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ब्रह्म मुर्हुत में निकली मां अंबे एवं माता महाकाली की सवारी, भक्तों को दिए दर्शन ; गरबियों पर करीब 1 घंटे तक रमती रही माता

अंबा देवी भारत नो संकट मिटावजों...
आनंदीगुण गाउ महाकाली ओ भजुतन पावागढ़ वाली...



ब्रह्म मुर्हुत में निकली मां अंबे एवं माता महाकाली की सवारी, भक्तों को दिए दर्शन



गरबियों पर करीब 1 घंटे तक रमती रही माता


खरगोन। भावसार क्षत्रिय समाज द्वारा पिछले 402 वर्ष से चली आ रही खप्पर की परंपरा अंतर्गत शारदीय नवरात्रि की महाअष्टमी एवं महानवमी को माता का खप्पर निकाला जाता है। इसी के अंतर्गत शुक्रवार को मां अंबे एवं शनिवार को माता महाकाली का खप्पर निकाला गया।



मां अबे एक हाथ में जलता हुआ खप्पर और दूसरे हाथ में तलवार लेकर निकली। वहीं माता महाकाली माता महाकाली शेर पर सवार होकर एक हाथ मे तलवार और दूसरे हाथ में माता जोगनी की नरमुंड लेकर आई। भावसार क्षत्रिय समाज को खप्पर की परंपरा एक विरासत के रूप में दी है, जिसका आज भी निर्वहन किया जा रहा है।



कार्यक्रम की शुरूआत सर्वप्रथम झाड़ की विशेष पूजन-अर्चना के साथ हुई। पूजा-अर्चन के बाद सबसे पहले श्री गणेश जी का स्वांग रचकर कलाकार निकले। इसके बाद भूत-पिशाच का भी कलाकारों द्वारा स्वांग रचा गया। शुक्रवार को प्रातः 4.45 बजे ब्रह्म मुर्हुत में मां अंबे एवं शनिवार को प्रातः 4.30 बजे ब्रह्म मुर्हुत में माता महाकाली की सवारी निकाली।



इस दौरान कलाकारों द्वारा गाई जा रही भक्तीभाव से सराबोर गरबियों अंबा देवी भारत नो संकट मिटावजों......., आनंदीगुण गाउ महाकाली ओ भजुतन पावागढ़ वाली........., देवी महाकाली कलयुग कालधर म्यान............., सरवर हिंडोलो गिरवर बांध सावों भवानी मां............, आनंद गुण गांऊ, महाकाली ओ भजु तन पावागढ़ वाली वो..........., म्हारी अंबे भवानी माय हो, गरबों रमसारे.............. जैसी गरबियों पर करीब 1 घंटे तक मां अंबे एवं माता महाकली रमती रहीं।



कार्यक्रम भावसार मोहल्ला स्थित श्री सिद्वनाथ महादेव मंदिर प्रांगण में प्रातः 3.30 बजे से प्रारंभ हुआ। 



खप्पर की 402 वर्ष पुरानी है परंपरा, जो आज भी है जारी
भावसार क्षत्रिय समाज खरगोन द्वारा शारदीय नवरात्रि की महाअष्टमी एवं महानवमी में खप्पर निकालने की परंपरा करीब 402 वर्ष पुरानी है, जो आज भी जारी है। परंपरानुसार मां अंबे का स्वांग रचने वाले कलाकार एक ही पीढ़ी के होते है। मां अंबे का स्वांग मनोज मधु भावसार एवं आयुष सुनील भावसार ने धारण किया।



वहीं माता महाकाली का रूप लाला जगदीश भावसार तथा नरसिंह भगवान का रूप अभिषेक नंदकिशोर भावसार एवं हिरण्कश्यप का रूप उदित संतोष भावसार ने धारण किया। इसके अलावा श्री गणेश जी, हनुमान जी, भूत-पिशाच आदि का स्वांग क्रमशः आयुष भार्गव और प्रीत भार्गव ने रचा। श्री गणेश, हनुमान, मां अंबे एवं माता महाकाली का स्वांग रचने वाले सर्वप्रथम अधिष्ठाता भगवान श्री सिध्दनाथ महादेव जी के दर्शन करने के पश्चात ही निकलते है। 



इन्होंने की साज और सुर से मां अंबे की अगवानी
खप्पर के दौरान साज और सुर में वरिष्ठ श्री मोहन बादशाह, राजू भावसार, जगदीश भावसार, सोनु बादशाह, राम भावसार, कान्हा गबु भावसार, धर्मेंद्र भावसार लाला, लोकेश भावसार, श्याम भावसार, शैलेंद्र भावसार, अभिषेक भावसार, निखिल भावसार, कमल भावसार, अनुज भावसार, अज्जू भावसार, रितिक धारे, शुभ भावसार, वैभव भावसार, सौरभ भावसार, रिषी भावसार, आदित्य भावसार आदि ने झान व मिरदिंग के साथ मां अंबे की अगवानी की और गरबियों की प्रस्तुतियां दी।




इनका रहा विशेष योगदान
खप्पर कार्यक्रम के दौरान डॉ. भावसार, गोविंद भावसार, हेमंत भावसार, राधेश्याम भावसार, मनोहर भावसार मुनू, पवन भावसार, भोला भावसार, गौरव भावसार अप्पु, पंकज भावसार, नीरज भावसार सन्नी, जगदीश भावसार, मनोज भावसार, प्रीत भावसार, अनिल धारे, हरिश गोस्वामी का सराहनीय योगदान रहा। 


 



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