Skip to main content

विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के पुरातत्त्व विभाग द्वारा 2500 वर्ष पुराने शैलचित्रों की नवीन खोज

 विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के पुरातत्त्व विभाग द्वारा 2500 वर्ष पुराने शैलचित्रों की नवीन खोज


उज्जैन  : दिनांक-25 से 27 फरवरी 2021 को विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के प्राध्यापक एवं छात्रों ने श्री अमित श्रीवास्तव स्थानीय निवासी की सूचना पर नरसिंहपुर जिले की करेली तहसील के अन्तर्गत बैनेकी ग्राम के दुर्गम पहाड़ी इलाको में निर्मित शैलाश्रयों की खोज की गई। ये शैलाश्रय नर्मदा नदी की सहायक नदी शक्कर (शंकर नदी) के तट पर निर्मित है। टीम ने यहाँ की दुर्गम पहाड़ी पर 7 चित्रित शैलाश्रयों की नवीन खोज की जो अभी तक प्रकाश में नहीं आ सके थे। इन शैलाश्रयों में प्राचीन मानव का निवास रहा है जिनके प्रमाण के रूप में यहाँ पाषाण उपकरण भी प्राप्त हुए है। शैलाश्रयों के चित्र लगभग 2500 वर्ष प्राचीन ऐतिहासिक काल के हैं। जिनके अध्ययन से तत्कालीन मानव की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक जानकारी प्राप्त होती है।


शैलाश्रयों के चित्र लाल एवं सफेद रंग में निर्मित है। यहाँ हैमेटाइट पाषाण भी प्राप्त हुए है। जिनसे चित्रों के रंग बनाये जाते थे। इन चित्रों की संक्षिप्त विषय वास्तु इस प्रकार है - 

1. मानव आकृतियों का चित्रण- शैलाश्रयों में चित्रित पुरूष और महिलाओं के विविध शीर्ष भाग दिखाए गए है, साथ ही एकल एवं सामूहिक नृत्य के चित्र भी निर्मित है। अनेक पुरूष तीर कमान, भाले एवं तलवार लिए हुए हैं। कहीं माँ एवं बच्चे का अंकन है। इससे तत्कालीन मानव की राजनीतिक एवं सामाजिक गतिविधियों की जानकारी प्राप्त होती है।

2. युद्ध करते हुए योद्धाओं का चित्रांकन- हाथी एवं अश्वारोही चित्रों में युद्ध करते दृश्य दिखाये गये हैं। जिसमें योद्धा अपने हाथो में तलवार, भाला, तीर-कमान लिए युद्ध करते दिखाये गये हैं। अश्व एवं हाथी परम्परागत प्रकृति से सुसज्जित है। सामूहिक नृत्य करते हुए चित्र भी है। ज्ञात होता है कि यहाँ कबीलों के प्रमुखों का वर्चस्व का प्रभाव है।

3. पशु आकृतियों का चित्रांकन- शैलाश्रयों के चित्रों में विविध प्रकार के पशुओं की आकृतियाँ निर्मित है। जैसे-अश्व, हाथी, बिल्ली. कुत्ते, सिंह, हिरण, बारहसिंगा, बैल पक्षी आदि के चित्र है। इससे मानव की नजदीकियों का पता चलता है। इसमें कुछ पशुओं के पृष्ठ भाग पर चक्र की आकृति निर्मित है। जो यहाँ की निजी विशेषता है। यह निश्चय ही राजकीय प्रभाव प्रतीत होता है।

4. पक्षियों का अंकन-शैलाश्रयों में मोर का चित्रांकन महत्त्वपूर्ण एवं प्रमुख है। अन्य पक्षी भी है, लेकिन चित्र स्पष्ट नहीं है। शैलाश्रय और भी है जिनका अध्ययन अपेक्षित है।

महत्त्वपूर्ण उपलब्धि- विभाग द्वारा इन शैलाश्रयों का नामकरण किया गया है। जो BNK-1, BNK-2, BNK-3, BNK-4, BNK-5, BNK-6, BNK-7 है। इनका शीघ्र ही प्रकाशन इण्डियन आर्कियोलॉजिकल रिव्यू, भारत सरकार, नई दिल्ली में किया जाएगा। यह विश्वविद्यालय के खोज की महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी।

इस प्रकार यह सतपुड़ा की पहाड़ी बहुत ही दुर्गम पहाड़ी है। टीम ने लगभग 10 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर यह कार्य किया। यहाँ मानव जीवन के आवश्यक पहलू मौजूद है। मानव ने इन शैलाश्रयों में अपना निवास स्थल बनाया और पानी एवं भोजन की व्यवस्था यहाँ प्राप्त थी। यहाँ आज भी जंगली जानवरों का आवास है। पास ही दूरी पर बिनैकी ग्राम के निवासी निवासरत है। जो परम्परागत रूप से कृषि एवं शिकार कर रहे है। अभी पूरी तरह से मुख्य धारा से लोग नहीं जुड़ पाये है। साधन का अभाव है।

डॉ.रामकुमार अहिरवार, विभागाध्यक्ष, प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग ने जानकारी देते हुए बताया कि, विक्रम विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो.अखिलेश कुमार पाण्डे एवं कुलसचिव डॉ.यू एन.शुक्ला के निर्देशानुसार यह पुरातात्त्विक शैलचित्रों की खोज की गई। इन शैलाश्रय चित्रों की खोज विभाग के प्राध्यापक डॉ.रितेश लोट एवं डॉ.हेमन्त लोदवाल के नेतृत्व में की गई। छात्रों में श्री शुभम केवलिया और श्री सुधीर कुमार मरकाम की विशेष भूमिका रही हैं।

विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन द्वारा विभाग के इन प्राध्यापक और छात्रों को इस नई खोज के लिए बधाई दी गयी। जिससे इतिहास के तथाकथित अंधयुगीन पृष्ठ उजागर हो सकेंगे।

Comments

मध्यप्रदेश खबर

नेशनल न्यूज़

Popular posts from this blog

आधे अधूरे - मोहन राकेश : पाठ और समीक्षाएँ | मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे : मध्यवर्गीय जीवन के बीच स्त्री पुरुष सम्बन्धों का रूपायन

  आधे अधूरे - मोहन राकेश : पीडीएफ और समीक्षाएँ |  Adhe Adhure - Mohan Rakesh : pdf & Reviews मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और कथाकार मोहन राकेश का जन्म  8 जनवरी 1925 को अमृतसर, पंजाब में  हुआ। उन्होंने  पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए उपाधि अर्जित की थी। उनकी नाट्य त्रयी -  आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे भारतीय नाट्य साहित्य की उपलब्धि के रूप में मान्य हैं।   उनके उपन्यास और  कहानियों में एक निरंतर विकास मिलता है, जिससे वे आधुनिक मनुष्य की नियति के निकट से निकटतर आते गए हैं।  उनकी खूबी यह थी कि वे कथा-शिल्प के महारथी थे और उनकी भाषा में गज़ब का सधाव ही नहीं, एक शास्त्रीय अनुशासन भी है। कहानी से लेकर उपन्यास तक उनकी कथा-भूमि शहरी मध्य वर्ग है। कुछ कहानियों में भारत-विभाजन की पीड़ा बहुत सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुई है।  मोहन राकेश की कहानियां नई कहानी को एक अपूर्व देन के रूप में स्वीकार की जाती हैं। उनकी कहानियों में आधुनिक जीवन का कोई-न-कोई विशिष्ट पहलू उजागर

हिंदी कथा साहित्य / संपादक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा

हिंदी कथा साहित्य की भूमिका और संपादकीय के अंश : किस्से - कहानियों, कथा - गाथाओं के प्रति मनुष्य की रुचि सहस्राब्दियों पूर्व से रही है, लेकिन उपन्यास या नॉवेल और कहानी या शार्ट स्टोरी के रूप में इनका विकास पिछली दो सदियों की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। हिंदी में नए रूप में कहानी एवं उपन्यास  विधा का आविर्भाव बीसवीं शताब्दी में हुआ है। वैसे संस्कृत का कथा - साहित्य अखिल विश्व के कथा - साहित्य का जन्मदाता माना जाता है। लोक एवं जनजातीय साहित्य में कथा – वार्ता की सुदीर्घ परम्परा रही है। इधर आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य का विकास संस्कृत - कथा - साहित्य अथवा लोक एवं जनजातीय कथाओं की समृद्ध परम्परा से न होकर, पाश्चात्य कथा साहित्य, विशेषतया अंग्रेजी साहित्य के प्रभाव रूप में हुआ है।  कहानी कथा - साहित्य का एक अन्यतम भेद और उपन्यास से अधिक लोकप्रिय साहित्य रूप है। मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना - सुनना मानव का स्वभाव बन गया। सभी प्रकार के समुदायों में कहानियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में तो कहानियों की सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा रही है। वेद - उपनिषदों में वर्णित यम-य

चौऋषिया दिवस (नागपंचमी) पर चौऋषिया समाज विशेष, नाग पंचमी और चौऋषिया दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं

चौऋषिया शब्द की उत्पत्ति और अर्थ: श्रावण मास में आने वा ली नागपंचमी को चौऋषिया दिवस के रूप में पुरे भारतवर्ष में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता हैं। चौऋषिया शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द "चतुरशीतिः" से हुई हैं जिसका शाब्दिक अर्थ "चौरासी" होता हैं अर्थात चौऋषिया समाज चौरासी गोत्र से मिलकर बना एक जातीय समूह है। वास्तविकता में चौऋषिया, तम्बोली समाज की एक उपजाति हैं। तम्बोली शब्द की उत्पति संस्कृत शब्द "ताम्बुल" से हुई हैं जिसका अर्थ "पान" होता हैं। चौऋषिया समाज के लोगो द्वारा नागदेव को अपना कुलदेव माना जाता हैं तथा चौऋषिया समाज के लोगो को नागवंशी भी कहा जाता हैं। नागपंचमी के दिन चौऋषिया समाज द्वारा ही नागदेव की पूजा करना प्रारम्भ किया गया था तत्पश्चात सम्पूर्ण भारत में नागपंचमी पर नागदेव की पूजा की जाने लगी। नागदेव द्वारा चूहों से नागबेल (जिस पर पान उगता हैं) कि रक्षा की जाती हैं।चूहे नागबेल को खाकर नष्ट करते हैं। इस नागबेल (पान)से ही समाज के लोगो का रोजगार मिलता हैं।पान का व्यवसाय चौरसिया समाज के लोगो का मुख्य व्यवसाय हैं।इस हेतू समाज के लोगो ने अपन