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कथा साहित्य के क्षेत्र में नवीन परंपरा स्थापित की रेणु ने - प्रो शुक्ल ; फणीश्वरनाथ रेणु जन्मशती पर हुआ राष्ट्रीय परिसंवाद

कथा साहित्य के क्षेत्र में नवीन परंपरा स्थापित की रेणु ने - प्रो शुक्ल 

फणीश्वरनाथ रेणु जन्मशती पर हुआ राष्ट्रीय परिसंवाद

उज्जैन : विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में प्रख्यात कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु की जन्म शताब्दी आयोजन के शुभारंभ पर राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन हुआ। यह परिसंवाद फणीश्वरनाथ रेणु का कथा - साहित्य और लोक संपृक्ति पर केंद्रित था। आयोजन के प्रमुख वक्ता वरिष्ठ साहित्यकार और भाषाविद् प्रो. त्रिभुवननाथ शुक्ल थे। अध्यक्षता हिंदी विभागाध्यक्ष एवं कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा ने की। विशिष्ट अतिथि  प्रो. प्रेमलता चुटैल, प्रो. गीता नायक, डॉक्टर जगदीशचंद्र शर्मा, डॉ प्रतिष्ठा शर्मा आदि ने  विचार व्यक्त किए। 

मुख्य अतिथि प्रो. त्रिभुवननाथ शुक्ल,  जबलपुर ने कहा कि फणीश्वरनाथ रेणु ने कथा साहित्य के क्षेत्र में स्वयं एक नवीन परंपरा स्थापित की। लोक जीवन के साथ गहरे साहचर्य के कारण उनके यहां अनेक देशज मुहावरे मिलते हैं। वे हिंदी के आंचलिक उपन्यासों के मानक हैं। रेणु के साहित्य में उनके समय की महामारी की पीड़ा और संघर्ष को देखा जा सकता है। उन्होंने देश एवं  समाज की स्थिति को भारतीय लोक तत्व के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया। भौतिक संसाधन से ही कोई बड़ा नहीं होता, इसे रेणु जी ने अपने जीवन और कृतित्व के माध्यम से स्थापित किया। साहित्य में सहज भाषा का प्रयोग किस प्रकार किया जा सकता है, यह रेणु जी सिखाते हैं। उन्होंने मौलिक औपन्यासिक शिल्प और भाषा के माध्यम से कथा साहित्य को नवीन दिशा दी।

लेखक एवं आलोचक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यासों और कहानियों में भारत की आत्मा प्रकट हुई है। लोक मानस और संस्कृति के प्रति गहरी संपृक्ति उनके साहित्य को वैशिष्ट्य देती है। उन्होंने  भारतीय  उपन्यास का मौलिक ढांचा तैयार किया। उनकी रचनाओं में अंचल के रूप, रस, बिम्ब, गंध और शब्द का जीवन्त रूपायन हुआ है। स्वाधीनता संग्राम और स्वातंत्र्योत्तर भारत की अनेकविध छबियों के साथ सामाजिक परिवर्तन का स्वर उनके साहित्य में मिलता है।

प्रो. प्रेमलता चुटैल ने कहा कि रेणु जी के उपन्यास अंचल की सोंधी मिट्टी की गंध के लिए जाने जाते हैं। कोविड महामारी के दौर में रेणु जी का मैला आंचल याद आता है। गांव के जन का निश्छल और सहज मन उनकी मारे गए गुलफाम उर्फ तीसरी कसम जैसी चर्चित कहानी के माध्यम से जीवंत होता है। 

आयोजन में प्रोफेसर शुक्ल का सारस्वत सम्मान प्रो शर्मा, प्रो चुटैल, प्रो नायक एवं डॉ शर्मा द्वारा उन्हें शॉल एवं स्मृति चिन्ह अर्पित कर किया गया।

इस अवसर पर प्रोफेसर हरिमोहन बुधौलिया, डॉक्टर ज्ञानचंद खिमेसरा, मंदसौर आदि सहित अनेक शिक्षक शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित थे।

संचालन डॉक्टर जगदीश चंद्र शर्मा ने किया। आभार प्रदर्शन डॉ गुणमाला खिमेसरा, मंदसौर ने किया।

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