Skip to main content

देश को अनेक वराह मिहिर प्रदान करें शिक्षण संस्थान - कुलपति प्रो पांडेय

देश को अनेक वराह मिहिर प्रदान करें शिक्षण संस्थान - कुलपति प्रो  पांडेय

स्टेनफोर्ड स्कूल में हुआ अटल टिंकरिंग लेब का शुभारंभ


उज्जैन। विद्यार्थियों की विज्ञान में अभिरुचि बढ़ रही है, देश को नित नए प्रयोगों द्वारा तकनीकी तौर पर और भी सशक्त करने में अपना योगदान दे सकें इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर स्टैनफोर्ड इंटरनेशनल स्कूल में अटल टिंकरिंग लैब का शुभारंभ किया गया ।

इस तरह के लैब की स्कूल में शुरुआत होने से बच्चों में क्रिएटिविटी उत्पन्न होगी। एक ही आईडिया से कुछ नया बना देने के उद्देश्य से दिल्ली के एनडीएमसी विद्यालय में 2019 में यह शुरुआत की गई थी।

स्टैनफोर्ड इंटरनेशनल स्कूल के निदेशक डॉक्टर कात्यायन मिश्र, डॉ जया मिश्र, टिंकू अग्निहोत्री, रमा अग्निहोत्री, प्राचार्य श्रीमती साधना वालिया, वाइस प्रिंसिपल विकास जोशी, कोऑर्डिनेटर श्रीमती तरन्नुम कोठारी एवं स्टैनफोर्ड के समस्त शिक्षकवृन्द के अथक प्रयासों एवं सराहनीय योगदान से यह संभव हो सका है। इस लैब का उद्घाटन  विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के कुलपति अखिलेश कुमार पांडेय के कर कमलों द्वारा हुआ।

 इस उपलक्ष्य पर कुलपति डॉक्टर अखिलेश कुमार पांडेय ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि उज्जैन काल गणना एवं विज्ञान का केंद्र रहा है,यहां के शिक्षकों पर दोहरी जिम्मेदारी का भार है कि वे विद्यार्थियों में तकनीकी एवं कलात्मकता का समागम करते हुए शिक्षा जगत को अनेक वराहमिहिर प्रदान करें। अतिथि न्यूरोलॉजिस्टडॉ रूपेश खत्री ने कहा कि बच्चों में बाल्यावस्था से ही अनेक टूल्स से खेलते हुए उसका सकारात्मक उपयोग करना सीखें और साइंस विद फन की विचारधारा को आगे बढ़ाएं। विद्यालय प्रबंधन समिति के सदस्य , व्यवस्थापक तथा शहर के अन्य सदस्य भी इस अवसर पर उपस्थित थे। अतुल पाटीदार इस लेब के संचालक होंगे। विद्यालय परिवार अपने विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य तथा आगे चलकर पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की तरह राष्ट्रहित में अपना योगदान देकर देश में स्वास्थ्य सुधार ,उन्नत राष्ट्र की स्थापना कर सके ऐसी कामना कार्यक्रम में की गई ।उक्त जानकारी वाइस प्रिंसिपल विकास जोशी ने दी।

Comments

Popular posts from this blog

आधे अधूरे - मोहन राकेश : पाठ और समीक्षाएँ | मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे : मध्यवर्गीय जीवन के बीच स्त्री पुरुष सम्बन्धों का रूपायन

  आधे अधूरे - मोहन राकेश : पीडीएफ और समीक्षाएँ |  Adhe Adhure - Mohan Rakesh : pdf & Reviews मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और कथाकार मोहन राकेश का जन्म  8 जनवरी 1925 को अमृतसर, पंजाब में  हुआ। उन्होंने  पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए उपाधि अर्जित की थी। उनकी नाट्य त्रयी -  आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे भारतीय नाट्य साहित्य की उपलब्धि के रूप में मान्य हैं।   उनके उपन्यास और  कहानियों में एक निरंतर विकास मिलता है, जिससे वे आधुनिक मनुष्य की नियति के निकट से निकटतर आते गए हैं।  उनकी खूबी यह थी कि वे कथा-शिल्प के महारथी थे और उनकी भाषा में गज़ब का सधाव ही नहीं, एक शास्त्रीय अनुशासन भी है। कहानी से लेकर उपन्यास तक उनकी कथा-भूमि शहरी मध्य वर्ग है। कुछ कहानियों में भारत-विभाजन की पीड़ा बहुत सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुई है।  मोहन राकेश की कहानियां नई कहानी को एक अपूर्व देन के रूप में स्वीकार की जाती हैं। उनकी कहानियों में आधुनिक जीवन का कोई-न-कोई विशिष्ट पहलू उजागर

मालवी भाषा और साहित्य : प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा

MALVI BHASHA AUR SAHITYA: PROF. SHAILENDRAKUMAR SHARMA पुस्तक समीक्षा: डॉ श्वेता पंड्या Book Review : Dr. Shweta Pandya  मालवी भाषा एवं साहित्य के इतिहास की नई दिशा  लोक भाषा, लोक साहित्य और संस्कृति का मानव सभ्यता के विकास में अप्रतिम योगदान रहा है। भाषा मानव समुदाय में परस्पर सम्पर्क और अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। इसी प्रकार क्षेत्र-विशेष की भाषा एवं बोलियों का अपना महत्त्व होता है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति से जुड़े विशाल वाङ्मय में मालवा प्रदेश, अपनी मालवी भाषा, साहित्य और संस्कृति के कारण महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ की भाषा एवं लोक-संस्कृति ने  अन्य क्षेत्रों पर प्रभाव डालते हुए अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। मालवी भाषा और साहित्य के विशिष्ट विद्वानों में डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। प्रो. शर्मा हिन्दी आलोचना के आधुनिक परिदृश्य के विशिष्ट समीक्षकों में से एक हैं, जिन्होंने हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं के साथ-साथ मालवी भाषा, लोक एवं शिष्ट साहित्य और संस्कृति की परम्परा को आलोचित - विवेचित करने का महत्त्वपूर्ण एवं सार्थक प्रयास किया है। उनकी साह

हिंदी कथा साहित्य / संपादक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा

हिंदी कथा साहित्य की भूमिका और संपादकीय के अंश : किस्से - कहानियों, कथा - गाथाओं के प्रति मनुष्य की रुचि सहस्राब्दियों पूर्व से रही है, लेकिन उपन्यास या नॉवेल और कहानी या शार्ट स्टोरी के रूप में इनका विकास पिछली दो सदियों की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। हिंदी में नए रूप में कहानी एवं उपन्यास  विधा का आविर्भाव बीसवीं शताब्दी में हुआ है। वैसे संस्कृत का कथा - साहित्य अखिल विश्व के कथा - साहित्य का जन्मदाता माना जाता है। लोक एवं जनजातीय साहित्य में कथा – वार्ता की सुदीर्घ परम्परा रही है। इधर आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य का विकास संस्कृत - कथा - साहित्य अथवा लोक एवं जनजातीय कथाओं की समृद्ध परम्परा से न होकर, पाश्चात्य कथा साहित्य, विशेषतया अंग्रेजी साहित्य के प्रभाव रूप में हुआ है।  कहानी कथा - साहित्य का एक अन्यतम भेद और उपन्यास से अधिक लोकप्रिय साहित्य रूप है। मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना - सुनना मानव का स्वभाव बन गया। सभी प्रकार के समुदायों में कहानियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में तो कहानियों की सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा रही है। वेद - उपनिषदों में वर्णित यम-य