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हमारी समृद्ध परंपरा और मर्यादापूर्ण जीवन का पर्व है संजा

हमारी समृद्ध परंपरा और मर्यादापूर्ण जीवन का पर्व है संजा

संजा लोकोत्सव के अंतर्गत हुआ अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

लोक एवं जनजातीय साहित्य और संस्कृति : विविध आयाम विषय पर विमर्श के लिए जुटे देश दुनिया के विद्वान


उज्जैन : देश की प्रतिष्ठित संस्था प्रतिकल्पा सांस्कृतिक संस्था द्वारा आयोजित संजा लोकोत्सव के अंतर्गत उद्घाटन दिवस पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी में लोक एवं जनजातीय साहित्य और संस्कृति : विविध आयाम विषय पर विमर्श के लिए देश दुनिया के विद्वानों ने भाग लिया। यह आठ दिवसीय लोकोत्सव वरिष्ठ रंगकर्मी और प्रतिकल्पा के संस्थापक अध्यक्ष स्व श्री गुलाबसिंह यादव की स्मृति को समर्पित है। आयोजन में विशेषज्ञ विद्वान के रूप में वरिष्ठ लोक संस्कृतिविद डॉ पूरन सहगल, मनासा, डॉ श्रीनिवास शुक्ल सरस, सीधी, श्री सुरेश चंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो नॉर्वे, डॉ शिव चौरसिया, प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा, उज्जैन, श्रीमती नारायणी माया बधेका, बेंगलुरु, डॉ जगदीश चंद्र शर्मा, उज्जैन ने अपने विचार व्यक्त किए।

मुख्य अतिथि डॉ पूरन सहगल, मनासा ने कहा कि संजा पर्व हमारी परंपरा और मर्यादापूर्ण जीवन का पर्व है। यह पर्व कृषि कर्म और गौ संरक्षण की संस्कृति से जुड़ा है। संजा के माध्यम से किशोरियां अपने परिवार की संपन्नता की कामना करती हैं। लोक गीतों में मंगल भावना निहित है। गौसंवर्धन की कड़ी में गोवर्धन पूजा की जाती है।

ओस्लो, नॉर्वे से श्री सुरेश चंद्र शुक्ल शरद आलोक ने कहा कि लोक संस्कृति भारत की संस्कृति की अमूल्य धरोहर है। देश विदेश में लोक साहित्य और संस्कृति के प्रसार के लिए व्यापक प्रचार की जरूरत है।

प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने कहा कि संजा हमें अखिल ब्रह्मांडीय चेतना से जोड़ता है। लोक एवं जनजातीय संस्कृति में वैदिक संस्कृति और प्रागैतिहासिक काल की संस्कृति का सातत्य दिखाई देता है। सूरज, चांद सहित मनुष्य जीवन के मूलभूत उपादानों का कलामय संसार लोक संस्कृति में उतरता है। बिगड़ते हुए पारिस्थितिकीय तंत्र और जलवायु परिवर्तन के खामियाजे से बचने के लिए हमें लोक संस्कृति के साथ अपने रिश्तों को सुदृढ़ करना होगा।

डॉ शिव चौरसिया ने कहा कि लोक साहित्य प्रेम और सद्भाव का पाठ सिखाता है। लोक गीतों में छुपे जीवन के मर्म को पहचानने के लिए सजगता जरूरी है। लोक एवं जनजातीय संस्कृति मनुष्य धर्म को प्रतिष्ठित करते हैं।

डॉ श्रीनिवास शुक्ल सरस, सीधी ने कहा कि लोक साहित्य में स्त्री मन की संवेदनाओं का अंकन हुआ है। बघेली लोक साहित्य में सुहागवा गीतों की समृद्ध परंपरा रही है, जो स्त्री जीवन के विशिष्ट पक्षों को उद्घाटित करते हैं।

नारायणी माया बधेका, बेंगलुरु ने कहा कि संजा को मालवजन बेटी के रूप में मानते हैं। उन्होंने दो संजा गीतों की प्रस्तुति की। शोध पत्र वाचन सत्र की अध्यक्षता डॉ जगदीश चंद्र शर्मा ने की। उन्होंने कहा कि संजा पर्व का प्रचलन देश के कई क्षेत्रों में है। उसमें विविधता के साथ लोक और अभिजन की वैचारिक दृष्टि के दर्शन होते हैं।

शोध सत्र में डॉ अजय शर्मा, श्रीमती शिक्षा देवी, हरियाणा, लता राव, मंदसौर, संगीता मिर्धा, होशंगाबाद, डॉ रूपाली सारये, पूजा पाटीदार, सन्दीप पांडेय, लखनऊ, कल्पना पाल, कानपुर, डॉ श्वेता पंड्या, डॉ शोभना तिवारी, रतलाम, प्रवीण कुमार वशिष्ठ, अनूप कुमार जमरे, दयाराम नर्गेश, रणधीर अथिया आदि सहित देश के विविध लोक अंचलों के अनेक मनीषी और अध्येतागण ने लोक एवं जनजातीय साहित्य और संस्कृति के विभिन्न पहलुओं के साथ उनकी समकालीन प्रासंगिकता पर विचार प्रस्तुत किए। इस सत्र में श्रेष्ठ शोध पत्रों के लिए पांच शोधकर्ताओं को सम्मानित किया गया।

प्रारम्भ में स्वागत प्रतिकल्पा सांस्कृतिक संस्था की निदेशक डॉ पल्लवी किशन, संस्था सचिव श्री कुमार किशन एवं डॉ धर्मेंद्र सिंह यादव ने किया। पं सूर्यनारायण व्यास संकुल, कालिदास संस्कृत अकादमी, कोठी रोड, उज्जैन में दिनांक 26 सितंबर, रविवार, दोपहर में आयोजित इस संगोष्ठी में देश के विभिन्न प्रांतों के अध्येताओं ने भाग लिया। इस महत्वपूर्ण शोध संगोष्ठी में अनेक लोक संस्कृति प्रेमियों, प्रबुद्धजनों और गणमान्य नागरिकों ने सहभागिता की।

उद्घाटन समारोह का संचालन डॉ जगदीश चंद्र शर्मा एवं शोध सत्र का संचालन डॉ रूपाली सारये ने किया। आभार प्रदर्शन प्रचार सचिव डॉ धर्मेंद्र सिंह यादव एवं डॉ पुष्पा चौरसिया ने किया।

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