Skip to main content

31 जनवरी तक बंद रहेंगे 12वीं तक के स्कूल और हॉस्टल

कोरोना नियंत्रण के लिये नये दिशा-निर्देश के साथ प्रतिबंधात्मक आदेश लागू

31 जनवरी तक बंद रहेंगे 12वीं तक के स्कूल और हॉस्टल

जुलूस और रैली प्रतिबंधित

स्टेडियम की क्षमता के 50 प्रतिशत से अधिक उपस्थिति के आयोजन प्रतिबंधित

भोपाल : मध्यप्रदेश राज्य शासन ने #COVID19 के पॉजिटिव तथा एक्टिव प्रकरणों की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी के दृष्टिगत नये दिशा-निर्देश जारी किये हैं।

मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा आज ली गई क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप्स की वर्चुअल बैठक में हुए विचार-विमर्श के तत्काल बाद अपर मुख्य सचिव गृह डॉ. राजेश राजौरा ने जारी किये प्रतिबंधात्मक आदेश तत्काल प्रभाव से लागू कर सभी कलेक्टर्स को उनका कड़ाई से पालन करने को कहा है।

डॉ. राजौरा ने बताया कि कक्षा 1 से कक्षा 12 तक के समस्त स्कूल एवं हॉस्टल 31 जनवरी 2022 तक बंद रहेंगे। जनवरी 2022 में आयोजित होने वाली प्री-बोर्ड परीक्षाओं के संबंध में स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा पृथक से आदेश जारी किए जाएंगे। सभी प्रकार के मेले (धार्मिक, व्यावसायिक), जिनमें जन-समूह एकत्रित होता है, प्रतिबंधित रहेंगे। समस्त रैली एवं जुलूस प्रतिबंधित रहेंगे। समस्त राजनैतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक, शैक्षणिक और मनोरंजन आदि के आयोजनों में 250 व्यक्तियों से अधिक की उपस्थिति प्रतिबंधित रहेगी। बंद हॉल में हॉल की क्षमता के 50 प्रतिशत से कम की उपस्थिति के ही आयोजन/कार्यक्रम आयोजित हो सकेंगे। खेलकूद संबंधी गतिविधियों के लिए स्टेडियम की क्षमता के 50 प्रतिशत से अधिक उपस्थिति के आयोजन प्रतिबंधित रहेंगे।

डॉ. राजौरा ने बताया कि कोविड उपयुक्त व्यवहार का पालन अनिवार्य होगा। कोविड उपयुक्त व्यवहार जैसे मास्क का उपयोग, सोशल डिस्टेंसिंग आदि का पालन सुनिश्चित कराया जाए। मास्क नहीं लगाने वाले व्यक्तियों पर नियमानुसार जुर्माना वसूली की कार्यवाही की जाये।



Comments

मध्यप्रदेश खबर

नेशनल न्यूज़

Popular posts from this blog

आधे अधूरे - मोहन राकेश : पाठ और समीक्षाएँ | मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे : मध्यवर्गीय जीवन के बीच स्त्री पुरुष सम्बन्धों का रूपायन

  आधे अधूरे - मोहन राकेश : पीडीएफ और समीक्षाएँ |  Adhe Adhure - Mohan Rakesh : pdf & Reviews मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और कथाकार मोहन राकेश का जन्म  8 जनवरी 1925 को अमृतसर, पंजाब में  हुआ। उन्होंने  पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए उपाधि अर्जित की थी। उनकी नाट्य त्रयी -  आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे भारतीय नाट्य साहित्य की उपलब्धि के रूप में मान्य हैं।   उनके उपन्यास और  कहानियों में एक निरंतर विकास मिलता है, जिससे वे आधुनिक मनुष्य की नियति के निकट से निकटतर आते गए हैं।  उनकी खूबी यह थी कि वे कथा-शिल्प के महारथी थे और उनकी भाषा में गज़ब का सधाव ही नहीं, एक शास्त्रीय अनुशासन भी है। कहानी से लेकर उपन्यास तक उनकी कथा-भूमि शहरी मध्य वर्ग है। कुछ कहानियों में भारत-विभाजन की पीड़ा बहुत सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुई है।  मोहन राकेश की कहानियां नई कहानी को एक अपूर्व देन के रूप में स्वीकार की जाती हैं। उनकी कहानियों में आधुनिक जीवन का कोई-न-कोई विशिष्ट पहलू उजागर

हिंदी कथा साहित्य / संपादक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा

हिंदी कथा साहित्य की भूमिका और संपादकीय के अंश : किस्से - कहानियों, कथा - गाथाओं के प्रति मनुष्य की रुचि सहस्राब्दियों पूर्व से रही है, लेकिन उपन्यास या नॉवेल और कहानी या शार्ट स्टोरी के रूप में इनका विकास पिछली दो सदियों की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। हिंदी में नए रूप में कहानी एवं उपन्यास  विधा का आविर्भाव बीसवीं शताब्दी में हुआ है। वैसे संस्कृत का कथा - साहित्य अखिल विश्व के कथा - साहित्य का जन्मदाता माना जाता है। लोक एवं जनजातीय साहित्य में कथा – वार्ता की सुदीर्घ परम्परा रही है। इधर आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य का विकास संस्कृत - कथा - साहित्य अथवा लोक एवं जनजातीय कथाओं की समृद्ध परम्परा से न होकर, पाश्चात्य कथा साहित्य, विशेषतया अंग्रेजी साहित्य के प्रभाव रूप में हुआ है।  कहानी कथा - साहित्य का एक अन्यतम भेद और उपन्यास से अधिक लोकप्रिय साहित्य रूप है। मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना - सुनना मानव का स्वभाव बन गया। सभी प्रकार के समुदायों में कहानियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में तो कहानियों की सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा रही है। वेद - उपनिषदों में वर्णित यम-य

चौऋषिया दिवस (नागपंचमी) पर चौऋषिया समाज विशेष, नाग पंचमी और चौऋषिया दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं

चौऋषिया शब्द की उत्पत्ति और अर्थ: श्रावण मास में आने वा ली नागपंचमी को चौऋषिया दिवस के रूप में पुरे भारतवर्ष में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता हैं। चौऋषिया शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द "चतुरशीतिः" से हुई हैं जिसका शाब्दिक अर्थ "चौरासी" होता हैं अर्थात चौऋषिया समाज चौरासी गोत्र से मिलकर बना एक जातीय समूह है। वास्तविकता में चौऋषिया, तम्बोली समाज की एक उपजाति हैं। तम्बोली शब्द की उत्पति संस्कृत शब्द "ताम्बुल" से हुई हैं जिसका अर्थ "पान" होता हैं। चौऋषिया समाज के लोगो द्वारा नागदेव को अपना कुलदेव माना जाता हैं तथा चौऋषिया समाज के लोगो को नागवंशी भी कहा जाता हैं। नागपंचमी के दिन चौऋषिया समाज द्वारा ही नागदेव की पूजा करना प्रारम्भ किया गया था तत्पश्चात सम्पूर्ण भारत में नागपंचमी पर नागदेव की पूजा की जाने लगी। नागदेव द्वारा चूहों से नागबेल (जिस पर पान उगता हैं) कि रक्षा की जाती हैं।चूहे नागबेल को खाकर नष्ट करते हैं। इस नागबेल (पान)से ही समाज के लोगो का रोजगार मिलता हैं।पान का व्यवसाय चौरसिया समाज के लोगो का मुख्य व्यवसाय हैं।इस हेतू समाज के लोगो ने अपन