Skip to main content

पर्यावरण संतुलन के लिए विश्वविद्यालय परिसर को स्वच्छ एवं हरा-भरा बनाए रखने के लिए सहयोग करने की पेशकश की

उज्जैन । विश्वविद्यालय अकादमिक परिसर में पौधारोपण एवं उनके संरक्षण व्यवस्था का निरीक्षण करने के लिए कुलपति प्रो पांडेय ने दिनांक 31 अगस्त 2022 को प्रातः कालीन भ्रमण किया। प्रातः कालीन भ्रमण करने वाले आम नागरिकों एवं समाजसेवियों ने कुलपति से परिसर में मवेशियों के प्रवेश को पूर्णतः प्रतिबंधित करने की मांग करते हुए परिसर की को हरा भरा रखने में सहयोग करने की पेशकश की।

दिनांक 31 अगस्त 2022 गणेश चतुर्थी के दिन विश्वविद्यालय परिसर में रोपित किए गए पौधों की सुरक्षा व्यवस्था का निरीक्षण करने के लिए कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पांडेय ने अकादमिक परिसर का भ्रमण किया। प्रातःकालीन भ्रमण के समय कुछ विभागों में गाय और भैंस चरते हुए देखी गई , जिसके नियंत्रण हेतु सुरक्षा गार्डों को सख्त निर्देश दिए गए हैं । प्रातः कालीन भ्रमण करने वाले उज्जैन के गणमान्य नागरिक एवं समाजसेवियों ने कुलपति प्रोफेसर अखिलेश कुमार पांडेय से चर्चा करते हुए विश्वविद्यालय परिसर को स्वच्छ एवं हरा-भरा बनाए रखने के लिए परिसर में मवेशियों के प्रवेश पर पाबंदी लगाने की मांग की है तथा परिसर को हरा-भरा बनाए रखने तथा स्वच्छता हेतु सहयोग करने की पेशकश की है । गौरतलब है कि पिछले 2 वर्षों में अकादमी परिसर में 5000 से अधिक पौधों का रोपण किया गया है। परंतु शहर के दुग्ध उत्पादक एवं आम नागरिकगण अवैध रूप से विश्वविद्यालय परिसर में मवेशियों को प्रवेश कराते हैं। वे अध्ययनशाला में लगी तार के फेंसिंग को तोड़ते हैं, जिसके फलस्वरूप पशुओं द्वारा रोपित किए गए पौधों को नष्ट कर दिया जाता हैं ।कुलपति प्रोफ़ेसर पांडेय ने शहर के गणमान्य नागरिकों से चर्चा करते हुए बताया कि पर्यावरण को संतुलित रखने के लिए पेड़ पौधों की भूमिका प्रमुख है, जिसके द्वारा हवा शुद्ध होती है, वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा में वृद्धि होती है तथा जलवायु नियंत्रण में सहायक होते हैं । पौधे जल संरक्षण एवं मिट्टी की उर्वरक क्षमता बढ़ाने में सहायक होते हैं । विश्वविद्यालय परिसर को स्वच्छ एवं हरा भरा रखने के लिए अध्ययनशालाओं तथा विभागों के विभागाध्यक्षों को निर्देशित किया गया है । विश्वविद्यालय परिसर में अवैध मवेशियों के प्रवेश , तार फेंसिंग एवं दीवार तोड़ने वाले पशु मालिकों के खिलाफ पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज की की गयी है।


पशु मालिकों द्वारा विश्वविद्यालय परिसर को हानि पहुंचाए जाने पर सख्त अनुशासनात्मक एवं दंडात्मक कार्यवाही की जाएगी। कुलपति जी से चर्चा के दौरान उज्जैन के प्रतिष्ठित समाजसेवी श्री विवेक जायसवाल, महेश विजयवर्गीय, श्री संजय प्रकाश सक्सेना, श्री अशोक चौधरी, श्री लकी बग्गा , श्री संजय शर्मा, श्री अमित कावड़िया आदि ने विश्वविद्यालय परिसर को स्वच्छ एवं हरा-भरा बनाए रखने हेतु सहयोग करने की पेशकश की।

कुलपति प्रोफेसर पांडेय के अकादमिक परिसर में भ्रमण के दौरान डॉ अरविंद शुक्ला एवं डॉक्टर शिवि भसीन, प्राणिकी एवं जैव प्रौद्योगिकी अध्ययनशाला उपस्थित थे। विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ प्रशांत पुराणिक ने बताया कि विश्वविद्यालय को स्वच्छ एवं हरा-भरा रखना हमारी प्राथमिकता है । परिसर में अव्यवस्था एवं मवेशियों के प्रवेश कराने वाले लोगों के खिलाफ पुलिस प्रकरण दर्ज किया जा रहा है । विश्वविद्यालय के कुलानुशासक प्रोफेसर शैलेंद्र कुमार शर्मा ने बताया कि विश्वविद्यालय को स्वच्छ बनाए रखने के लिए पौधारोपण एवं उनका संरक्षण आवश्यक है ।अकादमिक परिसर की सुंदरता बनाए रखने के लिए विद्यार्थियों, शिक्षकगणों, कर्मचारियों के साथ-साथ उज्जैन के नागरिक गण एवं समाजसेवियों को भी अपनी भूमिका का निर्वहन करना होगा।

Comments

Popular posts from this blog

आधे अधूरे - मोहन राकेश : पाठ और समीक्षाएँ | मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे : मध्यवर्गीय जीवन के बीच स्त्री पुरुष सम्बन्धों का रूपायन

  आधे अधूरे - मोहन राकेश : पीडीएफ और समीक्षाएँ |  Adhe Adhure - Mohan Rakesh : pdf & Reviews मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और कथाकार मोहन राकेश का जन्म  8 जनवरी 1925 को अमृतसर, पंजाब में  हुआ। उन्होंने  पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए उपाधि अर्जित की थी। उनकी नाट्य त्रयी -  आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे भारतीय नाट्य साहित्य की उपलब्धि के रूप में मान्य हैं।   उनके उपन्यास और  कहानियों में एक निरंतर विकास मिलता है, जिससे वे आधुनिक मनुष्य की नियति के निकट से निकटतर आते गए हैं।  उनकी खूबी यह थी कि वे कथा-शिल्प के महारथी थे और उनकी भाषा में गज़ब का सधाव ही नहीं, एक शास्त्रीय अनुशासन भी है। कहानी से लेकर उपन्यास तक उनकी कथा-भूमि शहरी मध्य वर्ग है। कुछ कहानियों में भारत-विभाजन की पीड़ा बहुत सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुई है।  मोहन राकेश की कहानियां नई कहानी को एक अपूर्व देन के रूप में स्वीकार की जाती हैं। उनकी कहानियों में आधुनिक जीवन का कोई-न-कोई विशिष्ट पहलू उजागर

हिंदी कथा साहित्य / संपादक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा

हिंदी कथा साहित्य की भूमिका और संपादकीय के अंश : किस्से - कहानियों, कथा - गाथाओं के प्रति मनुष्य की रुचि सहस्राब्दियों पूर्व से रही है, लेकिन उपन्यास या नॉवेल और कहानी या शार्ट स्टोरी के रूप में इनका विकास पिछली दो सदियों की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। हिंदी में नए रूप में कहानी एवं उपन्यास  विधा का आविर्भाव बीसवीं शताब्दी में हुआ है। वैसे संस्कृत का कथा - साहित्य अखिल विश्व के कथा - साहित्य का जन्मदाता माना जाता है। लोक एवं जनजातीय साहित्य में कथा – वार्ता की सुदीर्घ परम्परा रही है। इधर आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य का विकास संस्कृत - कथा - साहित्य अथवा लोक एवं जनजातीय कथाओं की समृद्ध परम्परा से न होकर, पाश्चात्य कथा साहित्य, विशेषतया अंग्रेजी साहित्य के प्रभाव रूप में हुआ है।  कहानी कथा - साहित्य का एक अन्यतम भेद और उपन्यास से अधिक लोकप्रिय साहित्य रूप है। मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना - सुनना मानव का स्वभाव बन गया। सभी प्रकार के समुदायों में कहानियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में तो कहानियों की सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा रही है। वेद - उपनिषदों में वर्णित यम-य

मालवी भाषा और साहित्य : प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा

MALVI BHASHA AUR SAHITYA: PROF. SHAILENDRAKUMAR SHARMA पुस्तक समीक्षा: डॉ श्वेता पंड्या Book Review : Dr. Shweta Pandya  मालवी भाषा एवं साहित्य के इतिहास की नई दिशा  लोक भाषा, लोक साहित्य और संस्कृति का मानव सभ्यता के विकास में अप्रतिम योगदान रहा है। भाषा मानव समुदाय में परस्पर सम्पर्क और अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। इसी प्रकार क्षेत्र-विशेष की भाषा एवं बोलियों का अपना महत्त्व होता है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति से जुड़े विशाल वाङ्मय में मालवा प्रदेश, अपनी मालवी भाषा, साहित्य और संस्कृति के कारण महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ की भाषा एवं लोक-संस्कृति ने  अन्य क्षेत्रों पर प्रभाव डालते हुए अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। मालवी भाषा और साहित्य के विशिष्ट विद्वानों में डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। प्रो. शर्मा हिन्दी आलोचना के आधुनिक परिदृश्य के विशिष्ट समीक्षकों में से एक हैं, जिन्होंने हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं के साथ-साथ मालवी भाषा, लोक एवं शिष्ट साहित्य और संस्कृति की परम्परा को आलोचित - विवेचित करने का महत्त्वपूर्ण एवं सार्थक प्रयास किया है। उनकी साह