमा शर्मा,नीतू ठाकुर हरसूद डॉ. कृष्णा जोशी, मनीषा खेडेकर आदि है।

उक्त जानकारी प्रदेश प्रवक्ता कृष्णा जोशी ने दी है।

Comments

Popular posts from this blog

आधे अधूरे - मोहन राकेश : पाठ और समीक्षाएँ | मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे : मध्यवर्गीय जीवन के बीच स्त्री पुरुष सम्बन्धों का रूपायन

  आधे अधूरे - मोहन राकेश : पीडीएफ और समीक्षाएँ |  Adhe Adhure - Mohan Rakesh : pdf & Reviews मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और कथाकार मोहन राकेश का जन्म  8 जनवरी 1925 को अमृतसर, पंजाब में  हुआ। उन्होंने  पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए उपाधि अर्जित की थी। उनकी नाट्य त्रयी -  आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे भारतीय नाट्य साहित्य की उपलब्धि के रूप में मान्य हैं।   उनके उपन्यास और  कहानियों में एक निरंतर विकास मिलता है, जिससे वे आधुनिक मनुष्य की नियति के निकट से निकटतर आते गए हैं।  उनकी खूबी यह थी कि वे कथा-शिल्प के महारथी थे और उनकी भाषा में गज़ब का सधाव ही नहीं, एक शास्त्रीय अनुशासन भी है। कहानी से लेकर उपन्यास तक उनकी कथा-भूमि शहरी मध्य वर्ग है। कुछ कहानियों में भारत-विभाजन की पीड़ा बहुत सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुई है।  मोहन राकेश की कहानियां नई कहानी को एक अपूर्व देन के रूप में स्वीकार की जाती हैं। उनकी कहानियों में आधुनिक जीवन का कोई-न-कोई विशिष्ट पहलू उजागर

मालवी भाषा और साहित्य : प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा

MALVI BHASHA AUR SAHITYA: PROF. SHAILENDRAKUMAR SHARMA पुस्तक समीक्षा: डॉ श्वेता पंड्या Book Review : Dr. Shweta Pandya  मालवी भाषा एवं साहित्य के इतिहास की नई दिशा  लोक भाषा, लोक साहित्य और संस्कृति का मानव सभ्यता के विकास में अप्रतिम योगदान रहा है। भाषा मानव समुदाय में परस्पर सम्पर्क और अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। इसी प्रकार क्षेत्र-विशेष की भाषा एवं बोलियों का अपना महत्त्व होता है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति से जुड़े विशाल वाङ्मय में मालवा प्रदेश, अपनी मालवी भाषा, साहित्य और संस्कृति के कारण महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ की भाषा एवं लोक-संस्कृति ने  अन्य क्षेत्रों पर प्रभाव डालते हुए अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। मालवी भाषा और साहित्य के विशिष्ट विद्वानों में डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। प्रो. शर्मा हिन्दी आलोचना के आधुनिक परिदृश्य के विशिष्ट समीक्षकों में से एक हैं, जिन्होंने हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं के साथ-साथ मालवी भाषा, लोक एवं शिष्ट साहित्य और संस्कृति की परम्परा को आलोचित - विवेचित करने का महत्त्वपूर्ण एवं सार्थक प्रयास किया है। उनकी साह

हिंदी कथा साहित्य / संपादक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा

हिंदी कथा साहित्य की भूमिका और संपादकीय के अंश : किस्से - कहानियों, कथा - गाथाओं के प्रति मनुष्य की रुचि सहस्राब्दियों पूर्व से रही है, लेकिन उपन्यास या नॉवेल और कहानी या शार्ट स्टोरी के रूप में इनका विकास पिछली दो सदियों की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। हिंदी में नए रूप में कहानी एवं उपन्यास  विधा का आविर्भाव बीसवीं शताब्दी में हुआ है। वैसे संस्कृत का कथा - साहित्य अखिल विश्व के कथा - साहित्य का जन्मदाता माना जाता है। लोक एवं जनजातीय साहित्य में कथा – वार्ता की सुदीर्घ परम्परा रही है। इधर आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य का विकास संस्कृत - कथा - साहित्य अथवा लोक एवं जनजातीय कथाओं की समृद्ध परम्परा से न होकर, पाश्चात्य कथा साहित्य, विशेषतया अंग्रेजी साहित्य के प्रभाव रूप में हुआ है।  कहानी कथा - साहित्य का एक अन्यतम भेद और उपन्यास से अधिक लोकप्रिय साहित्य रूप है। मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना - सुनना मानव का स्वभाव बन गया। सभी प्रकार के समुदायों में कहानियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में तो कहानियों की सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा रही है। वेद - उपनिषदों में वर्णित यम-य