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स्वदेशाभिमान और आत्मगौरव का मंत्र फूँका लोकमाता जीजाबाई ने – प्रो शर्मा ; राजमाता जीजाबाई : राष्ट्र चेतना के विकास में योगदान पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

स्वदेशाभिमान और आत्मगौरव का मंत्र फूँका लोकमाता जीजाबाई ने – प्रो शर्मा  

राजमाता जीजाबाई : राष्ट्र चेतना के विकास  में योगदान पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना ने राजमाता जिजाऊ जयंती महोत्सव मनाया वेब संगोष्ठी के माध्यम से 



देश की प्रतिष्ठित संस्था राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना द्वारा राजमाता जिजाऊ जयंती महोत्सव पर अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह संगोष्ठी राजमाता जीजाबाई : राष्ट्र चेतना के विकास में योगदान पर केंद्रित थी। संगोष्ठी के मुख्य अतिथि डॉ शहाबुद्दीन नियाज़ मोहम्मद शेख, पुणे  थे। प्रमुख वक्ता विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलानुशासक  एवं हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ भरत शेणकर, अहमदनगर ने की। विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ प्रवासी साहित्यकार एवं अनुवादक  श्री सुरेश चंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे, डॉ सुवर्णा जाधव, मुंबई, संस्था के महासचिव डॉ प्रभु चौधरी, डॉ शैल चंद्रा, धमतरी, डॉ विनोद कुमार वायचल, डॉ ममता झा, मुंबई एवं डॉ रजिया शेख थे।



संगोष्ठी में डॉ शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे ने कहा कि भारतीय इतिहास के पटल पर जिन महिला रत्नों ने विशिष्ट योगदान दिया है, उनमें जीजामाता अग्रगण्य हैं। उन्होंने सती प्रथा को अस्वीकार किया और अंतिम सांस तक राष्ट्र की सेवा करते रहीं। उन्होंने अपने पुत्र शिवाजी को प्रजा के प्रति प्रेम करना सिखाया और साथ ही श्रेष्ठ स्वराज का निर्माण करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे सही अर्थों में संपूर्ण भारतीय जन मानस की माता थीं।


लेखक एवं आलोचक प्रोफ़ेसर शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि लोकमाता जीजाबाई ने स्वदेशाभिमान और आत्मगौरव का मंत्र फूँका। वे असीम धैर्य, अविचल विश्वास और नेतृत्वकारी व्यक्तित्व से सम्पन्न थीं। सदियों से परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़े भारत को उन्होंने अपने व्यापक प्रयासों से स्वराज के लिए तैयार किया। उन्होंने स्वतंत्र और आदर्श राज्य का सपना देखा था, जो शिवाजी के माध्यम से जीवन्त हुआ। उनका जीवन निर्भीकता,  तपस्या और त्याग से सम्पन्न  था। आजीवन संघर्षों और विपरीत परिस्थितियों को झेलते हुए भी उन्होंने धैर्य नहीं खोया और अपने पुत्र शिवाजी को श्रेष्ठ संस्कार दिए, जो आगे चलकर छत्रपति शिवाजी महाराज के रूप में देशभक्ति की अमर मिसाल बने। लोक में प्रसिद्धि है कि जीजाबाई के रूप में जैसे तुलजा भवानी ही स्वयं अवतरित हुई थीं। उनका उदात्त चरित्र महिलाओं को सभी क्षेत्रों में सफल होने की प्रेरणा देता है। 


वरिष्ठ प्रवासी साहित्यकार श्री सुरेश चन्द्र शुक्ल  शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे ने कहा कि इस देश की उत्कृष्ट नायिकाओं के मध्य जीजाबाई का योगदान अविस्मरणीय है। उन्होंने शिवाजी जैसे महान व्यक्तित्व को जन्म दिया। उनके चरित्र से हमें प्रेरणा लेना चाहिए। वे सही अर्थों में नारी शक्ति की प्रतीक हैं। 


साहित्यकार डॉ सुवर्णा जाधव, मुम्बई ने कहा कि छत्रपति शिवाजी स्त्रियों के प्रति सम्मान के लिए जाने जाते हैं। यह संस्कार उन्हें अपनी माता जीजाबाई से प्राप्त हुए थे। जीजाबाई हिंदवी स्वराज्य की जननी हैं। उन्होंने शिवाजी जैसे महान पराक्रमी पुत्र को राष्ट्र प्रेम के संस्कार दिए थे। शिवाजी की कैद के समय उन्होंने स्वयं स्वराज को संभाला। जीजाबाई की संस्कारशीलता और दूरदृष्टि सब में आए यह जरूरी है।


कार्यक्रम में प्रास्तावित वक्तव्य देते हुए डॉ प्रभु चौधरी ने कहा कि मातुश्री जीजा बाई के समर्पण और प्रेरणा से छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे महान राष्ट्रभक्त ने अपना सर्वस्व स्वराज के लिए न्योछावर कर दिया। उन्होंने बालपन से ही शिवाजी को  संस्कार दिए थे, वे अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुए।


डॉ विनोद कुमार ने संस्कृत काव्य में जीजामाता के चित्रण पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जीजामाता स्वराज माता और राष्ट्र माता के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उन्होंने शिवाजी जैसे पुत्र को जन्म दिया, जो देश के आदर्श शासक रहे हैं। शिवाजी पर केंद्रित संस्कृत में कई महत्वपूर्ण काव्य कृतियों की रचना हुई है, जिनमें जीजाबाई का चित्रण हुआ है। इनमें पंडित परमानंद का शिवभारतम् और जयराम पंडित का राधामाधवविलास चंपू उल्लेखनीय हैं। जीजामाता ने शिवाजी को विविध ग्रंथों और शास्त्रों का अध्ययन करवाया था, जो प्रेरक सिद्ध हुए।



अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ भरत शेणकर, अहमदनगर ने कहा कि जो सपना जीजामाता ने देखा था, वह शिवाजी के माध्यम से साकार हुआ। मराठी में अनेक पवाड़ों के माध्यम से शिवाजी के पराक्रम का वर्णन मिलता है, जो अत्यंत लोकप्रिय हैं।


डॉ शैल चंद्रा, धमतरी, छत्तीसगढ़ ने कहा कि जीजामाता ने एक ऐसे पुत्र को जन्म दिया, जिससे भारतीय इतिहास को स्वर्णिम रूप में जगमग दिया। संतान की पहली शिक्षिका माता होती है। छत्रपति शिवाजी के निर्माण में उनकी माता का अविस्मरणीय योगदान है। उनकी तेजस्विता शिवाजी में आई।  


डॉ ममता झा, मुंबई ने कहा कि जीजाबाई में निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता थी। उनके  स्वरूप को देख कर लगता है कि यह देश कितना अग्रणी था।


 डॉक्टर रजिया शहनाज़ ने कहा कि जीजामाता आदर्श संस्कार देने वाली माता थीं। माता दोनों ही घरों में शिक्षा की रौशनी लाती है। जहां शहा जी ने निरन्तर संघर्ष करते हुए अपने पुत्र शिवाजी को पराक्रम का पाठ सिखाया तो जीजाबाई ने उन्हें गहरे संस्कार दिए।



कार्यक्रम का शुभारंभ सरस्वती वंदना की सुन्दर प्रस्तुति से डॉ पूर्णिमा कौशिक, रायपुर ने किया। स्वागत गीत डॉ रीना सुराड़कर ने प्रस्तुत किया। डॉ रोहिणी डाबरे ने शिवाजी पर केंद्रित कविता पाठ किया। स्वागत भाषण डॉ समीर सैयद, अहमदनगर ने दिया। अतिथि परिचय डॉ गरिमा गर्ग, पंचकूला ने दिया।


कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ रोहिणी डाबरे, अहमदनगर ने किया। आभार प्रदर्शन डॉ रश्मि चौबे, गाजियाबाद ने किया। 


कार्यक्रम में डॉ मुक्ता कौशिक, रायपुर, डॉ गरिमा गर्ग, पंचकूला, डॉ शैल चंद्रा, धमतरी, डॉक्टर रजिया शहनाज़, लता जोशी, मुंबई डॉक्टर शोभा राणे, अनिल काले, ललिता घोड़के, डॉ रश्मि चौबे, गाजियाबाद, श्रीमती पूर्णिमा कौशिक, रायपुर सहित अनेक शिक्षाविद  एवं गणमान्यजन उपस्थित थे।


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