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गहरी संकल्प शक्ति और समर्पण की आवश्यकता है शोध में – कुलपति प्रो पांडेय

गहरी संकल्प शक्ति और समर्पण की आवश्यकता है शोध में – कुलपति प्रो पांडेय 

इक्कीसवीं सदी में शोध की स्थिति और नवीन संभावनाओं पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन संपन्न

उज्जैन : विक्रम विश्वविद्यालय की हिंदी अध्ययनशाला और गांधी अध्ययन केंद्र में इक्कीसवीं सदी में शोध की स्थिति और नवीन संभावनाओं पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन वाग्देवी भवन के संगोष्ठी सभागार में किया गया। संगोष्ठी की अध्यक्षता कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पांडेय ने की। मुख्य अतिथि डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के हिंदी एवं संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो आनंद प्रकाश त्रिपाठी थे। विशिष्ट अतिथि लोक संस्कृतिविद डॉक्टर पूरन सहगल, मनासा, नीमच एवं डॉक्टर श्रीनिवास शुक्ल सरस, सीधी थे। विषय प्रवर्तन विक्रम विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष एवं कुलानुशासक प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा ने किया। 


कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पांडेय ने संबोधित करते हुए कहा कि श्रेष्ठ शोध के लिए गहरी संकल्प शक्ति और समर्पण की आवश्यकता होती है। शोधकर्ता मानविकी और समाज विज्ञान के क्षेत्र में शोध की नई संभावनाओं को लेकर सजग हों। भारतीय परिवेश में संस्कृति, परिवार और समाज जीवन की जड़ों से जुड़ा रहना बेहद जरूरी है। 

प्रो आनन्द प्रकाश त्रिपाठी, सागर ने कहा कि शोध करते हुए नएपन की ओर रूझान होना चाहिए। वर्तमान में अनुसंधान में  बढ़ती शॉर्टकट की संस्कृति पर अंकुश लगाने की जरूरत है। एक शोधकर्ता को स्वयं का निंदक बनना चाहिए, तभी अनुसंधान में गुणवत्ता लाना संभव है। प्रो त्रिपाठी ने खंडहर, दरवाजा, कवि और स्त्री शीर्षक कविताओं का पाठ किया।   


डॉ पूरन सहगल, मनासा ने कहा कि लोक संस्कृति के क्षेत्र में शोध कार्य के लिए अनेक प्रकार की समस्याएं आती हैं, किंतु एक श्रेष्ठ शोधकर्ता निरंतर परिश्रम और साधना से इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कर सकता है। उन्होंने शोधकर्ताओं को इस क्षेत्र में नई तकनीक के इस्तेमाल का आह्वान किया।

बघेली संस्कृति के विशेषज्ञ डॉ श्रीनिवास शुक्ला सरस, सीधी ने कहा कि वर्तमान दौर में लोक साहित्य एवं संस्कृति की अनेक विधाएं विलुप्ति की ओर जा रही हैं। उनके संरक्षण एवं संवर्धन के लिए शोधकर्ताओं को आगे आना होगा।

प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि शोध एक अविराम प्रक्रिया है। ज्ञान क्षेत्र के विस्तार के लिए शोधार्थी नवीन विषय क्षेत्रों की ओर प्रवृत्त हों। लोक एवं जनजातीय साहित्य एवं संस्कृति के क्षेत्र में शोध की असीम संभावनाएं हैं। इन शोध क्षेत्रों से जुड़ी चुनौतियां को पहचान कर शोधार्थी वैज्ञानिक ढंग से अनुसंधान कार्य करें।

रतलाम के प्रो प्रकाश उपाध्याय ने पावस पर केंद्रित सुमधुर गीत सुनाया। कार्यक्रम में डॉ जगदीश चंद्र शर्मा, डॉ प्रतिष्ठा शर्मा, हृदयनारायण तिवारी, दमोह आदि ने भी विचार व्यक्त किए। आयोजन में प्रत्यक्ष एवं आभासी पटल पर उपस्थित विभिन्न प्रांतों के अध्येताओं और शोधकर्ताओं ने भाग लिया।

कार्यक्रम का संचालन डॉ जगदीश चंद्र शर्मा एवं डॉ संदीप पांडे ने किया। आभार प्रदर्शन डॉ प्रकाश उपाध्याय, रतलाम ने किया।

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