Skip to main content

विश्वविद्यालय के पच्चीसवें दीक्षान्त समारोह का आयोजन 22 दिसम्बर को उज्जैन में,15 दिसम्बर तक हो सकेंगे पंजीयन

 
उज्जैन : विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के पच्चीसवें दीक्षान्त समारोह का आयोजन कुलाधिपति एवं राज्यपाल, मध्यप्रदेश माननीय मंगुभाई पटेल की अध्यक्षता एवं माननीय डा. मोहन यादव, मंत्री, उच्च शिक्षा, म.प्र. शासन के मुख्य आतिथ्य में सम्पन्न होगा। यह आयोजन दिनांक 22 दिसम्बर 2021 प्रातः काल 11:00 बजे विश्वविद्यालय के स्वर्ण जंयती सभागार में होगा। समारोह में दीक्षांत भाषण श्री मनन कुमार मिश्रा, चेयरमेन, बार कौंसिल ऑफ इंडिया, नई दिल्ली देंगे। आयोजन के सम्माननीय अतिथि माननीय श्री अनिल फिरोजिया, संसद सदस्य, लोकसभा, माननीय श्री पारसचन्द्र जैन, विधायक, म.प्र. विधानसभा होंगे। कुलपति प्रो. अखिलेश कुमार पाण्डेय विद्यार्थियों को आशीर्वचन प्रदान करेंगे। विश्वविद्यालय के कुलपति एवं कार्यपरिषद् के सदस्यों ने दीक्षान्त समारोह में प्रबुद्धजनों को सादर आमंत्रित किया है।

यह जानकारी देते हुए विक्रम विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. प्रशांत पुराणिक ने बताया कि विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन द्वारा आयोजित पच्चीसवें दीक्षांत समारोह में सम्मिलित होने के लिए पात्र विद्यार्थी 15 दिसम्बर तक पंजीयन करवा सकेंगे। पात्र विद्यार्थियों की सूची विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर उपलब्ध करवाई गई है। समारोह में वर्ष 2020 के पीएचडी, डी लिट उपाधि धारकों को डिग्री और 2020 की स्नातक परीक्षाओं की प्रावीण्य सूची में प्रथम स्थान प्राप्त अभ्यर्थियों को स्वर्ण पदक प्रदान किए जाएंगे। वर्ष 2020 की स्नातकोत्तर परीक्षाओं की प्रावीण्य सूची में प्रथम स्थान प्राप्त अभ्यर्थियों को उपाधियां और स्वर्ण पदक प्रदान किए जाएंगे। पात्र विद्यार्थी एमपी ऑनलाइन के माध्यम से शुल्क 500 रुपए के साथ पंजीयन करवा सकते हैं। पीएचडी, डी लिट उपाधि धारक पंजीयन शुल्क के अतिरिक्त उपाधि शुल्क 400 रुपए जमा करवाएं। पंजीयन 15 दिसंबर तक होंगे। अब तक इस दीक्षांत समारोह में सम्मिलित होने के लिए पात्र स्नातक स्तर के 23 विद्यार्थियों, स्नातकोत्तर स्तर के 58 विद्यार्थियों एवं पीएच डी के 116 विद्यार्थियों, कुल 197 पात्र विद्यार्थियों में से कुल 78 विद्यार्थियों ने पंजीयन करवाया है। पंजीकृत पात्र विद्यार्थियों को दीक्षांत समारोह की रिहर्सल के लिए एक दिवस पूर्व 21 दिसंबर को दो बार निर्धारित समय प्रातः काल 11 : 00 बजे और दोपहर 4 : 00 बजे उपस्थित होना होगा। विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलानुशासक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने बताया कि, दीक्षार्थियों को दीक्षान्त समारोह स्थल पर 22 दिसम्बर को प्रातः काल 8 : 30 बजे तक अपना स्थान ग्रहण करना अनिवार्य होगा। आयोजन के दौरान कोविड-19 से संबंधित निर्देशों का पालन करना होगा। दीक्षान्त समारोह में सम्मिलित होने वाले समस्त विद्यार्थियों और सुधीजनों से आग्रह किया गया है कि शासन द्वारा कोविड 19 के सम्बंध में जारी निर्देशों के अनुरूप सोश्यल डिस्टेंसिंग का पालन करेंगे। अपने साथ फोटो परिचय पत्र भी लाएँ। दीक्षान्त समारोह की अवधि में अपना मोबाइल फोन बंद रखें। बैग, ब्रीफकेस, खाद्य पदार्थ इत्यादि वर्जित है। समारोह के समापन पर माननीय कुलाधिपति, मुख्य अतिथि, सम्माननीय अतिथि एवं अकादमिक शोभायात्रा के प्रस्थान के पश्चात् ही अपना स्थान छोड़ें।

Comments

मध्यप्रदेश खबर

नेशनल न्यूज़

Popular posts from this blog

आधे अधूरे - मोहन राकेश : पाठ और समीक्षाएँ | मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे : मध्यवर्गीय जीवन के बीच स्त्री पुरुष सम्बन्धों का रूपायन

  आधे अधूरे - मोहन राकेश : पीडीएफ और समीक्षाएँ |  Adhe Adhure - Mohan Rakesh : pdf & Reviews मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और कथाकार मोहन राकेश का जन्म  8 जनवरी 1925 को अमृतसर, पंजाब में  हुआ। उन्होंने  पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए उपाधि अर्जित की थी। उनकी नाट्य त्रयी -  आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे भारतीय नाट्य साहित्य की उपलब्धि के रूप में मान्य हैं।   उनके उपन्यास और  कहानियों में एक निरंतर विकास मिलता है, जिससे वे आधुनिक मनुष्य की नियति के निकट से निकटतर आते गए हैं।  उनकी खूबी यह थी कि वे कथा-शिल्प के महारथी थे और उनकी भाषा में गज़ब का सधाव ही नहीं, एक शास्त्रीय अनुशासन भी है। कहानी से लेकर उपन्यास तक उनकी कथा-भूमि शहरी मध्य वर्ग है। कुछ कहानियों में भारत-विभाजन की पीड़ा बहुत सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुई है।  मोहन राकेश की कहानियां नई कहानी को एक अपूर्व देन के रूप में स्वीकार की जाती हैं। उनकी कहानियों में आधुनिक जीवन का कोई-न-कोई विशिष्ट पहलू उजागर

हिंदी कथा साहित्य / संपादक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा

हिंदी कथा साहित्य की भूमिका और संपादकीय के अंश : किस्से - कहानियों, कथा - गाथाओं के प्रति मनुष्य की रुचि सहस्राब्दियों पूर्व से रही है, लेकिन उपन्यास या नॉवेल और कहानी या शार्ट स्टोरी के रूप में इनका विकास पिछली दो सदियों की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। हिंदी में नए रूप में कहानी एवं उपन्यास  विधा का आविर्भाव बीसवीं शताब्दी में हुआ है। वैसे संस्कृत का कथा - साहित्य अखिल विश्व के कथा - साहित्य का जन्मदाता माना जाता है। लोक एवं जनजातीय साहित्य में कथा – वार्ता की सुदीर्घ परम्परा रही है। इधर आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य का विकास संस्कृत - कथा - साहित्य अथवा लोक एवं जनजातीय कथाओं की समृद्ध परम्परा से न होकर, पाश्चात्य कथा साहित्य, विशेषतया अंग्रेजी साहित्य के प्रभाव रूप में हुआ है।  कहानी कथा - साहित्य का एक अन्यतम भेद और उपन्यास से अधिक लोकप्रिय साहित्य रूप है। मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना - सुनना मानव का स्वभाव बन गया। सभी प्रकार के समुदायों में कहानियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में तो कहानियों की सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा रही है। वेद - उपनिषदों में वर्णित यम-य

चौऋषिया दिवस (नागपंचमी) पर चौऋषिया समाज विशेष, नाग पंचमी और चौऋषिया दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं

चौऋषिया शब्द की उत्पत्ति और अर्थ: श्रावण मास में आने वा ली नागपंचमी को चौऋषिया दिवस के रूप में पुरे भारतवर्ष में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता हैं। चौऋषिया शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द "चतुरशीतिः" से हुई हैं जिसका शाब्दिक अर्थ "चौरासी" होता हैं अर्थात चौऋषिया समाज चौरासी गोत्र से मिलकर बना एक जातीय समूह है। वास्तविकता में चौऋषिया, तम्बोली समाज की एक उपजाति हैं। तम्बोली शब्द की उत्पति संस्कृत शब्द "ताम्बुल" से हुई हैं जिसका अर्थ "पान" होता हैं। चौऋषिया समाज के लोगो द्वारा नागदेव को अपना कुलदेव माना जाता हैं तथा चौऋषिया समाज के लोगो को नागवंशी भी कहा जाता हैं। नागपंचमी के दिन चौऋषिया समाज द्वारा ही नागदेव की पूजा करना प्रारम्भ किया गया था तत्पश्चात सम्पूर्ण भारत में नागपंचमी पर नागदेव की पूजा की जाने लगी। नागदेव द्वारा चूहों से नागबेल (जिस पर पान उगता हैं) कि रक्षा की जाती हैं।चूहे नागबेल को खाकर नष्ट करते हैं। इस नागबेल (पान)से ही समाज के लोगो का रोजगार मिलता हैं।पान का व्यवसाय चौरसिया समाज के लोगो का मुख्य व्यवसाय हैं।इस हेतू समाज के लोगो ने अपन