Skip to main content

उच्च शिक्षा मंत्री डॉ.यादव के मुख्य आतिथ्य में पं.मालवीय की प्रतिमा का अनावरण एवं नवनिर्मित छात्रावास भवन तथा सांख्यिकी अध्ययनशाला विस्तार भवन का लोकार्पण सम्पन्न हुआ

समग्र समाज को शिक्षित करने की भारतरत्न पं.मालवीय की सोच थी

उच्च शिक्षा मंत्री डॉ.यादव के मुख्य आतिथ्य में पं.मालवीय की प्रतिमा का अनावरण एवं नवनिर्मित छात्रावास भवन तथा सांख्यिकी अध्ययनशाला विस्तार भवन का लोकार्पण सम्पन्न हुआ


उज्जैन 04 दिसम्बर। उच्च शिक्षा मंत्री डॉ.मोहन यादव ने 4 दिसम्बर शनिवार को विक्रम कीर्ति मन्दिर में विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन द्वारा नवनिर्मित छात्रावास एवं सांख्यिकी अध्ययनशाला विस्तार भवन का लोकार्पण एवं भारतरत्न महामना पं.मदनमोहन मालवीय की प्रतिमा का अनावरण किया।


इस अवसर पर डॉ.यादव ने कहा कि पं.मदनमोहन मालवीय समग्र समाज को शिक्षित करने की सोच रखते थे। उनका लगाव मालवा धरती से भी अधिक प्रेम था। अपने उद्बोधन में पं.मदनमोहन मालवीय के जीवन संघर्ष के बारे में विस्तार से जानकारी दी। ऐसे महापुरूष के आदर्शों पर चलना चाहिये। उनके द्वारा किये गये कार्यों को हमेशा याद रखा जायेगा। उन्होंने घोषणा की कि नवनिर्मित छात्रावास भवन का नामकरण शिक्षाविद श्री शालीग्राम तोमर के नाम से रखा जायेगा। उन्होंने इस सम्बन्ध में विश्वविद्यालय के कुलपति, कुलसचिव को नियमानुसार आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश दिये। कार्यक्रम की अध्यक्षता विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.अखिलेश कुमार पांडेय ने की।

कार्यक्रम का प्रारम्भ कुलगान से हुआ। तत्पश्चात अतिथियों ने मां वाग्देवी के चित्र पर पुष्प अर्पित कर दीप प्रज्वलन किया। स्वागत उद्बोधन कुलसचिव डॉ.प्रशांत पौराणिक ने दिया और कहा कि भारत रत्न महामना पं.मदनमोहन मालवीय की प्रतिमा लगभग 68 हजार रुपये की लागत से निर्मित हुई है। यह मूर्ति विक्रम विश्वविद्यालय के मानविकी भवन के समक्ष स्थापित की जायेगी। विश्वविद्यालय परिसर में लगभग साढ़े सात करोड़ की लागत से छात्रावास भवन का निर्माण किया गया है। इस दो मंजिला छात्रावास में 125 कक्ष, दो किचन, दो मेस, दो वार्डन कक्ष, दो स्टोर रूम एवं मनोरंजन कक्ष का निर्माण किया गया है। इसी तरह सांख्यिकी अध्ययनशाला का नवनिर्मित विस्तार भवन भी दो मंजिला है। इसकी लागत लगभग 76 लाख रुपये है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो.अखिलेश कुमार पाण्डेय ने की और इस अवसर पर उन्होंने कहा कि प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री डॉ.मोहन यादव के अथक प्रयासों से छात्रावास भवन एवं सांख्यिकी अध्ययनशाला विस्तार भवन का निर्माण हुआ है। यह हम सबके लिये प्रशंसनीय है। विक्रम विश्वविद्यालय में निरन्तर विकास के साथ-साथ नित नये कोर्स खुले हैं, जिससे इस शिक्षण सत्र में 3800 से अधिक विद्यार्थियों ने विभिन्न कोर्सों में प्रवेश लिया है, जो उल्लेखनीय है। कार्यक्रम में जबलपुर एवं उज्जैन विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ.रामराजेश मिश्र, विभिन्न कॉलेजों के प्राचार्य, प्रोफेसर, छात्र-छात्राएं एवं गणमान्य नागरिक आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन कुलानुशासक प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा ने किया। आभार प्रदर्शन डीएसडब्ल्यू डॉ सत्येंद्र किशोर मिश्रा ने किया।

Comments

Popular posts from this blog

आधे अधूरे - मोहन राकेश : पाठ और समीक्षाएँ | मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे : मध्यवर्गीय जीवन के बीच स्त्री पुरुष सम्बन्धों का रूपायन

  आधे अधूरे - मोहन राकेश : पीडीएफ और समीक्षाएँ |  Adhe Adhure - Mohan Rakesh : pdf & Reviews मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और कथाकार मोहन राकेश का जन्म  8 जनवरी 1925 को अमृतसर, पंजाब में  हुआ। उन्होंने  पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए उपाधि अर्जित की थी। उनकी नाट्य त्रयी -  आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे भारतीय नाट्य साहित्य की उपलब्धि के रूप में मान्य हैं।   उनके उपन्यास और  कहानियों में एक निरंतर विकास मिलता है, जिससे वे आधुनिक मनुष्य की नियति के निकट से निकटतर आते गए हैं।  उनकी खूबी यह थी कि वे कथा-शिल्प के महारथी थे और उनकी भाषा में गज़ब का सधाव ही नहीं, एक शास्त्रीय अनुशासन भी है। कहानी से लेकर उपन्यास तक उनकी कथा-भूमि शहरी मध्य वर्ग है। कुछ कहानियों में भारत-विभाजन की पीड़ा बहुत सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुई है।  मोहन राकेश की कहानियां नई कहानी को एक अपूर्व देन के रूप में स्वीकार की जाती हैं। उनकी कहानियों में आधुनिक जीवन का कोई-न-कोई विशिष्ट पहलू उजागर

मालवी भाषा और साहित्य : प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा

MALVI BHASHA AUR SAHITYA: PROF. SHAILENDRAKUMAR SHARMA पुस्तक समीक्षा: डॉ श्वेता पंड्या Book Review : Dr. Shweta Pandya  मालवी भाषा एवं साहित्य के इतिहास की नई दिशा  लोक भाषा, लोक साहित्य और संस्कृति का मानव सभ्यता के विकास में अप्रतिम योगदान रहा है। भाषा मानव समुदाय में परस्पर सम्पर्क और अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। इसी प्रकार क्षेत्र-विशेष की भाषा एवं बोलियों का अपना महत्त्व होता है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति से जुड़े विशाल वाङ्मय में मालवा प्रदेश, अपनी मालवी भाषा, साहित्य और संस्कृति के कारण महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ की भाषा एवं लोक-संस्कृति ने  अन्य क्षेत्रों पर प्रभाव डालते हुए अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। मालवी भाषा और साहित्य के विशिष्ट विद्वानों में डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। प्रो. शर्मा हिन्दी आलोचना के आधुनिक परिदृश्य के विशिष्ट समीक्षकों में से एक हैं, जिन्होंने हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं के साथ-साथ मालवी भाषा, लोक एवं शिष्ट साहित्य और संस्कृति की परम्परा को आलोचित - विवेचित करने का महत्त्वपूर्ण एवं सार्थक प्रयास किया है। उनकी साह

हिंदी कथा साहित्य / संपादक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा

हिंदी कथा साहित्य की भूमिका और संपादकीय के अंश : किस्से - कहानियों, कथा - गाथाओं के प्रति मनुष्य की रुचि सहस्राब्दियों पूर्व से रही है, लेकिन उपन्यास या नॉवेल और कहानी या शार्ट स्टोरी के रूप में इनका विकास पिछली दो सदियों की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। हिंदी में नए रूप में कहानी एवं उपन्यास  विधा का आविर्भाव बीसवीं शताब्दी में हुआ है। वैसे संस्कृत का कथा - साहित्य अखिल विश्व के कथा - साहित्य का जन्मदाता माना जाता है। लोक एवं जनजातीय साहित्य में कथा – वार्ता की सुदीर्घ परम्परा रही है। इधर आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य का विकास संस्कृत - कथा - साहित्य अथवा लोक एवं जनजातीय कथाओं की समृद्ध परम्परा से न होकर, पाश्चात्य कथा साहित्य, विशेषतया अंग्रेजी साहित्य के प्रभाव रूप में हुआ है।  कहानी कथा - साहित्य का एक अन्यतम भेद और उपन्यास से अधिक लोकप्रिय साहित्य रूप है। मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना - सुनना मानव का स्वभाव बन गया। सभी प्रकार के समुदायों में कहानियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में तो कहानियों की सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा रही है। वेद - उपनिषदों में वर्णित यम-य