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प्राणी जगत के मूल आधारों पर कार्य किया लोक देवता देवनारायण जी ने - प्रो. शर्मा ; अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी में हुआ लोक देवता देवनारायण जी : संस्कृति और पर्यावरण को योगदान पर मंथन

प्राणी जगत के मूल आधारों पर कार्य किया लोक देवता देवनारायण जी ने - प्रो. शर्मा

अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी में हुआ लोक देवता देवनारायण जी : संस्कृति और पर्यावरण को योगदान पर मंथन 

प्रतिष्ठित संस्था देव चेतना परिषद, उज्जैन द्वारा  लोक देवता देवनारायण जी : संस्कृति और पर्यावरण को योगदान पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी के प्रमुख अतिथि पूर्व कैबिनेट मंत्री, राजस्थान श्री कालूलाल गुर्जर, भीलवाड़ा थे। मुख्य अतिथि  विक्रम विश्वविद्यालय के कुलानुशासक एवं हिंदी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर शैलेंद्र कुमार शर्मा थे। आयोजन में विशिष्ट अतिथि नागरी लिपि परिषद के महामंत्री डॉ हरिसिंह पाल, नई दिल्ली, वरिष्ठ प्रवासी साहित्यकार श्री सुरेश चंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे, संस्था के अध्यक्ष डॉ प्रभु चौधरी, डॉ राकेश छोकर आदि ने विषय के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। संगोष्ठी की अध्यक्षता अखण्ड भारत गुर्जर महासभा, जयपुर के अध्यक्ष श्री देवनारायण गुर्जर ने की। सूत्र संयोजन डॉ शिवा लोहारिया, जयपुर ने किया। अखण्ड भारत गुर्जर महासभा की साहित्यिक संस्था देव चेतना परिषद द्वारा संगोष्ठी के बाद राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक का आयोजन किया गया, जिसमें अनेक निर्णय लिए गए।

संगोष्ठी में पूर्व कैबिनेट मंत्री श्री कालू लाल गुर्जर, भीलवाड़ा ने कहा कि देव नारायण जी ने प्राकृतिक संपदा के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने नीम के वृक्ष को विशेष मान दिया, जो पर्यावरण को शुद्ध रखने के साथ-साथ औषधि के रूप में उपयोग में आता है। उनके परिवार के पास 9 लाख 80 हजार गायें मौजूद थीं। उस दौर में उन्होंने प्रकृति के संरक्षण पर बल दिया। उनके मंदिरों के आसपास पर्याप्त आकार में जंगल छोड़े जाते हैं। देवनारायण जी के  पर्यावरण विचार को जन जन तक पहुंचाने के प्रयास होने चाहिए



संगोष्ठी में व्याख्यान देते हुए  विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के  कला संकायाध्यक्ष प्रोफेसर शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि सदियों से  देवनारायण जी जाग्रत देव के रूप में पश्चिम एवं मध्य भारत के लोक आस्था के केंद्र बने हुए हैं। उन्हें विष्णु के अवतार के रूप में पूजा जाता है। उन्होंने प्राणी जगत के मूल आधारों पर कार्य किया।  वन संपदा, पशुधन, जल स्रोतों और चरागाहों के रक्षक और पोषक के रूप में उनका योगदान अविस्मरणीय है। उन्होंने सिद्ध किया कि अन्न धन और पशुधन ही वास्तविक धन है, जिसकी रक्षा के लिए देवनारायण जी का त्याग, तपस्या और उत्सर्ग आज भी रोमांचित करता है। उनके जीवन चरित्र पर आधारित अनेक लोक गाथाएं जातीय स्मृतियों और जीवन मूल्यों को प्रतिबिंबित करती हैं। उनकी गाथाएँ भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक भूगोल, इतिहास और जातीय स्मृतियों की जीवंत दस्तावेज हैं। उन्होंने नए प्रकार की सामाजिक संरचना और समतामूलक संस्कृति की आधारशिला रखी। कर्मकांड और बाह्याडंबर का उन्होंने प्रतिरोध किया। समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ते हुए उन्होंने परस्पर प्रेम, भाईचारे और समरसता का संदेश दिया, जो वर्तमान में अत्यंत प्रासंगिक सिद्ध हो रहा है। 


अध्यक्षता करते हुए अखण्ड भारत गुर्जर महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष  डॉ देवनारायण गुर्जर, जयपुर ने कहा कि देवनारायण जी प्रत्यक्ष रूप में विष्णु का अवतार थे। उनके चरित्र और लीलाओं के संदर्भ में सांस्कृतिक योगदान को जानना आवश्यक है। उनकी शिक्षाओं का क्षेत्र व्यापक है। गुर्जर संस्कृति की पहचान है, स्वाभिमान के साथ जीना और अन्य वर्ग के लोगों को भी स्वाभिमान से जोड़ना। देवनारायण जी ने शोषित एवं वंचित वर्ग को सम्मान दिलवाया। उन्होंने आयुर्वेद को महत्व दिया। वर्तमान सांस्कृतिक संक्रमण और पर्यावरणीय संकट के दौर में देवनारायण जी के संदेश की प्रासंगिकता है। देवनारायण जी ने ईटों के रूप में पूजे जाने और पूजा में नीम के पत्तों के प्रयोग पर बल दिया। प्रकृति के साथ जुड़ाव का इस प्रकार का कोई दूसरा उदाहरण देखने को नहीं मिलता है। उन्होंने अत्याचारियों के अन्याय से मुक्त होने के लिए वंचित और पिछड़े वर्ग के लोगों को सम्मान दिलाया। 


विशिष्ट अतिथि डॉ हरिसिंह पाल, नई दिल्ली में कहा कि प्राचीन युग से भारत में पर्यावरण को संस्कृति और धर्म के साथ महत्वपूर्ण स्थान मिला है। देवनारायण जी ने समाज में संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। उस दौर में अत्यंत सीमित आर्थिक संसाधन थे, फिर भी अंतःप्रज्ञा के माध्यम से समाज सुधार का कार्य किया गया। विकास के नाम पर आज जंगल काटे जा रहे हैं। कृषि भूमि और चरागाह संकट में हैं। ऐसे में देवनारायण जी द्वारा दिए गए संदेशों को चरितार्थ करने की आवश्यकता है। देवनारायण जी पर केंद्रित साहित्य को नई पीढ़ी के सम्मुख लाने के प्रयास किए जाएं।

वरिष्ठ प्रवासी साहित्यकार श्री सुरेशचंद्र शुक्ल शरद आलोक, ऑस्लो, नॉर्वे ने कहा कि श्री देवनारायण जी से संबंधित साहित्य और इतिहास को व्यापक फलक पर प्रसारित करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि वे देवनारायण जी के जीवन प्रसंगों से जुड़े साहित्यिक अंशों का अनुवाद नार्वेजीयन भाषा में करेंगे।

अतिथि परिचय संस्था के अध्यक्ष डॉक्टर प्रभु चौधरी ने विषय की प्रस्तावना प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि संस्था द्वारा देवनारायण जी के आदर्शों के अनुरूप साहित्य एवं समाजसेवा के क्षेत्र में कार्य किया जा रहा है। 


डॉ राकेश छोकर, नई दिल्ली ने कहा कि देवनारायण जी ने केवल किसी क्षेत्र विशेष ही नहीं, वरन संपूर्ण पृथ्वी लोक के संरक्षण का संदेश दिया। उन्होंने सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में सुप्त अवस्था से लोगों को जगाया और मानव मूल्यों की प्रतिष्ठा की। वे मानते हैं कि सभी के संरक्षण से सृष्टि का संरक्षण संभव है।


इस अवसर पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में देवनारायण पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी के आयोजन, जन्मोत्सव पर समाज के साहित्यकारों और  समाजसेवियों के सम्मान  समारोह, संगठन की स्मारिका प्रकाशन आदि के निर्णय लिये गए।


संगोष्ठी के प्रारंभ में सरस्वती वंदना डॉ संगीता पाल, कच्छ, गुजरात ने की। गणेश वंदना मोक्षा लोहारिया ने की। स्वागत भाषण श्री मोहनलाल वर्मा, जयपुर ने प्रस्तुत किया। 

आयोजन में  श्री टीकमचंद अनजाना, पुखराज गुर्जर, डॉ राकेश छोकर, नई दिल्ली, श्री छीतरलाल कंसाना, विक्रमसिंह चौधरी, डॉ पूर्णिमा कौशिक, श्रीकांत पाल, डॉक्टर संजीव कुमारी, हिसार, पुखराज गुर्जर, श्री मोहनलाल वर्मा आदि सहित अनेक शिक्षाविद, साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी एवं गणमान्यजन उपस्थित थे।

संगोष्ठी का संचालन डॉ शिवा लोहारिया, जयपुर ने किया। आभार प्रदर्शन डॉ राकेश छोकर, नई दिल्ली ने किया ।

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