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गणतंत्र के अर्थ को समूचे रूप में चरितार्थ करना सभी की जिम्मेदारी - प्रोफेसर शर्मा ; अंतरराष्ट्रीय राष्ट्र वंदन कवि सम्मेलन संपन्न

गणतंत्र के अर्थ को समूचे रूप में चरितार्थ करना सभी की जिम्मेदारी - प्रोफेसर शर्मा

अंतरराष्ट्रीय राष्ट्र वंदन कवि सम्मेलन संपन्न


देश की प्रतिष्ठित संस्था राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना द्वारा गणतंत्र दिवस के अवसर पर अंतरराष्ट्रीय राष्ट्र वंदन कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। आयोजन के प्रमुख अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार श्री हरेराम वाजपेयी, इंदौर थे। प्रमुख वक्ता विक्रम विश्वविद्यालय के कुलानुशासक एवं हिंदी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर शैलेंद्र कुमार शर्मा थे। अध्यक्षता वरिष्ठ शिक्षाविद डॉ शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे ने की। विशिष्ट अतिथि प्रवासी साहित्यकार श्री सुरेशचंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे, श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुंबई एवं संस्था के महासचिव डॉ प्रभु चौधरी थे। आयोजन में देश के विभिन्न भागों के साहित्यकारों ने राष्ट्रभक्तिपूर्ण कविताएं सुनाईं।


प्रमुख वक्ता लेखक एवं आलोचक डॉ शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि भारतीय चिंतन और साहित्य में राष्ट्र और राष्ट्रभक्तों की अनेकविध छबियाँ अंकित हुई हैं। हमारे अमर सेनानियों ने राष्ट्रीय भावना को मनुष्य की स्वाभाविक भावनाओं  से उच्च स्थान दिया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्र भक्ति को प्रभु भक्ति का स्थान मिला। आजादी मिलने भर से हमारा श्रम और साधना पूरी नहीं होगी। गणतंत्र के अर्थ को समूचे रूप में साकार करना सभी की जिम्मेदारी है। ऐसा न होने तक यह यात्रा अधूरी रहेगी। राष्ट्र केवल भूगोल नहीं है।   देशवासियों की समृद्धि, शांति और परस्पर सद्भाव में राष्ट्र का कल्याण निहित है। आज गणतंत्र को गहरे दायित्व बोध के साथ लेने की आवश्यकता है।

वरिष्ठ साहित्यकार श्री हरिराम वाजपेयी, इंदौर ने अपनी कविता के माध्यम से शहीदों को नमन किया। उनकी पंक्तियां थीं, शत-शत नमन सादर नमन। उन शूरवीरों को जिनकी शहादत और पराक्रम से इंडिया भारत बना। हमको मिली अपनी धरा और अपना गगन।

अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे ने कहा कि अनेक साहित्यकारों ने देशभक्ति पर कलम चलाई है। उनकी कविताएं अपार उत्साह और जोश जगाती हैं। देशप्रेम और स्वाभिमान के प्रसार में साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

प्रवासी कवि श्री सुरेशचंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे ने लेखनी कर उनका जय गान शीर्षक गीत सुनाया। उन्होंने देशप्रेम का आह्वान करते हुए अपने एक गीत की पंक्तियां प्रस्तुत कीं, देश का गान हो देश का मान हो। हम जहां भी रहे मेरा हिंदुस्तान हो।

साहित्यकार श्री जी डी अग्रवाल, इंदौर ने कहा कि गणतंत्र की सार्थकता इस बात में है कि हमें अपने कर्तव्यों को लेकर सजग होना चाहिए। भारतीय संविधान के आवरण की रचना में इंदौर के चित्रकार श्री दीनानाथ भार्गव का महत्वपूर्ण योगदान था। डॉ अग्रवाल ने कविता हे मातृभूमि जय जग जननी भी सुनाई।


संस्था के महासचिव डॉ प्रभु चौधरी ने प्रास्ताविक भाषण में कहा कि आज हम स्वतंत्र तो हैं, किंतु मानसिक गुलामी से पूरी तरह मुक्त नहीं हुए हैं। यह तभी संभव होगा जब हम अंग्रेजियत से मुक्ति प्राप्त करेंगे।


वरिष्ठ कवयित्री श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुंबई ने अपनी कविता के माध्यम से आह्वान किया, भारत हमारा है महान, उसकी रखेंगे हम शान। 


गुवाहाटी, असम की कवयित्री दीपिका सुतोदिया ने देशभक्ति पर एकाग्र गजल सुनाई। उन्होंने कहा मां भारती के स्वप्न सजाते हुए चलो। हर आंख से ही अश्क मिटाते हुए चलो। उड़ने का हौसला यह परिंदों से सीख कर। रफ्तार और तेज बढ़ाते हुए चलो। 

सुश्री हेमलता शर्मा भोली बैन, इंदौर ने अपनी कविता के जरिए कहा, अर्थ नहीं है तंत्र बता दो, देश का ऐसा मंत्र है। लाख शहीदों की बेदी पर, बना हुआ गणतंत्र है।

     

कवि श्री सुंदर लाल जोशी, नागदा ने अपने गीत के माध्यम से आह्वान किया, अवसर है गणतंत्र दिवस का जमकर जश्न मनाएंगे।


राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ मुक्ता कान्हा कौशिक, रायपुर की कविता की पंक्तियाँ थीं,  ख़ुश नसीब होते हैं वो लोग, जो इस देश पर कुर्बान होते हैं, जान दे के भी वो लोग अमर हो जाते हैं, करते हैं सलाम उन देश प्रेमियों को।


डॉ सुनीता चौहान, मुंबई ने आवाहन कविता प्रस्तुत की, जिसकी पंक्तियां थीं, मन मानस की चाक पर, दिये बनाएं मिलकर हम। फिर स्नेह की ज्योति से, रोशन करें धरती को हम। डॉ जयभारती चंद्राकर, रायपुर ने भी अपनी कविता सुनाई।


प्रारम्भ में देशभक्ति पूर्ण गीतों और चित्रों की स्लाइड प्रस्तुति डॉ पूर्णिमा कौशिक एवं डॉ मुक्ता कान्हा कौशिक, रायपुर ने की।


डॉ आशीष नायक, रायपुर ने मेरा हिंदुस्तान शीर्षक कविता सुनाई। कविता की पंक्तियाँ थीं, मेरे सपनों का भारत सदा ऊंचा उठता रहे विश्व पटल पर। यह चांद बनकर चमकता रहे। कभी कम ना हो जिस की आन बान और शान। हम उस गुलशन के फूल हैं नाम है जिसका हिंदुस्तान।


कार्यक्रम का शुभारंभ सरस्वती वंदना की  प्रस्तुति से डॉ पूर्णिमा कौशिक, रायपुर ने किया।  स्वागत भाषण संस्था के महासचिव डॉ प्रभु चौधरी ने दिया। संगोष्ठी की प्रस्तावना गरिमा गर्ग, पंचकूला ने प्रस्तुत की। उन्होंने एक रचना सुनाई, जिसकी पंक्तियाँ थीं,  आओ हम सब गणतंत्र दिवस मनाते हैं। पाया था जो मुश्किल से हमने जीवन में। हम मिलकर अधिकारों का जश्न मनाते हैं। आओ हम सब गणतंत्र दिवस मनाते  हैं।


श्री राकेश छोकर, नई दिल्ली ने अपनी कविता के माध्यम से शूरवीरों को याद किया, अनुपम शौर्य गाथा तुम्हारी चंदन तिलक सा मान धरो। तुम्हारे रक्त का कण कण समर्पित, राष्ट्र को प्रतिक्षण।


डॉ संगीता पाल, कच्छ, गुजरात ने कविता जय हो हिंदुस्तान की सुनाई, जिसकी पंक्तियाँ थीं, आओ मिलकर हम सब बोले, जय हो हिंदुस्तान की। जय हो संविधान की, जय हो संविधान की।

आयोजन में श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुंबई, डॉ मुक्ता कौशिक, रायपुर, डॉ गरिमा गर्ग, पंचकूला, आभा मुकेश साहनी, पंचकूला, सुनीता गर्ग, सुनीता चौहान, मुंबई, डॉ आशीष नायक, रायपुर ललिता घोड़के, गोकुलेश्वर कुमार द्विवेदी, प्रयागराज, श्री जी डी अग्रवाल, इंदौर, विजय प्रभाकर नगरकर, अहमदनगर, लता जोशी, मुम्बई, प्रवीण बाला, पटियाला, डॉ रश्मि चौबे, गाजियाबाद, श्रीमती पूर्णिमा कौशिक, रायपुर सहित अनेक शिक्षाविद  एवं गणमान्यजन उपस्थित थे।


कवि सम्मेलन का सफल संचालन डॉ मुक्ता कौशिक, रायपुर ने किया।

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