Skip to main content

विश्वविद्यालय चलो अभियान का प्रथम चरण समाप्त, एक हजार से अधिक छात्रों से किया गया संपर्क

पन्द्रह से अधिक कॉलेज और स्कूलों में दिया गया करियर मार्गदर्शन एवं विश्वविद्यालय के 243 से ज्यादा पाठ्यक्रमों की जानकारी

उज्जैन विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन द्वारा जारी विश्वविद्यालय चलो अभियान का पहला चरण पूर्ण हुआ। प्रथम चरण में विक्रम विश्वविद्यालय ने 1000 से अधिक छात्रों को लाभान्वित किया। इस दौरान 15 से अधिक स्कूल एवं कॉलेज से संपर्क करने के साथ विश्वविद्यालय में संचालित 243 से अधिक पाठ्यक्रमों की जानकारी देने वाले पम्पलेट शहर के महत्वपूर्ण स्थलों पर लगाये गए।

विक्रम विश्वविद्यालय विगत पन्द्रह दिनों से मध्यप्रदेश शासन के कॉलेज चलो अभियान के समान विश्वविद्यालय चलो अभियान चला रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य छात्रों को करियर मार्गदर्शन और विश्वविद्यालय में संचालित पाठ्यक्रमों की जानकारी प्रदान करना था। इस अभियान के तहत अभी तक विश्वविद्यालय के शिक्षकों द्वारा 15 से अधिक विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में संपर्क किया गया है, जहाँ कई विद्यालयों में विश्वविद्यालय के शिक्षकों ने छात्रों से सीधा संपर्क करते हुए उन्हें विश्वविद्यालय द्वारा संचालित होने वाले पाठ्यक्रमों की जानकारी प्रदान की। इस अभियान के अंतर्गत अभी तक कई संस्थाओं में विश्वविद्यालय के शिक्षकों द्वारा करियर काउन्सलिंग सेशन संचालित किये गए है। इसी क्रम में दिनांक 4 जुलाई को डॉ अंजलि उपाध्याय एवं डॉ शिवि भसीन द्वारा देवास रोड स्थित ज्ञान सागर अकादमी में करियर काउन्सलिंग सेशन लिया गया।


इस अवसर पर छात्रों को मार्गदर्शन प्रदान करते हुए विश्वविद्यालय द्वारा संचालित पाठ्यक्रमों की जानकारी प्रदान की गयी। गौरतलब, है कि कुछ दिन पूर्व विद्यालय प्रबंधन के विशेष आग्रह पर विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पाण्डेय ने विजयाराजे शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में छात्रों को एक प्रेरणादायक सम्बोधन देते हुए उसे विभिन्न क्षेत्रो में रोजगार की अनेक संभावनाओं से परिचित कराया था।


विश्वविद्यालय के कई शिक्षक डॉ अरविन्द शुक्ल, डॉ गरिमा शर्मा, डॉ कंचन थूल, डॉ मोहित प्रजापति, डॉ शिवम् शर्मा, डॉ सागर जैस्वाल निरंतर छात्रों में विश्वविद्यालय द्वारा संचालित पाठ्यक्रमों की जानकारी प्रदान कर रहे हैं एवं शहर के महत्वपूर्ण स्थलों पर विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम सम्बन्धी पोस्टर भी लगा रहे हैं।

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर अखिलेश कुमार पाण्डेय ने बताया कि "विश्वविद्यालय चलो अभियान" के अगले चरण में शिक्षकों द्वारा कई और विद्यालयों और महाविद्यालयों में करियर काउंसलिंग सत्र संयोजित किए जाएँगे। विश्वविद्यालय परिक्षेत्र में आने वाले विद्यालय एवं महाविद्यालयों में अध्ययनरत विद्यार्थियों को उनके भविष्य के दृष्टिगत एवं उनकी इच्छा अनुसार विषय चयन की सहायतार्थ विश्वविद्यालय के शिक्षकों द्वारा मार्गदर्शन प्रदान किया जायेगा।


विक्रम विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रोफेसर प्रशांत पुराणिक ने "विश्वविद्यालय चलो अभियान" को जन-जन तक विश्वविद्यालय का सन्देश पहुंचने का एक सफल वाहक बताते हुए कहा कि यह अभियान न सिर्फ विश्वविद्यालय द्वारा संचालित पाठ्यक्रमों कि जानकारी देगा बल्कि अधिक से अधिक छात्रों को करियर सम्बन्धी समस्त जानकारी देते हुए लाभान्वित भी करेगा।


विक्रम विश्वविद्यालय के कुलानुशासक प्रो शैलेन्द्र कुमार शर्मा ने बताया कि अभी तक लगभग 1650 से अधिक विद्यार्थियों ने एम. पी. ऑनलाइन के माध्यम से प्रवेश हेतु अपने पंजीयन कराया है और 1,75,000 से अधिक विद्यार्थियों ने राष्ट्रीय स्तर के कॉमन एन्ट्रन्स टेस्ट में विक्रम विश्वविद्यालय का चयन किया है। उन्होंने इस अभियान को विद्यार्थियों तक प्रवेश की प्रक्रिया एवं पाठ्यक्रमों की जानकारी पहुँचाने का एक सार्थक प्रयास बताया।

Comments

मध्यप्रदेश खबर

नेशनल न्यूज़

Popular posts from this blog

आधे अधूरे - मोहन राकेश : पाठ और समीक्षाएँ | मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे : मध्यवर्गीय जीवन के बीच स्त्री पुरुष सम्बन्धों का रूपायन

  आधे अधूरे - मोहन राकेश : पीडीएफ और समीक्षाएँ |  Adhe Adhure - Mohan Rakesh : pdf & Reviews मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और कथाकार मोहन राकेश का जन्म  8 जनवरी 1925 को अमृतसर, पंजाब में  हुआ। उन्होंने  पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए उपाधि अर्जित की थी। उनकी नाट्य त्रयी -  आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे भारतीय नाट्य साहित्य की उपलब्धि के रूप में मान्य हैं।   उनके उपन्यास और  कहानियों में एक निरंतर विकास मिलता है, जिससे वे आधुनिक मनुष्य की नियति के निकट से निकटतर आते गए हैं।  उनकी खूबी यह थी कि वे कथा-शिल्प के महारथी थे और उनकी भाषा में गज़ब का सधाव ही नहीं, एक शास्त्रीय अनुशासन भी है। कहानी से लेकर उपन्यास तक उनकी कथा-भूमि शहरी मध्य वर्ग है। कुछ कहानियों में भारत-विभाजन की पीड़ा बहुत सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुई है।  मोहन राकेश की कहानियां नई कहानी को एक अपूर्व देन के रूप में स्वीकार की जाती हैं। उनकी कहानियों में आधुनिक जीवन का कोई-न-कोई विशिष्ट पहलू उजागर

हिंदी कथा साहित्य / संपादक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा

हिंदी कथा साहित्य की भूमिका और संपादकीय के अंश : किस्से - कहानियों, कथा - गाथाओं के प्रति मनुष्य की रुचि सहस्राब्दियों पूर्व से रही है, लेकिन उपन्यास या नॉवेल और कहानी या शार्ट स्टोरी के रूप में इनका विकास पिछली दो सदियों की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। हिंदी में नए रूप में कहानी एवं उपन्यास  विधा का आविर्भाव बीसवीं शताब्दी में हुआ है। वैसे संस्कृत का कथा - साहित्य अखिल विश्व के कथा - साहित्य का जन्मदाता माना जाता है। लोक एवं जनजातीय साहित्य में कथा – वार्ता की सुदीर्घ परम्परा रही है। इधर आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य का विकास संस्कृत - कथा - साहित्य अथवा लोक एवं जनजातीय कथाओं की समृद्ध परम्परा से न होकर, पाश्चात्य कथा साहित्य, विशेषतया अंग्रेजी साहित्य के प्रभाव रूप में हुआ है।  कहानी कथा - साहित्य का एक अन्यतम भेद और उपन्यास से अधिक लोकप्रिय साहित्य रूप है। मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना - सुनना मानव का स्वभाव बन गया। सभी प्रकार के समुदायों में कहानियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में तो कहानियों की सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा रही है। वेद - उपनिषदों में वर्णित यम-य

चौऋषिया दिवस (नागपंचमी) पर चौऋषिया समाज विशेष, नाग पंचमी और चौऋषिया दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं

चौऋषिया शब्द की उत्पत्ति और अर्थ: श्रावण मास में आने वा ली नागपंचमी को चौऋषिया दिवस के रूप में पुरे भारतवर्ष में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता हैं। चौऋषिया शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द "चतुरशीतिः" से हुई हैं जिसका शाब्दिक अर्थ "चौरासी" होता हैं अर्थात चौऋषिया समाज चौरासी गोत्र से मिलकर बना एक जातीय समूह है। वास्तविकता में चौऋषिया, तम्बोली समाज की एक उपजाति हैं। तम्बोली शब्द की उत्पति संस्कृत शब्द "ताम्बुल" से हुई हैं जिसका अर्थ "पान" होता हैं। चौऋषिया समाज के लोगो द्वारा नागदेव को अपना कुलदेव माना जाता हैं तथा चौऋषिया समाज के लोगो को नागवंशी भी कहा जाता हैं। नागपंचमी के दिन चौऋषिया समाज द्वारा ही नागदेव की पूजा करना प्रारम्भ किया गया था तत्पश्चात सम्पूर्ण भारत में नागपंचमी पर नागदेव की पूजा की जाने लगी। नागदेव द्वारा चूहों से नागबेल (जिस पर पान उगता हैं) कि रक्षा की जाती हैं।चूहे नागबेल को खाकर नष्ट करते हैं। इस नागबेल (पान)से ही समाज के लोगो का रोजगार मिलता हैं।पान का व्यवसाय चौरसिया समाज के लोगो का मुख्य व्यवसाय हैं।इस हेतू समाज के लोगो ने अपन