Skip to main content

युवा शक्ति में स्वतंत्रता आंदोलन के सम्बंध में गौरव का भाव जरूरी

युवा शक्ति में स्वतंत्रता आंदोलन के सम्बंध में गौरव का भाव जरूरी

आजादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत स्वतंत्रता आंदोलन के विशेषज्ञ डॉ सुधीर भसीन से चर्चा की कुलपति प्रो पाण्डेय ने


उज्जैन : इस वर्ष सम्पूर्ण देश में स्वतंत्रता दिवस की 75 वीं सालगिरह को आजादी के अमृत महोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। इस सन्दर्भ में विक्रम विश्वविद्यालय द्वारा इस कार्यक्रम को एक राष्ट्रीय पर्व के रूप में मानते हुए कई सामाजिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक गतिविधियों का आयोजन निरन्तर किया जा रहा है। उक्त कार्यक्रम की निरंतरता में विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर अखिलेश कुमार पाण्डेय ने स्वाधीनता सेनानियों के पर 33 वर्षों से अनुसन्धान एवं शहीदे आज़म भगत सिंह पर एक मात्र पीएच. डी. उपाधि पूर्ण करने वाले डॉ सुधीर भसीन से सौजन्य भेंट कर स्वतंत्रता आंदोलन एवं स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में महत्वपूर्ण चर्चा की।
15 अगस्त 2022 देश को आजादी की 75 वीं सालगिरह पूर्ण होने जा रही है। इसी परिप्रेक्ष्य में सम्पूर्ण देश में आज़ादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। इसी सन्दर्भ में विक्रम विश्वविद्यालय द्वारा भी कई सांस्कृतिक, कलात्मक एवं शैक्षणिक कार्यक्रमों का आयोजन लगातार जारी है। उपरोक्त कार्यक्रम की निरंतरता में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर अखिलेश कुमार पाण्डेय ने स्वतंत्रता सेनानियों के विशेषज्ञ एवं शहीदे आज़म भगत सिंह पर शोध उपाधि पूर्ण करने वाले एकमात्र शोधकर्ता डॉ सुधीर भसीन अधिवक्ता (उच्च न्यायालय) से सौजन्य भेट की एवं स्वतंत्रता सेनानियों तथा शहीद भगत सिंह से सम्बंधित विचार-विमर्श किया। इस अवसर पर प्रोफेसर पाण्डेय ने कहा कि युवा शक्ति को स्वतंत्रता आंदोलन के सम्बंध में गौरव का भाव रखना चाहिए। उन्हें अमर शहीद सेनानियों की सही जानकारी प्रदान किया जाना भविष्य के लिए आवश्यक है। इससे छात्रों में अपने देश के प्रति भक्ति, निष्ठा, कर्तव्यपरायणता एवं समर्पण की भावना जागृत होती है। इस अवसर पर डॉ सुधीर भसीन ने स्पष्ट किया कि भारत के इतिहास में यह अनोखी बात है कि जब भी भारतीय सम्पदा एवं स्वाधीनता पर संकट आया है तब-तब किसी देशभक्त ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने परिश्रम एवं त्याग से संकट ग्रस्त भारत माता को पुनः नवीन परिश्रम, शक्ति एवं सौन्दर्य से अभिभूत किया है। भगत सिंह भारत माता के उन्ही दैदीप्यमान रत्नों में से एक थे। भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव का बलिदान दिवस 23 मार्च 1931 ऐसा ही पावन दिवस है। कुलपति प्रोफेसर पाण्डेय से चर्चा करते हुए डॉ भसीन ने अनेक प्रेरणादायक तथ्यों का उल्लेख किया।

इनमें प्रमुख हैं - (1) मेरे शोधकार्य का उद्देश्य भगत सिंह की लोकप्रियता एवं उनके स्वतंत्रता संग्राम में योगदान को जीवित सम्मान देने का प्रयास भर रहा है। (2) भगत सिंह बचपन से क्रांति के अद्भुत अनुयायी थे। इनके द्वारा सभी क्रांतिकारियों को अपनी डेयरी से दूध का वितरण मुफ़्त में किया जाता था। (3) भगत सिंह जलियावाला बाग़ की रक्तरंजित मिटटी को मस्तिष्क पर लगाकर, उसे शीशी में भर कर लाये थे। (4) कक्षा 9 वीं में अध्ययन करते समय उन्होंने असहयोग आंदोलन में भाग लिया तथा चौरीचौरा काण्ड के बाद पूर्ण रूप से क्रन्तिकारी विचारों को धारण कर लिया। (5) साइमन कमीशन जो 28 अक्टूबर 1928 को भारत आ रही थी, उसका विरोध करने में भगत सिंह ने अहम भूमिका निभाई थी। (6) भगत सिंह ऐसी क्रांति चाहते थे, जो मनुष्य पर मनुष्य का शोषण करने वाली सरकार को समाप्त कर दे। (7) असेम्बली बम प्रकरण में भगत सिंह ने स्वेच्छा से आत्मसमर्पण किया, वे अगर चाहते तो वहा से भाग सकते थे। (8) भगत सिंह को फांसी की सजा होने के बाद जयदेव कपूर ने भगत सिंह से पूछा की उसे कोई अफ़सोस तो नहीं है, भगत सिंह ने मुस्कुरा कर कहा कि जेल की दीवारों से इंकलाब जिंदाबाद का नारा सुनता हूँ तो सोचता हूँ कि जीवन का इससे ज्यादा क्या मोल हो सकता है। (9) पिता किशनसिह की मर्सी पिटीशन पर भगत सिंह ने अफ़सोस जताते हुए उनसे झगड़ा किया था। (10) भगत सिंह ने वाइसराय गवर्नर को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने कहा कि हम युद्धबंदी हैं और हमें फांसी लगाए जाने की जगह गोलियों से उडा देना चाहिए । (11) भगत सिंह की अंतिम इच्छा बेबे (जमादारनी) के हाथ का खाना खाने की थी, वे कहते थे कि मेरी दो बेबे या माँ हैं एक ने मुझे जन्म दिया वह मेरी माँ है, दूसरी जेल में काम करने वाली बेबे अर्थात् माँ है। (12) फांसी से 3-4 घंटे पहले वसीयत के लिए वकील प्राणनाथ मेहता ने पूछा कि आखरी सलाम किसे भेजना चाहते हो, तो इस पर भगत सिंह ने कहा कि पहला सलाम सुभाष चंद्र बोस को भेजना, फिर मेरा अंतिम सलाम मोतीलाल नेहरू को भेजना । (13) भगत सिंह फांसी के कुछ समय पूर्व लेनिन की पुस्तक पढ़ रहे थे और जैसे ही जेलर ने उन्हें फांसी के लिए बुलवाया, उन्होंने किताब को उछालते हुए कहा कि चलो एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिलने जा रहा है। इस अवसर पर डॉ भसीन ने कुलपति प्रो पाण्डेय को आश्वासन दिया कि विश्वविद्यालय में अध्ययनरत शोधार्थी जो राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन क्षेत्र में शोध कार्य कर रहे हैं, उनके लिए हमारी पुस्तकालय एवं मेरे द्वारा यथासंभव सहयोग प्रदान किया जायेगा। इस कार्यक्रम में प्रो शैलेन्द्र कुमार शर्मा, कुलानुशासक विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन, प्राणिकी एवं जैव- प्रौद्योगिकी अध्ययनशाला के डॉ सलिल सिंह, डॉ अरविन्द शुक्ल, डॉ शिवि भसीन एवं डॉ पूर्णिमा त्रिपाठी उपस्थित थे।

Comments

मध्यप्रदेश खबर

नेशनल न्यूज़

Popular posts from this blog

आधे अधूरे - मोहन राकेश : पाठ और समीक्षाएँ | मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे : मध्यवर्गीय जीवन के बीच स्त्री पुरुष सम्बन्धों का रूपायन

  आधे अधूरे - मोहन राकेश : पीडीएफ और समीक्षाएँ |  Adhe Adhure - Mohan Rakesh : pdf & Reviews मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और कथाकार मोहन राकेश का जन्म  8 जनवरी 1925 को अमृतसर, पंजाब में  हुआ। उन्होंने  पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए उपाधि अर्जित की थी। उनकी नाट्य त्रयी -  आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे भारतीय नाट्य साहित्य की उपलब्धि के रूप में मान्य हैं।   उनके उपन्यास और  कहानियों में एक निरंतर विकास मिलता है, जिससे वे आधुनिक मनुष्य की नियति के निकट से निकटतर आते गए हैं।  उनकी खूबी यह थी कि वे कथा-शिल्प के महारथी थे और उनकी भाषा में गज़ब का सधाव ही नहीं, एक शास्त्रीय अनुशासन भी है। कहानी से लेकर उपन्यास तक उनकी कथा-भूमि शहरी मध्य वर्ग है। कुछ कहानियों में भारत-विभाजन की पीड़ा बहुत सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुई है।  मोहन राकेश की कहानियां नई कहानी को एक अपूर्व देन के रूप में स्वीकार की जाती हैं। उनकी कहानियों में आधुनिक जीवन का कोई-न-कोई विशिष्ट पहलू उजागर

हिंदी कथा साहित्य / संपादक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा

हिंदी कथा साहित्य की भूमिका और संपादकीय के अंश : किस्से - कहानियों, कथा - गाथाओं के प्रति मनुष्य की रुचि सहस्राब्दियों पूर्व से रही है, लेकिन उपन्यास या नॉवेल और कहानी या शार्ट स्टोरी के रूप में इनका विकास पिछली दो सदियों की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। हिंदी में नए रूप में कहानी एवं उपन्यास  विधा का आविर्भाव बीसवीं शताब्दी में हुआ है। वैसे संस्कृत का कथा - साहित्य अखिल विश्व के कथा - साहित्य का जन्मदाता माना जाता है। लोक एवं जनजातीय साहित्य में कथा – वार्ता की सुदीर्घ परम्परा रही है। इधर आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य का विकास संस्कृत - कथा - साहित्य अथवा लोक एवं जनजातीय कथाओं की समृद्ध परम्परा से न होकर, पाश्चात्य कथा साहित्य, विशेषतया अंग्रेजी साहित्य के प्रभाव रूप में हुआ है।  कहानी कथा - साहित्य का एक अन्यतम भेद और उपन्यास से अधिक लोकप्रिय साहित्य रूप है। मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना - सुनना मानव का स्वभाव बन गया। सभी प्रकार के समुदायों में कहानियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में तो कहानियों की सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा रही है। वेद - उपनिषदों में वर्णित यम-य

कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पांडेय को नई शिक्षा नीति का उत्कृष्ट पुरस्कार

  उज्जैन : मध्यप्रदेश में नई शिक्षा नीति का सर्वप्रथम क्रियान्वयन करने पर जबलपुर में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पांडेय को नई शिक्षा नीति में उत्कृष्ट पुरस्कार से सम्मानित किया गया। एनवायरनमेंट एवं सोशल वेलफेयर सोसाइटी, खजुराहो एवं प्राणीशास्त्र एवं जैवप्रौद्योगिकी विभाग, शासकीय विज्ञान स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जबलपुर के संयुक्त तत्वाधान में आयोजन दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन जबलपुर में किया गया। इस अवसर पर मध्य प्रदेश में नई शिक्षा नीति के सर्वप्रथम क्रियान्वयन के लिए विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पांडेय को नई शिक्षानीति में उत्कृष्ट पुरस्कार से सम्मानित किया गया। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पांडेय की प्रशासनिक कार्यकुशलता से आज विश्वविद्यालय नई शिक्षा का क्रियान्वयन करने वाला प्रदेश का पहला विश्वविद्यालय है। इस उपलब्धि के लिए विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ प्रशांत पुराणिक एवं कुलानुशासक प्रो शैलेन्द्र कुमार शर्मा ने कुलपति प्रो पांडेय के प्रति आभार व्यक्त करते हुए उन्हें हार्दिक