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गुरु ज्ञान की अबाध परंपरा को निरंतर आगे बढ़ाता है - प्रो.शर्मा

 भारतीय संस्कृति के परिपेक्ष्य में शिक्षा पर केंद्रित राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी संपन्न


राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना के तत्वावधान में राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी आयोजित की गई। संगोष्ठी भारतीय संस्कृति के परिपेक्ष्य में शिक्षा पर केंद्रित थी। संगोष्ठी के मौके पर संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री बी के शर्मा जी का उनके जन्मदिवस पर सारस्वत सम्मान किया गया। संगोष्ठी में विक्रम विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष एवं कुलानुशासक डॉ. शैलेंद्र कुमार शर्मा ने अपना मंतव्य देते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु तत्व को विशिष्ट महिमा मिली है। ज्ञान की अबाध परंपरा को आगे बढ़ाने में गुरु का अविस्मरणीय योगदान होता है। गुरु स्वामी रामानंद ने अपने बारह शिष्यों के माध्यम से राष्ट्र की सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना को जागृत करने में अविस्मरणीय योगदान दिया। उनके शिष्य अलग-अलग क्षेत्र और समुदायों से आए थे किंतु सभी ने मिलकर सामाजिक समरसता का महान संदेश दिया। स्वामी विवेकानंद, गावस्कर, सचिन तेंदुलकर आदि सभी के अगर गुरु ना होते तो उनका वह रूप नहीं होता, जो हमें दिखाई देता है। उन्होंने गुरु की महिमा बताते हुए कहा कि यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान। सीस दिए गुरु मिले, तो भी सस्ता जान।

मुख्यअतिथि डॉक्टर शहाबुद्दीन नियाज़ मोहम्मद शेख, राष्ट्रीय संयोजक राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना, पुणे, महाराष्ट्र ने कहा भारतीय संस्कृति विश्व में महान है। इसमें बहुरंगी संस्कृतियों का समावेश है । भारतीय संस्कृति के आधार स्तंभ -च्यवन, ब्रह्म ऋषि वशिष्ठ, धनवंतरी , भार्गव, पाराशर, जैमिनी, अगस्त आदि ऋषि मुनियों ने इस संस्कृति को विकसित किया है। आज शिक्षा में सबसे बड़ा संकट मूल्यों का है । वर्तमान शिक्षा व्यक्तिगत होती जा रही है।
विशिष्ट वक्ता डॉ. अनुसूया अग्रवाल, रायपुर, छत्तीसगढ़ ने कहा कि मनुष्य को कदम-कदम पर उन्नति देना सभ्यता का काम है । परंतु उसे उत्तम बनाना संस्कृति है। विशिष्ट अतिथि डॉ. हरिसिंह पाल, महामंत्री, नागरी लिपि परिषद नई दिल्ली ने कहा कि संस्कृति का निर्माता मनुष्य है। जो कुछ हमारा सामाजिक व्यवहार है । वही संस्कृति है । शिक्षा भी संस्कृति में ही आती है। संस्कृति निरंतर बदलती रहती है । मुख्य अतिथि अशोक कुमार भार्गव , पूर्व संभागायुक्त , भोपाल ने कहा कि भारतीय संस्कृति में सब को अपने में सम्मिलित करने की ताकत है, सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया । शिक्षा हमारे जीवन के जितने भी प्रश्न हैं, उनका उत्तर देती है।

राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री ब्रजकिशोर शर्मा ने कहा कि, मैंने भारतीय संस्कृति से बहुत कुछ पाया है, धर्म, शिक्षा, ज्ञान आदि सब इसी से प्राप्त हुए हैं । हमें जीवन में बांटते रहना चाहिए । भारतीय संस्कृति जमीन और मिट्टी से जुड़ी हुई होने के कारण इसका विनाश नहीं हुआ । डॉ. मुक्ता कान्हा कौशिक, राष्ट्रीय प्रवक्ता, रायपुर ने कहा की विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए कार्य करना चाहिए। उन्होंने गांधी जी के शब्दों को दोहराया शिक्षा से मेरा अभिप्राय व्यक्ति के मन शरीर और आत्मा से है। मार्गदर्शक हरेराम वाजपेयी, अध्यक्ष हिंदी परिवार, इंदौर ने कहा कि संस्कृति के आधार के बगैर शिक्षा कुछ भी नहीं है और शर्मा जी को जन्मदिवस की बधाई देते हुए गीत गाया- नया सूर्य सा उदित कर दिया जैसे हो नए भोर का , आज जन्मदिन ब्रजकिशोर का। अभिनंदन पत्र का वाचन राष्ट्रीय प्रवक्ता, श्री सुंदर लाल जोशी जी ने किया। कार्यक्रम का सुरुचिपूर्ण संचालन डॉ. रश्मि चौबे, मुख्य महासचिव महिला इकाई, ग़ाज़ियाबाद, ने किया।

कार्यक्रम की शुरुआत श्री सुंदरलाल जोशी, उज्जैन द्वारा गायी हुई सरस्वती वंदना से हुआ। स्वागत भाषण कार्यकारी अध्यक्ष सुवर्णा जाधव, पुणे, महाराष्ट्र ने दिया और डॉ. सुरेखा मंत्री, संयोजक, महाराष्ट्र ने शिक्षा जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है कहते हुए अपनी प्रस्तावना दी। आभार प्रदर्शन डॉ.प्रभु चौधरी ,महासचिव राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन ने किया। कार्यक्रम में डॉ. रोहिणी डाबरे, महाराष्ट्र, डॉ. भुवनेश्वरी जायसवाल, छत्तीसगढ़, शर्मिला पांचाल आदि अन्य अनेक गणमान्य उपस्थित रहे।

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