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व्यापक पर्यावरणीय चेतना के कवि हैं पंत – प्रो. शर्मा ; सुमित्रानंदन पंत की काव्यानुभूति और वर्तमान विश्व पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी और कवि सम्मेलन

व्यापक पर्यावरणीय चेतना के कवि हैं पंत  – प्रो. शर्मा 

सुमित्रानंदन पंत की काव्यानुभूति और वर्तमान विश्व पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी और कवि सम्मेलन



भारत की प्रतिष्ठित संस्था राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना द्वारा एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी एवं कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी सुमित्रानंदन पंत की काव्यानुभूति और वर्तमान विश्व पर केंद्रित थी। संगोष्ठी के मुख्य अतिथि हिंदी परिवार, इंदौर के संस्थापक एवं साहित्यकार डॉ हरेराम वाजपेयी थे। अध्यक्षता विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के कला संकायाध्यक्ष एवं कुलानुशासक प्रोफेसर शैलेंद्र कुमार शर्मा ने की। मुख्य वक्ता राष्ट्रीय मुख्य संयोजक प्राचार्य डॉक्टर शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे थे। आयोजन के विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ प्रवासी साहित्यकार एवं हिंदी सेवी श्री सुरेशचंद्र शुक्ल शरद आलोक ओस्लो नॉर्वे, श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुंबई, डॉ विमल कुमार जैन, इंदौर, श्री जी डी अग्रवाल, इंदौर, डॉ मुक्ता कान्हा कौशिक, रायपुर एवं राष्ट्रीय महासचिव डॉक्टर प्रभु चौधरी थे।  संगोष्ठी का सूत्र संयोजन डॉ लता जोशी, मुंबई ने किया। 


मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार श्री हरेराम वाजपेयी ने कहा कि पंत को याद करना प्रकृति की पूजा करना है। प्रकृति का खजाना अखूट है, जिससे कवि प्रेरणा लेता है। पंत जी प्रकृति के चितेरे हैं। पंत जी को पढ़ना अनंत की ओर यात्रा करना है। उनके काव्य से जीवन को प्रकाश मिलता है। 


विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि कविवर सुमित्रानंदन पंत व्यापक पर्यावरणीय चेतना के कवि हैं, जिसे वर्तमान विश्व को जरूरत है। उनके काव्य में कल्पना की स्वच्छंद उड़ान और प्रकृति के प्रति तादात्म्य रिश्ता मिलता है। उन्होंने प्रकृति तथा मनुष्य जीवन के कोमल और कठोर रूपों को अपने काव्य का विषय बनाया। वे कल्पना के सत्य को सबसे बड़ा सत्य मानता हैं। वे अपने युगीन संदर्भों से संपृक्त होकर निरन्तर गतिशील बने रहे। उनके काव्य से गुजरना पिछली सदी के विभिन्न काव्य सोपानों से होकर गुजरना है। उनकी काव्य यात्रा वृत्ताकार दिखाई देती है, जिसमें प्रकृति एवं मनुष्य के रिश्तों के साथ ग्राम्य जीवन, सामाजिक सरोकार, समता, अंतश्चेतना और मानवतावादी दृष्टि का सुमेल हुआ है। उनकी कविताओं में आध्यात्मिकता और भौतिकता के समन्वय की राह दिखाई देती है, जो वर्तमान विश्व के लिए प्रेरक है।


मुख्य वक्ता डॉक्टर शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे ने कहा कि सुमित्रानंदन पंत छायावाद के अग्रगण्य कवि हैं। निजी अनुभूति का समाजीकरण पंत के काव्य में दिखाई देता है। उनकी कविताएं हृदय को स्पर्श करती हैं। उनके काव्य पर स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविंद, महात्मा गांधी और मार्क्स का प्रभाव दिखाई देता है। वे गांधीजी के प्रभाव से असहयोग आंदोलन में सम्मिलित हुए थे।

विशिष्ट अतिथि कार्यकारी अध्यक्ष श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुंबई ने कहा कि पंत जी ने छायावाद को नई गति दी। विषयवस्तु की भिन्नता के बावजूद कल्पना की उड़ान उनके काव्य की विशेषता है। उन्होंने प्रकृति सौंदर्य का जीवंत वर्णन किया है। प्रकृति में मानवीय सत्ता का आरोपण पंत जी ने बहुत सुंदर ढंग से किया।


विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ प्रवासी साहित्यकार श्री सुरेशचंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे ने पंत काव्य की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए स्वरचित कविता समय पर आए ना ऋतुराज सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया।


डॉ विमल कुमार जैन, इंदौर ने पंत की कर्मभूमि कौसानी की यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि कौसानी अत्यंत रमणीय स्थान है। उसी की प्रेरणा से पंत के काव्य में प्रकृति का सुंदर चित्रण मिलता है। उन्होंने पंत संग्रहालय में संकलित पंत जी की कविताओं के अंश सुनाए।


विशिष्ट अतिथि डॉक्टर मुक्ता कान्हा कौशिक, रायपुर ने कहा कि पंत का व्यक्तित्व और कृतित्व - दोनों प्रभावकारी हैं। वे श्रेष्ठ विचारक, दार्शनिक और मानवतावादी कवि हैं। डॉ कौशिक ने स्वरचित कविता प्रकृति तुम महान हो सुनाई।


वरिष्ठ साहित्यकार श्री जी डी अग्रवाल, इंदौर ने कहा कि पंत जी ने बाल्यकाल में काव्य सृजन प्रारंभ कर दिया था। श्री अग्रवाल ने पंत की प्रसिद्ध रचना सुख - दुख सुनाई, जिसमें मनुष्य जीवन में सुख और दुख - दोनों के संतुलन को वर्णित किया गया है।


डॉ रश्मि चौबे, गाजियाबाद ने कहा कि पंत जी कलाकार कवि हैं। वे सदैव विकासोन्मुख रहे। अनेक प्राणवान कविताओं की रचना उन्होंने की। डॉक्टर चौबे ने स्वरचित कविता प्रकृति मां का पाठ किया।


कार्यक्रम में कवि श्रीराम शर्मा परिंदा, मनावर ने अपनी एक व्यंग्य कविता सुनाई, जिसकी पंक्ति थी छोड़ दरख़्त परिंदा अब उड़ने की तैयारी है। डॉक्टर उर्वशी उपाध्याय, प्रयागराज ने अपनी कविता के माध्यम से समकालीन कोरोना महामारी पर टिप्पणी की। कार्यक्रम में डॉक्टर गरिमा गर्ग पंचकूला ने भी अपनी कविता प्रस्तुत की।


कार्यक्रम के प्रारंभ में सरस्वती वंदना श्रीमती रूली सिंह, मुंबई ने की। स्वागत भाषण डॉक्टर सुनीता चौहान मुंबई ने दिया। उन्होंने स्वरचित कविता जो बीत रही मुझ पर किसे बताऊं का पाठ किया। प्रस्तावना डॉ मनीषा सिंह ने प्रस्तुत की।


संगोष्ठी में डॉक्टर गोकुलेश्वर कुमार द्विवेदी, प्रयागराज, डॉ रूली सिंह, मुंबई, डॉ मुक्ता कान्हा कौशिक, रायपुर, डॉ रश्मि चौबे, गाजियाबाद, मुंबई,  डॉक्टर गरिमा गर्ग, पंचकूला, डॉ शिवा लोहारिया, जयपुर, डॉक्टर चेतना उपाध्याय, अजमेर, डॉक्टर उर्वशी उपाध्याय, प्रयाग, श्री जयंत जोशी, धार, डॉक्टर समीर सैयद, अहमदनगर, डॉक्टर बालासाहब तोरस्कर, मुंबई, पूर्णिमा झेंडे, शकुंतला सिंह, सुनील मतकर, डॉ सुनीता चौहान, मुंबई, सुनीता गर्ग, डॉ गायत्री खंडाटे, हुबली, कर्नाटक, डॉ सरोज मैती आदि सहित अनेक शिक्षाविद, साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी एवं गणमान्यजन उपस्थित थे।

अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का संचालन श्रीमती लता जोशी मुंबई ने किया। आभार प्रदर्शन संस्था के महासचिव डॉ प्रभु चौधरी ने किया।

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