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भारतीय सांस्कृतिक चेतना और मूल्यों के सच्चे संवाहक हैं रसखान और रहीम – प्रो. शर्मा ; रसखान और रहीम : भारतीय साहित्य और संस्कृति को योगदान पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी

भारतीय सांस्कृतिक चेतना और मूल्यों के सच्चे संवाहक हैं रसखान और  रहीम – प्रो. शर्मा 

रसखान और रहीम : भारतीय साहित्य और संस्कृति को योगदान पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी



भारत की प्रतिष्ठित संस्था राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना द्वारा एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह संगोष्ठी रसखान और रहीम : भारतीय साहित्य और संस्कृति को योगदान  पर केंद्रित थी। संगोष्ठी के मुख्य अतिथि विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के कला संकायाध्यक्ष प्रोफेसर शैलेंद्र कुमार शर्मा थे। मुख्य वक्ता राष्ट्रीय मुख्य संयोजक प्राचार्य डॉक्टर शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे थे। आयोजन के विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ प्रवासी साहित्यकार एवं हिंदी सेवी श्री सुरेशचंद्र शुक्ल शरद आलोक ओस्लो नॉर्वे, हिंदी परिवार, इंदौर के संस्थापक एवं साहित्यकार डॉ हरेराम वाजपेयी, इंदौर,  डॉक्टर शबाना हबीब, तिरुअनंतपुरम, केरल, डॉ रजिया शेख, बसमत, हिंगोली, महाराष्ट्र, डॉ अर्चना झा, हैदराबाद एवं राष्ट्रीय महासचिव डॉक्टर प्रभु चौधरी थे। अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ राकेश छोकर, नई दिल्ली ने की। संगोष्ठी का सूत्र संयोजन डॉ मुक्ता कान्हा कौशिक, रायपुर, छत्तीसगढ़ ने किया। 

मुख्य अतिथि विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि महाकवि रसखान और रहीम ने भारतीय सांस्कृतिक चेतना और जीवन मूल्यों को सरस ढंग से अभिव्यक्ति दी है। दोनों कवियों के माध्यम से भारतीय साहित्य को व्यापकता और विस्तार मिला। रसखान सच्चे अर्थों में रस की खान हैं। भक्ति का अत्यंत उदात्त रूप रसखान के यहां देखने को मिलता है। आराध्य के साथ तादात्म्य, उनके अप्रतिम सौंदर्य का वर्णन तथा अनन्यता का बोध रसखान के काव्य की विशेषताएं हैं। रसखान ने प्रेम पंथ की विलक्षणता को अत्यंत सरल ढंग से प्रकट किया है। उनके छंद प्रेम रस से सराबोर हैं। उनके काव्य में लौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार के प्रेम का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। दिल्ली के गदर ने उन्हें व्यथित कर दिया था और वे ब्रजभूमि में आकर पुष्टिमार्ग में दीक्षित हो गए थे। रहीम ने भारतीय संस्कृति से जुड़े अनेक आख्यान, मिथक, लोक विश्वास और पदावली का बहुत सार्थक प्रयोग किया है। उनके काव्य में ऐसे अनेक  प्रसंग मिलते हैं, जो प्रायः सामान्य जन की निगाह से ओझल होते हैं। रहीम के काव्य में जीवन का कटु यथार्थ भी झलकता है। 

मुख्य वक्ता प्राचार्य डॉक्टर शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे, महाराष्ट्र ने कहा कि महाकवि रसखान और रहीम के हृदय में राधा कृष्ण के प्रति गहरी आस्था थी। हिंदी साहित्य जगत में रहीम एकमात्र ऐसे कवि हैं जिनका कार्यक्षेत्र और जीवन अनुभव अत्यंत विस्तृत और व्यापक रहा है। रहीम महान दानवीर, युद्धवीर और कुशल राजनीतिज्ञ थे। राज दरबार में वे शीर्ष पदों पर रहे, वही युद्ध क्षेत्र में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। व्यावहारिक जगत में उन्होंने कड़वे मीठे अनुभव प्राप्त किए थे, जो उनके नीतिपरक दोहों के विषय बने। रहीम शृंगार, भक्ति और नीति - तीनों में समान अधिकार से लिखते थे। उनके व्यक्तित्व में शस्त्र और शास्त्र का समन्वय दिखाई देता है। वे सच्चे धार्मिक आश्रयदाता थे। उनका जीवन अत्यंत संघर्षशील रहा। रहीम और रसखान का संपूर्ण साहित्य हिंदी ही नहीं, भारतीय साहित्य की धरोहर है। रसखान के काव्य में सांस्कृतिक सौमनस्य का भाव प्रकट हुआ है। वे बताते हैं कि प्रेम के माध्यम से सामान्य गोपिकाएं थी कृष्ण को सहज ही प्राप्त कर लेती हैं।

वरिष्ठ प्रवासी साहित्यकार श्री सुरेशचंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे ने कहा कि रहीम के दोहे आज भी प्रासंगिक हैं। उनका प्रत्येक दोहा बहुमूल्य है। कोविड-19 के संकट के दौर में उनकी कविताएं नया प्रकाश देती हैं। श्री शुक्ल ने रसखान की प्रसिद्ध रचना मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गांव के ग्वारन को सस्वर सुनाया।

हिंदी परिवार, इंदौर के संस्थापक एवं साहित्यकार डॉ हरेराम वाजपेयी, इंदौर ने संगोष्ठी की प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए कहा कि भक्तिकाल हिंदी का स्वर्ण युग है। इस महत्वपूर्ण युग के दो रत्न हैं - रसखान और रहीम। दोनों कवि भारतीय आत्मा के प्रति सजगता पैदा करते हैं। दोनों ने देश को एकता के सूत्र में बांधने का अविस्मरणीय प्रयास किया। आज के दौर में भारतीय जनमानस को इनसे प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए। 

डॉक्टर शबाना हबीब, तिरुअनंतपुरम ने कहा कि रहीम भारतीय उदारवादी और समन्वयात्मक संस्कृति के पोषक हैं। वे फारसी, संस्कृत, हिंदी, तुर्की आदि अनेक भाषाओं में निष्णात थे, लेकिन उन्होंने हिंदी की अविस्मरणीय सेवा की। हिंदी साहित्य के इतिहास में सतसई के रचनाकर कवि बिहारी के बाद रहीम को ही दोहा एवं सोरठा छंद का जादूगर कहा जा सकता है। तुलसीदास और गंग के वे समकालीन थे। अकबर के दरबारी कवियों में रहीम का उल्लेखनीय स्थान था, तथापि कविवर रहीम स्वयं कवियों को आश्रय प्रदान करते थे। इस विषय में महाकवि केशव, आसकरण, मंडन, नरहरि, गंग आदि ने रहीम की प्रशंसा की है। बिहारी, मतिराम, व्यास, वृंद, रसनिधि आदि कवियों का साहित्य रहीम की रचनाओं से प्रभावित रहा है। अपने युग के कवियों के प्रति उनके हृदय में गहरा सम्मान था और उन्होंने अनेक कवियों को सहयोग भी दिया। उनके काव्य में भक्ति और शृंगार के साथ परस्पर सौहार्द के दर्शन होते हैं। वे सरल और सरस हृदय मानव थे। नगरसभा के दोहों के माध्यम से उन्होंने नारी सौंदर्य का चित्रण किया है।

डॉ रजिया शहनाज़ शेख, बसमत, हिंगोली, महाराष्ट्र ने कहा कि रसखान भक्तिकाल के कृष्ण भक्त सगुण -निर्गुण कवि के रूप में जाने जाते हैं। उनका वास्तविक नाम सैय्यद इब्राहिम है, लेकिन उनके साहित्यिक गुण के कारण उन्हें रसखान कहा जाता है। उनका एक-एक पद्य जैसे रस की खान है। रसखान मुस्लिम होते हुए भी कृष्ण भक्त कवि हैं, यही कारण है कि रसखान ने हिंदू मुस्लिम एकता के लिए एक सेतु के रूप कार्य किया है। वे एक भारतीय समन्वयवादी कवि रहे हैं, जिनका समग्र साहित्य ही गंगा-जमुनी तहजीब का प्रमाण है। वे सौहार्द के कवि है। उन्होंने कृष्ण भक्ति के आगे सब कुछ त्याग दिया। रसखान के काव्य संग्रह सुजान रसखान और प्रेम वाटिका प्रमुख हैं। उन्होंने भागवत का अनुवाद फारसी और हिंदी में किया। भारत के उदारवादी समन्वय मूलक संस्कृति में पूर्ण आस्था रखने वाले कविवर अब्दुल रहीम खानखाना निसंदेह हिंदी के ऐसे समर्थ कवियों में शीर्षस्थ रहे हैं, जिन्होंने इस्लाम के संस्कार होते हुए भी अपनी रचनाओं के माध्यम से हिंदू धर्म, संस्कृति, दर्शन, समाज और देवी-देवताओं का भरपूर सम्मान और श्रद्धा के साथ चित्रण किया है।

डॉ अर्चना झा, हैदराबाद ने कहा कि रहीम ने पौराणिकता, रीति नीति और मानवीय कर्म को अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया है। उन्होंने गंगा जमुनी तहजीब को प्रस्तुत करते हुए आपसी सद्भाव का संदेश दिया। रहीम सामाजिक चेतना जागृत करने वाले कवि हैं। वे संक्रमण काल के कवि हैं, जब निरंकुशता का विरोध होने लगा था।

संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए डॉ राकेश छोकर, नई दिल्ली ने कहा कि रसखान और रहीम सौहार्द की संस्कृति के संवाहक हैं। ईश्वर की भक्ति के साथ भारत भूमि के प्रति उनमें गहरा अनुराग था। उनके सृजन में किसी प्रकार का आडंबर नहीं है। उनका साहित्य भारत की अमूल्य निधि है। कृष्ण की विविध लीलाओं को इन कवियों ने अपने काव्य में कुशलता से बांधा है। वैश्विक आपदा के बीच मनोबल बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना जैसी संस्थाएं महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं।

राष्ट्रीय महासचिव डॉक्टर प्रभु चौधरी ने अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्देश्य और विषय वस्तु पर प्रकाश डाला। 

सरस्वती वंदना डॉ रूली सिंह, मुंबई ने प्रस्तुत की। स्वागत गीत संस्था की कार्यकारी अध्यक्ष कवयित्री श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुंबई ने प्रस्तुत किया। 

संगोष्ठी का सफल संचालन एवं आभार प्रदर्शन रायपुर, छत्तीसगढ़ की डॉ मुक्ता कान्हा कौशिक ने किया। उन्होंने कहा कि रसखान स्नेह के रस में डूबे हुए थे। कृष्ण के रूप सौंदर्य का उन्होंने सरस चित्रण किया है।

संगोष्ठी में संस्था के अध्यक्ष शिक्षाविद् श्री ब्रजकिशोर शर्मा, कार्यकारी अध्यक्ष श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुंबई, श्री सुरेशचंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे, श्री हरेराम वाजपेयी, इंदौर, डॉक्टर गोकुलेश्वर कुमार द्विवेदी, प्रयागराज, डॉ रूली सिंह, मुंबई, डॉ मुक्ता कान्हा कौशिक, रायपुर, डॉ रश्मि चौबे, गाजियाबाद, मुंबई, डॉक्टर दिव्या पांडेय, डॉक्टर गरिमा गर्ग, पंचकूला आदि सहित अनेक शिक्षाविद, साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी एवं गणमान्यजन उपस्थित थे।

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