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भारत के आत्म स्वाभिमान और गुलामी से मुक्ति की प्रतीक है हिंदी – प्रो शर्मा

भारत के आत्म स्वाभिमान और गुलामी से मुक्ति की प्रतीक है हिंदी  – प्रो शर्मा 

हिन्दी सेवियों का अभिनंदन एवं भाषा गौरव सम्मान अलंकरण का आयोजन सम्पन्न 


प्रतिष्ठित संस्था राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना द्वारा 18 वें वर्ष में प्रतिवर्षानुसार देश के प्रतिष्ठित हिन्दी सेवियों का अभिनंदन एवं भाषा गौरव सम्मान से सम्मानित किया गया। लोकमान्य तिलक शिक्षा महाविद्यालय, उज्जैन के सभागार में  आयोजित इस समारोह के मुख्य अतिथि श्री दिवाकर नातू, वरिष्ठ शिक्षाविद् एवं पूर्व अध्यक्ष, सिंहस्थ प्राधिकरण, मुख्य वक्ता प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा, कला संकायाध्यक्ष, विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन थे। अध्यक्षता श्री ब्रजकिशोर शर्मा राष्ट्रीय अध्यक्ष, राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना ने की। विशिष्ट अतिथि लोकमान्य तिलक शैक्षणिक न्यास के मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री गिरीश भालेराव एवं महासचिव डॉ प्रभु चौधरी थे। इस अवसर पर विश्वभाषा हिंदी :  नए क्षितिज की ओर विषय पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

समारोह में डॉ. जगदीशचन्द्र शर्मा, एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी अध्ययनशाला, डॉ. हरीश कुमार सिंह, पूर्व अधिकारी, भारतीय जीवन बीमा निगम, श्री राजेन्द्र श्रोत्रिय, वरिष्ठ कवि,  जावरा (रतलाम) एवं श्रीमती जिज्ञासा गोस्वामी, साहित्यकार, अलीगढ़ को हिंदी सेवा सम्मान अलंकरण से सम्मानित किया गया। प्राध्यापिका डॉ मनीषा ठाकुर को श्रेष्ठ शिक्षिका सम्मान से अलंकृत किया गया।

इस अवसर पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित करते हुए शिक्षाविद श्री दिवाकर नातू ने कहा कि वर्तमान दौर में हिंदी को लेकर गौरव को का भाव जाग्रत करने की जरूरत है। हिंदी को लेकर प्रत्येक देशवासी को संकल्पबद्ध होना होगा। हम सभी समयबद्ध लक्ष्य निर्धारित करते हुए हिंदी का संवर्धन करने के लिए आगे आएं।

विक्रम विश्वविद्यालय के कुलानुशासक प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि लोक स्वीकार्यता और सहज ग्राह्यता ने हिंदी को महत्त्वपूर्ण आयाम दिए हैं। यह भाषा अनेक सदियों से इस देश को एक सूत्र में बांधने का कार्य कर रही है। राष्ट्रीय एकता, सद्भाव और स्वाभिमान से जुड़ी अनेक लोक आकांक्षाओं की पूर्ति हिंदी के माध्यम से होती है। इसे राजभाषा के रूप में अंगीकार करते हुए हमने सदियों की गुलामी की बेड़ियों को तोड़कर स्वदेशाभिमान का प्रकटीकरण किया। विश्व के कोने-कोने में बसे भारतवंशी इसे परस्पर संपर्क और भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़े रहने का माध्यम बनाए हुए हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के साथ हिंदी की अकल्पनीय संभावनाओं के द्वार खुल गए हैं।

शिक्षाविद श्री ब्रजकिशोर शर्मा ने कहा कि हिंदी ने आज संपूर्ण दुनिया में अपनी महत्ता सिद्ध कर दी है। हिंदी की अनेक विशेषताएं संस्कृत से आई हैं। संस्कृत ने खगोल, योग, चिकित्सा, भूगर्भ आदि क्षेत्रों का महत्वपूर्ण ज्ञान संजोया है। विदेशी मूल के अनेक लेखक हिंदी में लेखन कर रहे हैं। हिंदी भारत माता के ललाट की बिंदी है। इसका महत्व सदैव रहेगा।

प्रारंभ में आयोजन की पीठिका एवं संस्था का प्रतिवेदन महासचिव डॉ प्रभु चौधरी ने प्रस्तुत किया। संगोष्ठी में विचार व्यक्त करते हुए डॉक्टर जगदीश चंद्र शर्मा ने कहा कि भाषा एक ऐसी संपत्ति है, जो व्यापक संसार से हमें जोड़ती है। हम भाषा के ऋण से कभी मुक्त नहीं हो सकते। हिंदी कई तूफानों को पार करती हुई आगे बढ़ी है। इसे ज्ञान विज्ञान के साधन के रूप में समृद्ध करने के उपाय आवश्यक हैं। हिंदी चिंतन और विमर्श की भाषा बने, यह जरूरी है। आयोजन में संस्था के द्विमासिक पत्र संचेतना समाचार एवं भारत सरकार की पत्रिका सामाजिक न्याय सन्देश का लोकार्पण अतिथियों द्वारा किया गया। 

इस अवसर पर डॉ हरीश कुमार सिंह, डॉ संतोष पंड्या आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए। जावरा के कवि श्री राजेंद्र श्रोत्रिय ने गीत सुनाया, जिसकी पंक्तियां थीं, बावरे बनकर जिंदगी नचाते रहे, मन में था अंधेरा मंदिरों में दीये हम जलाते रहे। सरस्वती वंदना सुश्री ज्योति विजयवर्गीय ने की। अतिथि स्वागत आयोजन समिति के डॉ. रश्मि पंड्या, प्राचार्य, डॉ. रेखा भालेराव, श्री प्रवीण जोशी आदि ने किया। आयोजन में श्री रमेश मनोहरा, जावरा, डॉ ख्याति पुरोहित, अहमदाबाद, श्री प्रवीण जोशी, श्री सुनील शर्मा, श्री मनोहर सिंह मधुकर, जावरा, डॉ मोहन बैरागी, श्री राहुल शर्मा आदि सहित अनेक हिंदी सेवी उपस्थित थे। 

संचालन प्राध्यापिका डॉ रेखा भालेराव ने किया। आभार प्रदर्शन प्राचार्य डॉ रश्मि पंड्या ने किया। 

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