Skip to main content

गांधी जयंती के अवसर पर एक राष्ट्रीय वेबीनार का सफल आयोजन


उज्जैन : राजनीति विज्ञान अध्ययन शाला विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन जी.एम.एन. काॅलेज, अंबाला और ओस्का के संयुक्त तत्वाधान में गांधी चिंतन एवं आजादी के विविध आयाम विषय पर ऑनलाइन राष्ट्रीय वेबीनार संपन्न हुआ। कार्यक्रम का प्रारंभ गांधी जी की प्रतिमा पर प्राचार्य द्वारा माल्यार्पण के साथ आरंभ हुआ। इस अवसर पर डाॅ. राजपाल सिंह ने अपने अभिभाषण में कहा कि गांधी जी भारत में ही नहीं अपितु पूरे विश्व में शांति के ऐसे सार्थक स्तम्भ हैं, जिनके जीवन को सिद्धांतो को और विचारों को अपने जीवन में स्थापित करते हैं तो अवश्य ही मनुष्य मात्र की सभी समस्याओं का निराकरण सहज ही सम्भव हो पाएगा। इसलिए गांधी जी हमारे लिए एक आदर्श हैं जो वर्तमान समय में भी राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर हमारा मार्गदर्शन कर रहे हैं।

प्रारंभिक चरण में डॉ राकेश कुमार ने विषय की संक्षिप्त जानकारी प्रस्तुत की। उसके उपरांत प्राचार्य महोदय ने बीज वक्ता प्रोफेसर आर. एस. यादव, संसाधन व्यक्ति प्रोफेसर आशु पसरिजा, मुख्य संरक्षक डॉ धर्मपाल तथा संरक्षक डॉ दीपिका गुप्ता का सांस्कृतिक ढंग से अभिनंदन किया। पहले चरण में प्रोफेसर आर. एस. यादव जी ने अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया। जिसमें उन्होंने गांधी जी के चिंतन को अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में प्रस्तुत किया और कहा कि गांधी जी विश्व शांति का आधार हैं, उसे अपने जीवन में व्यापक रूप से स्थापित करने की परम आवश्यकता है तभी विश्व में विकास और शांति स्थापित होगी। इसी शृंखला में संसाधन व्यक्ति के रुप में प्रोफेसर आशु पसरिजा, पंजाब विश्वविद्यालय से रहे। उन्होंने अपने विचार सांझा करते हुए कहा कि गांधी जी एक जीवन सिद्धांत है, जिसे व्यवहारिकता की आवश्यकता है। आज के भौतिक युग में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनकी विचार धारा को लागू करने की परम आवश्यकता है।

कार्यक्रम के अगले चरण में प्रोफेसर दीपिका गुप्ता जी ने गांधी जी के सिद्धांतों की व्यापक रूप से चर्चा की। उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में परिवर्तित परिवेश में गांधी जी के विचार पूर्णतः सार्थक और प्रासंगिक हैं। अतः गांधी जी के विचारों को जीवन में आदर्श के रूप में स्थापित करें, तभी सभी समस्याओं का निराकरण होगा। अपने विचारों को सांझा किया। उन्होंने कहा कि विकास की तेज गति में गांधी जी ओझल हो गए हैं। अतः उन्हें फिर से सांस्कृतिक ढंग से पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है, तकनीकी सत्र में डॉ. एस.एस. नैन, अध्यक्ष, राजनीति विज्ञान विभाग, जी.एम.एन. कॉलेज, अंबाला छावनी ने भागीदारी की। इन सत्रों में विभिन्न प्रतिभागियों ने शोध पत्र प्रस्तुत किए।

ओस्का के संरक्षक डॉ धर्मपाल ने वेबीनार के तकनीकी सत्र के उपरांत ओस्का की संक्षिप्त वीडियो को प्रस्तुत किया। जिसमें ओस्का द्वारा सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक और जागरूकता से संबंधित विभिन्न गतिविधियों की जानकारी प्रस्तुत की। डॉ. धर्मपाल ने अपने वक्तव्य में कहा कि यह संगठन पिछले दो दशकों से सामाजिक समरसता और जागरूकता के क्षेत्र में सार्थक कार्य कर रहा है, जिससे समाज में आपसी भाईचारा और सौहार्द का वातावरण निर्मित हुआ है। और भविष्य में भी यह संगठन सामाजिक विकास और जागरूकता के लिए वचनबद्ध है।



इस वेबीनार में कुल 630 प्रतिभागी देश के अलग-अलग भागों से सम्मिलित हुए। इस कार्यक्रम को सफल बनाने में ओस्का की अहम भूमिका रही है। इस वेबीनार में डाॅ. राकेश कुमार, समन्वयक, डॉ. प्रवेश कुमार, संयोजक, डाॅ. विरेन्द्र चावरे, सह-संयोजक, डाॅ. चन्द्रपाल पूनिया, संयोजक सचिव, आदि के अथक प्रयासों से सफल संपन्न हुआ। कार्यक्रम के अंत में डॉ. विरेन्द्र चावरे ने सभी प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापित किया।

Comments

मध्यप्रदेश खबर

नेशनल न्यूज़

Popular posts from this blog

आधे अधूरे - मोहन राकेश : पाठ और समीक्षाएँ | मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे : मध्यवर्गीय जीवन के बीच स्त्री पुरुष सम्बन्धों का रूपायन

  आधे अधूरे - मोहन राकेश : पीडीएफ और समीक्षाएँ |  Adhe Adhure - Mohan Rakesh : pdf & Reviews मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और कथाकार मोहन राकेश का जन्म  8 जनवरी 1925 को अमृतसर, पंजाब में  हुआ। उन्होंने  पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए उपाधि अर्जित की थी। उनकी नाट्य त्रयी -  आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे भारतीय नाट्य साहित्य की उपलब्धि के रूप में मान्य हैं।   उनके उपन्यास और  कहानियों में एक निरंतर विकास मिलता है, जिससे वे आधुनिक मनुष्य की नियति के निकट से निकटतर आते गए हैं।  उनकी खूबी यह थी कि वे कथा-शिल्प के महारथी थे और उनकी भाषा में गज़ब का सधाव ही नहीं, एक शास्त्रीय अनुशासन भी है। कहानी से लेकर उपन्यास तक उनकी कथा-भूमि शहरी मध्य वर्ग है। कुछ कहानियों में भारत-विभाजन की पीड़ा बहुत सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुई है।  मोहन राकेश की कहानियां नई कहानी को एक अपूर्व देन के रूप में स्वीकार की जाती हैं। उनकी कहानियों में आधुनिक जीवन का कोई-न-कोई विशिष्ट पहलू उजागर

हिंदी कथा साहित्य / संपादक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा

हिंदी कथा साहित्य की भूमिका और संपादकीय के अंश : किस्से - कहानियों, कथा - गाथाओं के प्रति मनुष्य की रुचि सहस्राब्दियों पूर्व से रही है, लेकिन उपन्यास या नॉवेल और कहानी या शार्ट स्टोरी के रूप में इनका विकास पिछली दो सदियों की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। हिंदी में नए रूप में कहानी एवं उपन्यास  विधा का आविर्भाव बीसवीं शताब्दी में हुआ है। वैसे संस्कृत का कथा - साहित्य अखिल विश्व के कथा - साहित्य का जन्मदाता माना जाता है। लोक एवं जनजातीय साहित्य में कथा – वार्ता की सुदीर्घ परम्परा रही है। इधर आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य का विकास संस्कृत - कथा - साहित्य अथवा लोक एवं जनजातीय कथाओं की समृद्ध परम्परा से न होकर, पाश्चात्य कथा साहित्य, विशेषतया अंग्रेजी साहित्य के प्रभाव रूप में हुआ है।  कहानी कथा - साहित्य का एक अन्यतम भेद और उपन्यास से अधिक लोकप्रिय साहित्य रूप है। मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना - सुनना मानव का स्वभाव बन गया। सभी प्रकार के समुदायों में कहानियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में तो कहानियों की सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा रही है। वेद - उपनिषदों में वर्णित यम-य

चौऋषिया दिवस (नागपंचमी) पर चौऋषिया समाज विशेष, नाग पंचमी और चौऋषिया दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं

चौऋषिया शब्द की उत्पत्ति और अर्थ: श्रावण मास में आने वा ली नागपंचमी को चौऋषिया दिवस के रूप में पुरे भारतवर्ष में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता हैं। चौऋषिया शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द "चतुरशीतिः" से हुई हैं जिसका शाब्दिक अर्थ "चौरासी" होता हैं अर्थात चौऋषिया समाज चौरासी गोत्र से मिलकर बना एक जातीय समूह है। वास्तविकता में चौऋषिया, तम्बोली समाज की एक उपजाति हैं। तम्बोली शब्द की उत्पति संस्कृत शब्द "ताम्बुल" से हुई हैं जिसका अर्थ "पान" होता हैं। चौऋषिया समाज के लोगो द्वारा नागदेव को अपना कुलदेव माना जाता हैं तथा चौऋषिया समाज के लोगो को नागवंशी भी कहा जाता हैं। नागपंचमी के दिन चौऋषिया समाज द्वारा ही नागदेव की पूजा करना प्रारम्भ किया गया था तत्पश्चात सम्पूर्ण भारत में नागपंचमी पर नागदेव की पूजा की जाने लगी। नागदेव द्वारा चूहों से नागबेल (जिस पर पान उगता हैं) कि रक्षा की जाती हैं।चूहे नागबेल को खाकर नष्ट करते हैं। इस नागबेल (पान)से ही समाज के लोगो का रोजगार मिलता हैं।पान का व्यवसाय चौरसिया समाज के लोगो का मुख्य व्यवसाय हैं।इस हेतू समाज के लोगो ने अपन