Skip to main content

मृत्यु के भय से परे निर्भय करते हैं गांधी जी

मृत्यु के भय से परे निर्भय करते हैं गांधी जी 


महात्मा गांधी : शिक्षा, साहित्य और संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न



प्रतिष्ठित संस्था राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना द्वारा महात्मा गांधी : शिक्षा, साहित्य और संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय वेब गोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी के प्रमुख अतिथि वरिष्ठ गांधीवादी चिंतक एवं समाजसेवी श्री अनिल त्रिवेदी, इंदौर थे। मुख्य वक्ता विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के हिंदी विभाग के अध्यक्ष एवं कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा थे। विशिष्ट अतिथि गांधीवादी समाजसेवी श्री किशोर गुप्ता, इंदौर, प्रवासी साहित्यकार श्री शरद चंद्र शुक्ल शरद आलोक,  ओस्लो, नॉर्वे, श्री सुधीर निगम, मुंबई,  डॉ वी के मिश्रा, इंदौर एवं संस्था के महासचिव डॉ प्रभु चौधरी ने विचार व्यक्त किए। अध्यक्षता डॉ जी डी अग्रवाल ने की।



मुख्य अतिथि श्री अनिल त्रिवेदी, इंदौर ने कहा कि गांधी के जीवन में इतना सरल था कि उसमें प्राकृतिक आनन्द था। आज पूरा विश्व मृत्यु के भय से ग्रस्त है, गांधी जी मृत्यु के भय से परे निर्भय करते हैं। वे उपदेशक के रूप में जीवन मूल्यों को कहने के बजाय स्वयं के जीवन में उतारते रहे। आज शिक्षण संस्थाएँ समस्या में हैं, उनके सामने कई चुनौतियां हैं। गांधी जी स्वास्थ्य सुधार के बजाय आरोग्य की बात करते हैं। गांधी जी मनुष्य की मानसिक विकलांगता पर चोट पहुंचाते हैं। उन्होंने अहिंसा और सत्य के बल पर पूरे भारत को जगा दिया।



मुख्य वक्ता लेखक एवं आलोचक प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि गांधीजी ने साहित्य एवं संस्कृति को लेकर महत्त्वपूर्ण चिंतन और प्रयोग किए हैं। उनका संस्कृति चिंतन  व्यापक  विश्व दृष्टि पर टिका हुआ है। उन्होंने अपने जीवन व्यवहार में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की शाश्वत मूल्य दृष्टि को आधार बनाया था। संस्कृति और धर्म का कारगर प्रयोग उन्होंने अध्यात्म साधना से आगे जाकर राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक बदलाव के लिए किया। उन्होंने तुलसी को अपना आदर्श माना था। संत कबीर, मीराबाई, नरसी मेहता जैसे भक्तों की वाणी उन्हें पग पग पर आस्था और संबल देती रही। वे गहरी भारतीय आस्था और विश्वास के साथ जिए, किंतु उन्होंने सभी धर्मों और मान्यताओं के प्रति सम्मान और प्रशंसा का भाव जगाया। देश विदेश के साहित्य पर उनके जीवन, कार्य और संदेशों का व्यापक प्रभाव पड़ा है।



विशिष्ट अतिथि श्री संजीव निगम, मुंबई मैं कहा कि गांधी जी का चिंतन समग्रता लिए हुए है। उन्होंने स्वराज की संकल्पना दी, जिसमें शिक्षा, भाषा, अर्थतंत्र आदि सभी बातों पर बल दिया। वे अन्याय का मुकाबला करने के लिए अहिंसा पर बल देते हैं। वे  अपने जीवनकाल में शिक्षा पद्धति में बदलाव लाना चाहते थे। उन्होंने सदियों के लिए पाथेय छोड़ दिया है।


श्री किशोर गुप्ता, इंदौर ने कहा कि गांधी जी अप्रतिम महामानव थे। मनुष्यता से जुड़े सभी पक्षों को उन्होंने छुआ। उनका लिखा और बोला सब संतुलित होता था। भारतीय संस्कृति को उन्होंने निरन्तर जीया। वे बुनियादी शिक्षा को महत्त्व देते हैं, जो जीवन कार्यों से जुड़ी शिक्षा है। वे हृदय के विकास पर बल देते हैं। मनुष्यता जब भी संकट में आएगी, गांधी जी के विचार काम आएँगे।



प्रसिद्ध प्रवासी साहित्यकार और अनुवादक श्री सुरेश चंद्र शुक्ल शरद आलोक ने कहा कि नॉर्वे को गांधी विचार ने गहरे प्रभावित किया है। भारत में सबको समान अवसर मिले, सबको सुरक्षा मिले, यह जरूरी है। नॉर्वे में गांधी जी को शिक्षा में स्थान मिला है। नॉर्वेजियन दार्शनिक अर्ने नेस ने गांधी जी को लेकर महत्त्वपूर्ण किताब लिखी है।


जी डी अग्रवाल, इंदौर ने अध्यक्षता करते हुए कहा कि गांधी के आदर्शों को प्रसारित करने की जरूरत है। उन्होंने प्रसिद्ध कविता मां खादी की चादर दे दे मैं गांधी बन जाऊँ सुनाई।



प्रारंभ में आयोजन की रूपरेखा एवं अतिथि परिचय राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना के महासचिव डॉक्टर प्रभु चौधरी ने दिया।


सरस्वती वंदना डॉक्टर लता जोशी ने की। स्वागत भाषण कार्यकारी अध्यक्ष सुवर्णा जाधव, मुंबई ने दिया । 


कार्यक्रम में डॉ वीरेंद्र मिश्रा, इंदौर, डॉक्टर शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे, डॉ रश्मि चौबे, डॉ भरत शेणकर, डॉक्टर मुक्ता कौशिक, डॉक्टर रोहिणी डाबरे, डॉक्टर लता जोशी, डॉक्टर तूलिका सेठ, डॉक्टर शिवा लोहारिया, डॉक्टर समीर सैयद आदि सहित अनेक प्रबुद्ध जन उपस्थित थे।


संचालन अनुराधा अच्छवान ने किया। अंत में आभार श्री अनिल ओझा ने प्रकट किया।



Bkk News


Bekhabaron Ki Khabar - बेख़बरों की खबर


Bekhabaron Ki Khabar, magazine in Hindi by Radheshyam Chourasiya / Bekhabaron Ki Khabar: Read on mobile & tablets - http://www.readwhere.com/publication/6480/Bekhabaron-ki-khabar


Comments

मध्यप्रदेश खबर

नेशनल न्यूज़

Popular posts from this blog

आधे अधूरे - मोहन राकेश : पाठ और समीक्षाएँ | मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे : मध्यवर्गीय जीवन के बीच स्त्री पुरुष सम्बन्धों का रूपायन

  आधे अधूरे - मोहन राकेश : पीडीएफ और समीक्षाएँ |  Adhe Adhure - Mohan Rakesh : pdf & Reviews मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और कथाकार मोहन राकेश का जन्म  8 जनवरी 1925 को अमृतसर, पंजाब में  हुआ। उन्होंने  पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए उपाधि अर्जित की थी। उनकी नाट्य त्रयी -  आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे भारतीय नाट्य साहित्य की उपलब्धि के रूप में मान्य हैं।   उनके उपन्यास और  कहानियों में एक निरंतर विकास मिलता है, जिससे वे आधुनिक मनुष्य की नियति के निकट से निकटतर आते गए हैं।  उनकी खूबी यह थी कि वे कथा-शिल्प के महारथी थे और उनकी भाषा में गज़ब का सधाव ही नहीं, एक शास्त्रीय अनुशासन भी है। कहानी से लेकर उपन्यास तक उनकी कथा-भूमि शहरी मध्य वर्ग है। कुछ कहानियों में भारत-विभाजन की पीड़ा बहुत सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुई है।  मोहन राकेश की कहानियां नई कहानी को एक अपूर्व देन के रूप में स्वीकार की जाती हैं। उनकी कहानियों में आधुनिक जीवन का कोई-न-कोई विशिष्ट पहलू उजागर

हिंदी कथा साहित्य / संपादक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा

हिंदी कथा साहित्य की भूमिका और संपादकीय के अंश : किस्से - कहानियों, कथा - गाथाओं के प्रति मनुष्य की रुचि सहस्राब्दियों पूर्व से रही है, लेकिन उपन्यास या नॉवेल और कहानी या शार्ट स्टोरी के रूप में इनका विकास पिछली दो सदियों की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। हिंदी में नए रूप में कहानी एवं उपन्यास  विधा का आविर्भाव बीसवीं शताब्दी में हुआ है। वैसे संस्कृत का कथा - साहित्य अखिल विश्व के कथा - साहित्य का जन्मदाता माना जाता है। लोक एवं जनजातीय साहित्य में कथा – वार्ता की सुदीर्घ परम्परा रही है। इधर आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य का विकास संस्कृत - कथा - साहित्य अथवा लोक एवं जनजातीय कथाओं की समृद्ध परम्परा से न होकर, पाश्चात्य कथा साहित्य, विशेषतया अंग्रेजी साहित्य के प्रभाव रूप में हुआ है।  कहानी कथा - साहित्य का एक अन्यतम भेद और उपन्यास से अधिक लोकप्रिय साहित्य रूप है। मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना - सुनना मानव का स्वभाव बन गया। सभी प्रकार के समुदायों में कहानियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में तो कहानियों की सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा रही है। वेद - उपनिषदों में वर्णित यम-य

कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पांडेय को नई शिक्षा नीति का उत्कृष्ट पुरस्कार

  उज्जैन : मध्यप्रदेश में नई शिक्षा नीति का सर्वप्रथम क्रियान्वयन करने पर जबलपुर में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पांडेय को नई शिक्षा नीति में उत्कृष्ट पुरस्कार से सम्मानित किया गया। एनवायरनमेंट एवं सोशल वेलफेयर सोसाइटी, खजुराहो एवं प्राणीशास्त्र एवं जैवप्रौद्योगिकी विभाग, शासकीय विज्ञान स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जबलपुर के संयुक्त तत्वाधान में आयोजन दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन जबलपुर में किया गया। इस अवसर पर मध्य प्रदेश में नई शिक्षा नीति के सर्वप्रथम क्रियान्वयन के लिए विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पांडेय को नई शिक्षानीति में उत्कृष्ट पुरस्कार से सम्मानित किया गया। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पांडेय की प्रशासनिक कार्यकुशलता से आज विश्वविद्यालय नई शिक्षा का क्रियान्वयन करने वाला प्रदेश का पहला विश्वविद्यालय है। इस उपलब्धि के लिए विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ प्रशांत पुराणिक एवं कुलानुशासक प्रो शैलेन्द्र कुमार शर्मा ने कुलपति प्रो पांडेय के प्रति आभार व्यक्त करते हुए उन्हें हार्दिक