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आजादी के अमर वीरों ने त्रासद स्थितियों को झेल कर हमें स्वतंत्र कराया – कुलपति प्रो पांडेय ; आजादी का अमृत महोत्सव के अंतर्गत भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में मालवा की भूमिका पर परिसंवाद का आयोजन हुआ

आजादी के अमर वीरों ने त्रासद स्थितियों को झेल कर हमें स्वतंत्र कराया – कुलपति प्रो पांडेय

आजादी का अमृत महोत्सव के अंतर्गत भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में मालवा की भूमिका पर परिसंवाद का आयोजन हुआ


उज्जैन : विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन द्वारा आजादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत दिनांक 6 अगस्त, शुक्रवार दोपहर को शलाका दीर्घा सभागार में कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पांडेय की अध्यक्षता में महत्त्वपूर्ण परिसंवाद का आयोजन किया गया। यह परिसंवाद भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में मालवा की भूमिका पर केंद्रित था। आयोजन के मुख्य वक्ता अश्विनी शोध संस्थान, महिदपुर के निदेशक डॉ आर सी ठाकुर, कला संकायाध्यक्ष प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा, कुलसचिव डॉ प्रशांत पुराणिक, विश्वविद्यालय के प्रा. भा. इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व अध्ययनशाला के विभागाध्यक्ष डॉ धीरेंद्र सोलंकी ने विषय के विविध पहलुओं पर प्रकाश डाला। परिसंवाद को संबोधित करते हुए कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पांडेय ने कहा कि स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए हमें बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। हमारे अनेक वीरों ने बड़ी त्रासद स्थितियों को झेल कर हमें आज़ाद कराया। युवा पीढ़ी स्वतंत्रता सेनानियों की महान कुर्बानी को याद करे। आजादी के अमृत महोत्सव के माध्यम से हम अनजाने और अनसुने शहीदों के बारे में जानें, जिनके कारण आज हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं। स्वतंत्रता संघर्ष के दस्तावेजीकरण के लिए विभिन्न क्षेत्रों के शोधकर्ता आगे आएँ।

प्रमुख वक्ता अश्विनी शोध संस्थान, महिदपुर के निदेशक एवं मुद्रा शास्त्री डॉ आर सी ठाकुर ने कहा कि स्वतंत्रता संघर्ष में मालवा के महिदपुर नगर के सैकड़ों वीरों ने अपना योगदान दिया। महिदपुर के क्रांतिकारियों ने न केवल मालवा में स्वतंत्रता की अलख जगाई, उन्होंने आगरा के किले पर भी वर्चस्व स्थापित कर लिया था। 1941 में महिदपुर में प्रजामंडल के अधिवेशन में शामिल हुए अनेक सेनानियों को कारागार में डाल दिया गया था। नई पीढ़ी को अमर सेनानियों के समर्पण और उत्सर्ग के स्थलों के दर्शन करना चाहिए। स्वतंत्रता संघर्ष के दौर में मुद्रा को लेकर भी संघर्ष हुआ था। अंग्रेजों ने देश के अनेक राज्यों को मुद्राओं पर ब्रिटिश शासकों के चित्र और नाम अंकित करने के लिए बाध्य किया था। गोवा की आजादी के लिए योगदान देने वाले सेनानियों का भी स्मरण किया जाना चाहिए। आज इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता है। कुलानुशासक प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि 1857 की क्रांति एक राष्ट्रीय क्रांति थी। यह शताब्दियों से गुलामी की बेड़ियों में जकड़े भारतवासियों के आक्रोश की स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी। ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने का यह सबसे सफल जन आंदोलन था। मौखिक साहित्य के माध्यम से इस क्रांति के महत्वपूर्ण आयाम उद्घाटित होते हैं। महासमर में सोंधवाड़ - मालवांचल की असाधारण भूमिका रही है। कलसिया के वीर अमर जी, अभय जी, लालजी, महिदपुर के हीरासिंह जमादार, आलोट के समियत खाँ, फरीद खाँ, करनाली के बापू खाँ दण्डी, आगर एवं महिदपुर छावनी के विद्रोही सैनिकों की आहुति व्यर्थ नहीं गई है। भारतवासियों के खोए हुए आत्मगौरव और उत्साह को लौटाने में इन रणबाँकुरों के उत्सर्ग ने अविस्मरणीय भूमिका निभाई। उन्होंने एक ओर अंग्रेज शासकों और सामंतों की आँखें खोल दी, वहीं उन्हें अपनी रीति-नीति बदलने को बाध्य कर दिया। इस क्रांति के बाद ब्रिटिश सत्ता द्वारा प्रशासनिक एवं आर्थिक क्षेत्र में किए गए व्यापक बदलाव इस बात की ओर इशारा करते हैं कि 1857 के महासमर ने उन्हें अन्दर से हिलाकर रख दिया था। कुलसचिव डॉ प्रशांत पुराणिक ने कहा कि अंग्रेजों के विरुद्ध सबसे पहला विद्रोह किसानों ने किया था। आम जनता, सैनिकों, साधुओं और छोटी-बड़ी रियासतों के रियासतदारों ने आजादी के आंदोलन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मालवा के सदाशिव राव नेखुलकर, हीरासिंह जमादार जैसे अनेक क्रांतिकारियों ने अविस्मरणीय योगदान दिया। मालवा में महिदपुर, महू, बड़वानी, मंडलेश्वर, शुजालपुर, आगर जैसे अनेक नगर क्रांतिकारियों की गतिविधियों के केंद्र रहे हैं। पुर्तगालियों के अधीन रहे गोवा की आजादी में मालवा के कई क्रांतिकारियों ने उल्लेखनीय योगदान दिया।

डॉ धीरेंद्र सोलंकी ने कहा कि 1805 में क्रांतिकारियों की संधि हुई थी। उसकी स्मृति में सिक्का जारी हुआ था, जो उस काल का महत्वपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्य है। महिदपुर के अनेक विद्रोही सैनिकों और वीरों का योगदान अविस्मरणीय है। अमझेरा के राजा बख्तावर सिंह ने स्वतंत्रता संघर्ष में अपने प्राणों की आहुति दी थी। उज्जैन में पद्मभूषण पं. सूर्यनारायण व्यास के निवास पर चंद्रशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी ठहरे थे। मालवा के राष्ट्रीय चेतना के कवि बालकृष्ण शर्मा नवीन की क्रांतिकारियों के साथ गहरी मित्रता थी। उज्जैन के राजा भाऊ महाकाल ने गोवा मुक्ति के लिए अनुपम बलिदान दिया। आयोजन में विश्वविद्यालय के अतिथि शिक्षक डॉ धर्मेंद्र सिंह की पुस्तक सार्वजनिक अर्थशास्त्र का विमोचन अतिथियों द्वारा किया गया। प्रारम्भ में अतिथियों का स्वागत विद्याथी कल्याण संकायाध्यक्ष डॉ सत्येंद्रकिशोर मिश्रा, आयोजन के समन्वयक डॉ जगदीश चंद्र शर्मा, डॉ गणपत अहिरवार, डॉ विश्वजीत सिंह परमार, प्रो प्रेमलता चुटैल, प्रो गीता नायक, प्रो अलका व्यास, डॉ डी डी बेदिया, डॉ सुधीर जैन, डॉ धर्मेंद्र मेहता, डॉ अजय शर्मा, श्री कमल जोशी आदि ने किया। आयोजन में विभिन्न अध्ययनशाला और महाविद्यालय के शिक्षक, कर्मचारी और शोधकर्ता उपस्थित थे। परिसंवाद का संचालन डॉ विश्वजीत सिंह परमार ने किया। आभार प्रदर्शन विद्याथी कल्याण संकायाध्यक्ष डॉ सत्येंद्रकिशोर मिश्रा ने किया।

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