Skip to main content

विश्वविद्यालय चलो अभियान से लगभग चौदह हजार छात्र लाभान्वित

विक्रम विश्वविद्यालय द्वारा विभिन्न माध्यमों से किया गया छात्रों से संपर्क

उज्जैन। विक्रम विश्वविद्यालय विगत एक माह से अधिक अवधि से विश्वविद्यालय चलो अभियान चला रहा है। इस अभियान के तहत विश्वविद्यालय ने पूरे मध्यप्रदेश में 13775 विद्यार्थियों से संपर्क किया एवं उन तक विश्वविद्यालय की प्रमुख उपलब्धियां, गतिविधियां और नवीन पाठ्यक्रमों की जानकारी पहुंचाई।

विक्रम विश्वविद्यालय  विगत एक माह से विश्वविद्यालय चलो अभियान चला रहा है। इस अभियान के तहत विक्रम विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के शिक्षक अलग-अलग विद्यालय और महाविद्यालय में जाकर विश्वविद्यालय द्वारा संचालित पाठ्यक्रमों के बारे में छात्रों को मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं । इस अभियान की शुरुआत 22 जुलाई 2022 को हुई थी और गत एक माह से अधिक समय में विश्वविद्यालय के शिक्षकों द्वारा जिले के 30 से अधिक  विद्यालयों से संपर्क करते हुए छात्रों को जानकारी प्रदान की गई। इससे बड़ी संख्या में विद्यार्थी लाभान्वित हुए।  विश्वविद्यालय चलो अभियान के तहत उज्जैन शहर के प्रमुख स्थलों पर पंपलेट, पोस्टर एवं पाठ्यक्रमों की जानकारी प्रदान करने हेतु पाठ्य सामग्री लगाई गई। 

विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफ़ेसर अखिलेश कुमार पांडेय ने बताया कि विश्वविद्यालय चलो अभियान रूप विद्यार्थियों को विश्वविद्यालय के रोजगारपरक पाठ्यक्रमों के साथ जोड़ने का प्रयास कर रहा है। शिक्षकों द्वारा विभिन्न विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में लिए जा रहे करियर काउंसलिंग सत्र विद्यार्थियों के विषय चयन और करियर सम्बन्धित समस्याओं का समाधान करते हुए उन्हें विश्वविद्यालय में उपलब्ध विभिन्न पाठ्यक्रम की जानकारी प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण सिद्ध हो रहे हैं। यह उज्जैन शहर से होने वाले छात्रों के अनावश्यक प्रवास को भी कम करेगा। विश्वविद्यालय चलो अभियान महाकाल की नगरी और श्री कृष्ण की शिक्षा स्थली को नए परिवेश में पुनः शिक्षा का एक महत्वपूर्ण स्थल बनाने का प्रयास कर रहा है। 

विक्रम विश्वविद्यालय के कुलानुशासक प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा ने बताया कि विश्वविद्यालय चलो अभियान अपनी मूल अवधारणा छात्रों तक पहुंचाने में सफल रहा है। जब इस अभियान की शुरुआत हुई थी तब विक्रम विश्वविद्यालय में मात्र 750 पंजीयन थे, परंतु विगत एक माह में तीव्र गति से फैलती हुई जानकारी से दिनांक 31 जुलाई 2022 तक विक्रम विश्वविद्यालय में ढाई हजार से अधिक विद्यार्थी विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए पंजीयन करा चुके हैं। इसके अतिरिक्त दो लाख अस्सी हजार से अधिक छात्रों ने विक्रम विश्वविद्यालय को सी यू  ई टी के माध्यम से अपने विकल्प के रूप में चयनित किया है। 

विश्वविद्यालय चलो अभियान के आयोजन सचिव डॉ अरविंद शुक्ला, डॉक्टर शिवी भसीन एवं इं अंजलि उपाध्याय ने बताया कि विश्वविद्यालय चलो अभी न सिर्फ विश्वविद्यालय द्वारा संचालित पाठ्यक्रमों की जानकारी देने के लिए है, बल्कि इसका उद्देश्य छात्रों की शंकाओं का समाधान करते हुए उन्हें सही मार्गदर्शन प्रदान करना है। उन्होंने यह भी बताया कि विश्वविद्यालय के शिक्षक डॉ अजय शर्मा, डॉक्टर गरिमा शर्मा, इंजी कंचन थूल, इंजी शिवम शर्मा, इंजीनियर मोहित प्रजापति, डॉ ब्रह्मदत्त शुक्ला द्वारा कई विद्यालयों और महाविद्यालयो में काउंसलिंग सत्र लिए जा चुके हैं, परंतु विश्वविद्यालय के इतिहास का सबसे अविस्मरणीय, अद्भुत और स्वर्णिम पल वह था जब विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर अखिलेश कुमार पांडेय स्वयं इस अभियान से जुड़े और उन्होंने सीधे विद्यालय एवं महाविद्यालय के छात्रों से संपर्क साधा। हाल ही में विक्रम विश्वविद्यालय ने कुलपति से संवाद कार्यक्रम आयोजित किया था, जिसमें 600 से अधिक विद्यार्थियों ने सहभागिता की थी। इसके तुरंत बाद कुलपति प्रोफेसर अखिलेश कुमार पांडेय ने नागदा महाविद्यालय के छात्रों से सीधा संवाद करते हुए उनकी शंकाओं का समाधान किया एवं विश्वविद्यालय की गौरव गाथा से विद्यार्थियों को परिचित करवाया।

विश्वविद्यालय के कुलसचिव ने बताया कि विगत दो वर्षों से विक्रम विश्वविद्यालय  ने समय समय पर आयोजित जॉब फेयर, करियर मार्गदर्शन शिविर, शिक्षा के महाकुंभ, कार्यशाला आदि का महत्त्वपूर्ण संयोजन और सहभागिता की है, जिससे अधिक से अधिक छात्र लाभान्वित हो सके। इस वर्ष विश्वविद्यालय चलो अभियान के तहत विश्वविद्यालय द्वारा शिक्षा के महाकुंभ में लगाए गए विश्वविद्यालय के प्रदर्शनी स्टॉल पर 500 से अधिक विद्यार्थियों ने लाभ उठाया।

Comments

मध्यप्रदेश खबर

नेशनल न्यूज़

Popular posts from this blog

आधे अधूरे - मोहन राकेश : पाठ और समीक्षाएँ | मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे : मध्यवर्गीय जीवन के बीच स्त्री पुरुष सम्बन्धों का रूपायन

  आधे अधूरे - मोहन राकेश : पीडीएफ और समीक्षाएँ |  Adhe Adhure - Mohan Rakesh : pdf & Reviews मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और कथाकार मोहन राकेश का जन्म  8 जनवरी 1925 को अमृतसर, पंजाब में  हुआ। उन्होंने  पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए उपाधि अर्जित की थी। उनकी नाट्य त्रयी -  आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे भारतीय नाट्य साहित्य की उपलब्धि के रूप में मान्य हैं।   उनके उपन्यास और  कहानियों में एक निरंतर विकास मिलता है, जिससे वे आधुनिक मनुष्य की नियति के निकट से निकटतर आते गए हैं।  उनकी खूबी यह थी कि वे कथा-शिल्प के महारथी थे और उनकी भाषा में गज़ब का सधाव ही नहीं, एक शास्त्रीय अनुशासन भी है। कहानी से लेकर उपन्यास तक उनकी कथा-भूमि शहरी मध्य वर्ग है। कुछ कहानियों में भारत-विभाजन की पीड़ा बहुत सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुई है।  मोहन राकेश की कहानियां नई कहानी को एक अपूर्व देन के रूप में स्वीकार की जाती हैं। उनकी कहानियों में आधुनिक जीवन का कोई-न-कोई विशिष्ट पहलू उजागर

हिंदी कथा साहित्य / संपादक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा

हिंदी कथा साहित्य की भूमिका और संपादकीय के अंश : किस्से - कहानियों, कथा - गाथाओं के प्रति मनुष्य की रुचि सहस्राब्दियों पूर्व से रही है, लेकिन उपन्यास या नॉवेल और कहानी या शार्ट स्टोरी के रूप में इनका विकास पिछली दो सदियों की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। हिंदी में नए रूप में कहानी एवं उपन्यास  विधा का आविर्भाव बीसवीं शताब्दी में हुआ है। वैसे संस्कृत का कथा - साहित्य अखिल विश्व के कथा - साहित्य का जन्मदाता माना जाता है। लोक एवं जनजातीय साहित्य में कथा – वार्ता की सुदीर्घ परम्परा रही है। इधर आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य का विकास संस्कृत - कथा - साहित्य अथवा लोक एवं जनजातीय कथाओं की समृद्ध परम्परा से न होकर, पाश्चात्य कथा साहित्य, विशेषतया अंग्रेजी साहित्य के प्रभाव रूप में हुआ है।  कहानी कथा - साहित्य का एक अन्यतम भेद और उपन्यास से अधिक लोकप्रिय साहित्य रूप है। मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना - सुनना मानव का स्वभाव बन गया। सभी प्रकार के समुदायों में कहानियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में तो कहानियों की सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा रही है। वेद - उपनिषदों में वर्णित यम-य

चौऋषिया दिवस (नागपंचमी) पर चौऋषिया समाज विशेष, नाग पंचमी और चौऋषिया दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं

चौऋषिया शब्द की उत्पत्ति और अर्थ: श्रावण मास में आने वा ली नागपंचमी को चौऋषिया दिवस के रूप में पुरे भारतवर्ष में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता हैं। चौऋषिया शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द "चतुरशीतिः" से हुई हैं जिसका शाब्दिक अर्थ "चौरासी" होता हैं अर्थात चौऋषिया समाज चौरासी गोत्र से मिलकर बना एक जातीय समूह है। वास्तविकता में चौऋषिया, तम्बोली समाज की एक उपजाति हैं। तम्बोली शब्द की उत्पति संस्कृत शब्द "ताम्बुल" से हुई हैं जिसका अर्थ "पान" होता हैं। चौऋषिया समाज के लोगो द्वारा नागदेव को अपना कुलदेव माना जाता हैं तथा चौऋषिया समाज के लोगो को नागवंशी भी कहा जाता हैं। नागपंचमी के दिन चौऋषिया समाज द्वारा ही नागदेव की पूजा करना प्रारम्भ किया गया था तत्पश्चात सम्पूर्ण भारत में नागपंचमी पर नागदेव की पूजा की जाने लगी। नागदेव द्वारा चूहों से नागबेल (जिस पर पान उगता हैं) कि रक्षा की जाती हैं।चूहे नागबेल को खाकर नष्ट करते हैं। इस नागबेल (पान)से ही समाज के लोगो का रोजगार मिलता हैं।पान का व्यवसाय चौरसिया समाज के लोगो का मुख्य व्यवसाय हैं।इस हेतू समाज के लोगो ने अपन