Skip to main content

कला - संस्कृति से परिचित कराने का महत्वपूर्ण माध्यम होता है युवा उत्सव - कुलपति प्रो पांडेय

दो दिवसीय विश्वविद्यालयीन युवा उत्सव का शुभारंभ हुआ

उज्जैन : शिक्षा और संस्कृति से युवाओं को परिचित कराने की जिम्मेदारी प्रत्येक नागरिक की है। युवा उत्सव हमारी समृद्ध संस्कृति से परिचित कराने का महत्वपूर्ण माध्यम होता है। इस प्रकार के उत्सव संस्कृति और शिक्षा को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित करने के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध होते हैं। भारत की अधिसंख्य आबादी युवाओं की है। ऐसे में युवाओं को सही दिशा में तत्पर करना आवश्यक है। कला और संस्कृति जीवन जीने का तरीका सिखाते हैं। युवजन कला, संस्कृति कर्म और शिक्षा में प्रगति करने के लिए आगे आएँ।

ये उद्गार विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पांडेय ने विक्रम विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित विश्वविद्यालयीन युवा उत्सव के शुभारंभ अवसर पर स्वर्ण जयंती सभागार में व्यक्त किए।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कार्यपरिषद सदस्य श्री राजेश सिंह कुशवाह ने कहा कि युवाओं की प्रतिभा को निखारने के लिए युवा उत्सव की विशेष भूमिका होती है। युवाओं के सर्वांगीण विकास के लिए शैक्षिक परिसरों में निरंतर प्रयास होने चाहिए। युवा ही देश के लिए परिवर्तनकारी होते हैं। कला और सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से उनकी प्रतिभा को समुचित अवसर मिलता है।

आयोजन के विशिष्ट अतिथि कार्यपरिषद सदस्य श्री विनोद यादव, एडवोकेट सुश्री ममता बैंडवाल, श्री संजय नाहर, कुलसचिव डॉ प्रशांत पुराणिक एवं कुलानुशासक प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा थे। कुलसचिव डॉ प्रशांत पुराणिक ने कहा कि युवा अपने जीवन में ऊँचे लक्ष्य बनाएँ, उन्हें सफलता अवश्य मिलेगी। कोरोना संकट से उत्पन्न परिस्थितियों के कारण युवा गतिविधियों के समक्ष अनेक चुनौतियां रही हैं। युवा अपनी कला साधना के माध्यम से नई ऊंचाई प्राप्त करने के लिए आगे आएँ।

कार्यक्रम में कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पांडेय के जन्म दिवस के अवसर पर उन्हें शॉल, श्रीफल एवं पुष्पगुच्छ अर्पित कर उनका सारस्वत सम्मान अतिथियों द्वारा किया गया। इस अवसर पर प्राणिकी एवं जैव प्रौद्योगिकी अध्ययनशाला के विद्यार्थियों द्वारा अर्न बाय लर्न योजना के अंतर्गत तैयार किए गए विभिन्न उत्पाद सैनिटाइजर, मास्क, क्रीम आदि कुलपति प्रोफेसर पांडेय द्वारा लोकार्पित किए गए।
प्रारंभ में आयोजन की रूपरेखा एवं स्वागत भाषण आयोजन समिति के मुख्य समन्वयक प्रोफेसर एच पी सिंह ने दिया।

कार्यक्रम में मध्यप्रदेश शासन द्वारा दुर्लभ संगीत वाद्य के क्षेत्र में योगदान के लिए शिखर सम्मान से अलंकृत प्राध्यापिका डॉ वर्षा अग्रवाल का सम्मान अतिथियों द्वारा किया गया। अतिथि स्वागत युवा उत्सव आयोजन समिति के अध्यक्ष प्रो एच पी सिंह, डीएसडब्ल्यू डॉ एस के मिश्रा, विभिन्न समितियों के संयोजक, परिक्षेत्र जिलों से आए विद्यार्थियों और दल प्रबन्धकों ने किया। आयोजन में विक्रम परिक्षेत्र के लगभग साढ़े तीन सौ प्रतिभागी भाग लेने के लिए आए हैं।

संचालन डॉ निवेदिता वर्मा ने किया। आभार विद्यार्थी कल्याण संकाय अध्यक्ष डॉ एस के मिश्रा ने माना। उद्घाटन समारोह के बाद मंचीय विधाओं, साहित्यिक और रूपांकन विधाओं की स्पर्धाओं में युवाओं ने अपने कौशल और प्रतिभा का परिचय दिया। विक्रम विश्वविद्यालय के अंतरजिला युवा उत्सव का समापन एवं पुरस्कार वितरण 13 जनवरी को होगा युवा उत्सव का समापन एवं पुरस्कार वितरण समारोह दिनांक 13 जनवरी को दोपहर 3:30 बजे स्वर्ण जयंती सभागार में होगा। समापन समारोह के मुख्य अतिथि मध्य प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री डॉ मोहन यादव होंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रोफ़ेसर अखिलेश कुमार पांडेय करेंगे। युवा उत्सव के दौरान कोविड-19 से बचाव के सम्बंध में जारी दिशा निर्देशों का पालन करना अनिवार्य रहेगा।

Comments

Popular posts from this blog

आधे अधूरे - मोहन राकेश : पाठ और समीक्षाएँ | मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे : मध्यवर्गीय जीवन के बीच स्त्री पुरुष सम्बन्धों का रूपायन

  आधे अधूरे - मोहन राकेश : पीडीएफ और समीक्षाएँ |  Adhe Adhure - Mohan Rakesh : pdf & Reviews मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और कथाकार मोहन राकेश का जन्म  8 जनवरी 1925 को अमृतसर, पंजाब में  हुआ। उन्होंने  पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए उपाधि अर्जित की थी। उनकी नाट्य त्रयी -  आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे भारतीय नाट्य साहित्य की उपलब्धि के रूप में मान्य हैं।   उनके उपन्यास और  कहानियों में एक निरंतर विकास मिलता है, जिससे वे आधुनिक मनुष्य की नियति के निकट से निकटतर आते गए हैं।  उनकी खूबी यह थी कि वे कथा-शिल्प के महारथी थे और उनकी भाषा में गज़ब का सधाव ही नहीं, एक शास्त्रीय अनुशासन भी है। कहानी से लेकर उपन्यास तक उनकी कथा-भूमि शहरी मध्य वर्ग है। कुछ कहानियों में भारत-विभाजन की पीड़ा बहुत सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुई है।  मोहन राकेश की कहानियां नई कहानी को एक अपूर्व देन के रूप में स्वीकार की जाती हैं। उनकी कहानियों में आधुनिक जीवन का कोई-न-कोई विशिष्ट पहलू उजागर

मालवी भाषा और साहित्य : प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा

MALVI BHASHA AUR SAHITYA: PROF. SHAILENDRAKUMAR SHARMA पुस्तक समीक्षा: डॉ श्वेता पंड्या Book Review : Dr. Shweta Pandya  मालवी भाषा एवं साहित्य के इतिहास की नई दिशा  लोक भाषा, लोक साहित्य और संस्कृति का मानव सभ्यता के विकास में अप्रतिम योगदान रहा है। भाषा मानव समुदाय में परस्पर सम्पर्क और अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। इसी प्रकार क्षेत्र-विशेष की भाषा एवं बोलियों का अपना महत्त्व होता है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति से जुड़े विशाल वाङ्मय में मालवा प्रदेश, अपनी मालवी भाषा, साहित्य और संस्कृति के कारण महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ की भाषा एवं लोक-संस्कृति ने  अन्य क्षेत्रों पर प्रभाव डालते हुए अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। मालवी भाषा और साहित्य के विशिष्ट विद्वानों में डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। प्रो. शर्मा हिन्दी आलोचना के आधुनिक परिदृश्य के विशिष्ट समीक्षकों में से एक हैं, जिन्होंने हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं के साथ-साथ मालवी भाषा, लोक एवं शिष्ट साहित्य और संस्कृति की परम्परा को आलोचित - विवेचित करने का महत्त्वपूर्ण एवं सार्थक प्रयास किया है। उनकी साह

हिंदी कथा साहित्य / संपादक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा

हिंदी कथा साहित्य की भूमिका और संपादकीय के अंश : किस्से - कहानियों, कथा - गाथाओं के प्रति मनुष्य की रुचि सहस्राब्दियों पूर्व से रही है, लेकिन उपन्यास या नॉवेल और कहानी या शार्ट स्टोरी के रूप में इनका विकास पिछली दो सदियों की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। हिंदी में नए रूप में कहानी एवं उपन्यास  विधा का आविर्भाव बीसवीं शताब्दी में हुआ है। वैसे संस्कृत का कथा - साहित्य अखिल विश्व के कथा - साहित्य का जन्मदाता माना जाता है। लोक एवं जनजातीय साहित्य में कथा – वार्ता की सुदीर्घ परम्परा रही है। इधर आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य का विकास संस्कृत - कथा - साहित्य अथवा लोक एवं जनजातीय कथाओं की समृद्ध परम्परा से न होकर, पाश्चात्य कथा साहित्य, विशेषतया अंग्रेजी साहित्य के प्रभाव रूप में हुआ है।  कहानी कथा - साहित्य का एक अन्यतम भेद और उपन्यास से अधिक लोकप्रिय साहित्य रूप है। मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना - सुनना मानव का स्वभाव बन गया। सभी प्रकार के समुदायों में कहानियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में तो कहानियों की सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा रही है। वेद - उपनिषदों में वर्णित यम-य