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पराजित मनुष्य को नियति से टकराने का आह्वान करती हैं सुमन जी की कविताएँ – प्रो शर्मा

कविवर डॉ शिवमंगलसिंह सुमन जयंती प्रसंग पर हुआ राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

उज्जैन । विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन की हिंदी अध्ययनशाला द्वारा प्रख्यात कवि एवं पूर्व कुलपति पद्मभूषण डॉ शिवमंगलसिंह सुमन जयंती प्रसंग का आयोजन किया गया। इस अवसर पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई, जो डॉ शिवमंगलसिंह सुमन : कृतित्व के विविध आयाम पर केंद्रित थी। संगोष्ठी की मुख्य अतिथि वरिष्ठ कवयित्री और शिक्षा अधिकारी श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुंबई थीं। कार्यक्रम के प्रमुख वक्ता विक्रम विश्वविद्यालय के कुलानुशासक प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा थे। आयोजन के विशिष्ट अतिथि मुंबई के पूर्व सहायक आयुक्त, विक्रय कर श्री अशोक जाधव एवं डॉ जगदीश चंद्र शर्मा थे।

संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कला संकायाध्यक्ष प्रोफेसर शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि सुमन जी का स्मरण आते ही उदात्त का विराट बिम्ब आकार लेता है। बहुत कम रचनाकारों को इस तरह जीवंत किंवदंती होने का सौभाग्य मिला है, सुमन जी उस विलक्षण कविमाला के अनूठे रत्न हैं। सुमन जी धारा के नहीं, उसके प्रतिरोध के कवि हैं। उनकी कविताएं आजीवन नियति के आगे पराजित और संकल्पों को समर्पित करते मनुष्य को उसके विरुद्ध टकराने का आह्वान करती हैं। एक अविराम-अडिग पथिक के रूप में गतिशील बने रहने का जीवन-संदेश सुमन जी देते हैं। उनकी रचनाओं में हमारे समाज, साहित्य, संवेदना और चिंतन का इतिहास सजीव हो गया है।

वरिष्ठ कवयित्री श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुंबई ने कहा कि सुमन जी ने समाज और व्यक्ति जीवन के लिए अपनी कविताओं के माध्यम से महत्वपूर्ण प्रेरणाएँ दी हैं। वे प्रगति और परिवर्तन के कवि हैं। श्रीमती जाधव ने अपनी अनेक मार्मिक कविताएं सुनाईं, जिनमें समझौता, लक्ष्मण रेखा, मोबाइल आदि प्रमुख थीं। डॉ जगदीश चंद्र शर्मा ने कहा कि उत्तर छायावादी कविता में डॉ शिवमंगलसिंह सुमन का स्थान अद्वितीय है। उनके काव्य में पूर्व और समकालीन दौर की अनेक काव्य धारा के साथ संवाद दिखाई देता है। उनके अनेक गीत आज भी लोगों के कंठ में जीवित हैं। विशिष्ट अतिथि श्री अशोक जाधव, मुंबई ने कहा कि विद्यार्थी अपने अंदर छुपे हुए ज्ञान के अथाह समुद्र को बाहर निकाले। हम स्वयं अपनी प्रगति कर सकते हैं।

कार्यक्रम में शोधार्थी मोहन तोमर ने सुमन जी की कविता तूफानों की ओर और शोधार्थी रणधीर अठिया ने उनकी कविता वरदान मांगूंगा नहीं की प्रस्तुति की। कार्यक्रम में प्राध्यापक डॉ प्रतिष्ठा शर्मा, डॉ सुशील शर्मा आदि सहित अनेक शिक्षक एवं शोधार्थी उपस्थित थे। कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथियों को साहित्य भेंट कर उनका सम्मान किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ जगदीश चंद्र शर्मा ने किया। आभार प्रदर्शन शोधार्थी श्री मोहन तोमर ने किया।

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