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हमारी संवेदनाओं के संसार को निरन्तर विशद कर रहा है प्रवासी साहित्य - प्रो शर्मा

हमारी संवेदनाओं के संसार को निरन्तर विशद कर रहा है प्रवासी साहित्य - प्रो शर्मा


भारतीय संस्कृति के प्रसार में प्रवासी साहित्यकारों का योगदान अविस्मरणीय - श्री शर्मा


हिंदी के विकास में प्रवासी साहित्य की भूमिका पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी संपन्न



भारत की प्रतिष्ठित संस्था राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना द्वारा हिंदी के विकास में प्रवासी साहित्य की भूमिका पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी की मुख्य अतिथि संस्था के अध्यक्ष श्री ब्रजकिशोर शर्मा, उज्जैन थे। प्रमुख वक्ता विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के हिंदी विभाग के अध्यक्ष एवं कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा थे। विशिष्ट अतिथि प्रसिद्ध प्रवासी साहित्यकार एवं अनुवादक श्री सुरेशचंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे, श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुंबई, डॉ शंभू पवार, झुंझुनू, डॉ मनीषा शर्मा, अमरकंटक, डॉ जयभारती चंद्राकर, रायपुर, डॉ उर्वशी उपाध्याय, प्रयाग एवं संस्था के महासचिव डॉ प्रभु चौधरी ने विचार व्यक्त किए। यह संगोष्ठी हिंदी पखवाड़े के अंतर्गत आयोजित की गई।



मुख्य अतिथि शिक्षाविद् श्री ब्रजकिशोर शर्मा कहा कि अनेक शताब्दियों से भारत के लोगों का प्रवास दूर देशों तक हुआ है। दुनिया के विभिन्न भागों में भारतवंशियों और प्रवासी रचनाकारों ने भारतीय संस्कृति के प्रसार में अविस्मरणीय योगदान दिया है। प्रवासियों द्वारा प्रकाशित भारतीय भाषाओं की अनेक पत्रिकाएँ भाषा और साहित्य के विकास में निरंतर सक्रिय बनी हुई हैं। पारस्परिक अनुवाद के क्षेत्र में प्रवासी साहित्यकारों की देन अत्यंत महत्वपूर्ण है।



संगोष्ठी के प्रमुख वक्ता लेखक एवं आलोचक प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि हिंदी को विश्व भाषा बनाने में प्रवासी साहित्य की अविस्मरणीय भूमिका है। प्रवासी साहित्य हमारी संवेदनाओं के संसार को निरन्तर विशद कर रहा है। हिंदी का प्रारम्भिक प्रवासी साहित्य अपार कष्ट, संघर्ष और अभाव की कोख से उपजा है। उसमें पीड़ा और गुलामी झेलते प्रवासियों के पसीने और रक्त की बूंदें झलकती हैं। गिरमिटिया श्रमिकों के हास – अश्रु, सुख-दुख, संघर्ष - उमंग को प्रवासी साहित्य में मार्मिक अभिव्यक्ति मिली है। प्रवासी साहित्यकारों ने असमाप्त शोषण, असमानता और परतंत्रता के प्रतिकार को तीखा स्वर दिया है। प्रवासी रचनाकार भारतीय जीवन शैली और मूल्यों के साथ अपनी भूमि और संस्कृति को व्यापक परिप्रेक्ष्य दे रहे हैं। वर्तमान में प्रवासी लोक साहित्य को लेकर नई सजगता की दरकार है। प्रवासियों ने साहित्य की विविध विधाओं के विकास में अविस्मरणीय योगदान दिया है। हिंदी साहित्य के इतिहास में प्रवासी साहित्य को मुकम्मल स्थान मिलना चाहिए।



वरिष्ठ प्रवासी साहित्यकार डॉ सुरेशचंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे ने कहा कि प्रवासी साहित्य ने हिंदी को नया आयाम, नया विस्तार दिया है। नॉर्वे से अनेक हिंदी पत्र - पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं। परिचय पत्रिका का प्रकाशन दशकों पहले नॉर्वे से शुरू हुआ था। वर्तमान में वैश्विका, स्पाइल दर्पण जैसी महत्वपूर्ण पत्रिकाएं प्रवासी साहित्य को स्थान दे रही हैं। नॉर्वे में हिंदी शिक्षण के लिए भी पर्याप्त प्रयास किए गए हैं।


डॉ सुवर्णा जाधव, मुम्बई ने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि प्रवासी साहित्य का हमारी भाषा और संस्कृति के साथ गहरा संबंध है। यह साहित्य अलग अलग देशों के संस्कृत आदान -प्रदान में विशिष्ट योगदान दे रहा है भाषा को निरंतर प्रवाहित करने का कार्य प्रवासी साहित्य करता है।


डॉ शंभू पंवार, झुंझुनूं ने कहा कि भारतीय मूल के लाखों लोग विदेशों में बसे हुए हैं। प्रवासी साहित्य हिंदी को गौरव दिला रहा है। हिंदी भाषा और साहित्य के प्रसार में उनका विशिष्ट योगदान है। अनेक पत्र - पत्रिकाएं इस दिशा में अपना योगदान दे रही हैं।


डॉ मनीषा शर्मा, अमरकंटक ने कहा कि प्रवासी साहित्य नवयुगीन साहित्य विमर्श का अंग है। आजीविका, शिक्षा और व्यवसाय के लिए भारत से बाहर गए प्रवासियों ने मातृभूमि और मातृभाषा के प्रति प्रेम के साथ महत्वपूर्ण सृजन किया। प्रवासी साहित्य में विस्थापन का दर्द अभिव्यक्त हुआ है। हिंदी का प्रवासी साहित्य सेतु का कार्य कर रहा है।


संगोष्ठी में डॉ शैल चंद्रा, रायपुर एवं डॉ जयभारती चंद्राकर, रायपुर ने छत्तीसगढ़ी और हिंदी के अन्तः संबंधों पर प्रकाश डाला।



संगोष्ठी की प्रस्तावना एवं संस्था की कार्ययोजना महासचिव डॉ प्रभु चौधरी ने प्रस्तुत की। स्वागत भाषण एवं संस्था परिचय डॉ रचना पांडेय ने दिया।


संगोष्ठी में डॉ शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे, डॉ वी के मिश्रा, इंदौर, डॉ रश्मि चौबे, उदय किरौला, अल्मोड़ा, डॉ लता जोशी, मुंबई, राजकुमार यादव, अशोक सिंह, श्रीविद्या पी वी, जे के रत्नाकर, मल्लीनाथ बिराजदार, सुषमा अडिल, डॉ मनीष पांडेय, डॉ रोहिणी डाबरे, अहमदनगर, डॉ प्रवीण बाला, पटियाला, डॉ भरत शेणकर, डॉ शिवा लोहारिया, जयपुर, प्रभा बैरागी, डॉ शम्भू पंवार, झुंझुनूं, डॉ ज्योति सिंह, इंदौर, डॉ शैल चंद्रा, डॉ ममता झा, विनोद विश्वकर्मा, अरुणा शुक्ला, डॉ धर्मेंद्र वर्मा, आलोक कुमार सिंह, डॉ श्वेता पंड्या, डॉ अनिता पाटीदार, ललिता आशापुरे, मीर सैयद, प्रीति शर्मा आदि सहित देश के विभिन्न भागों के साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी एवं प्रतिभागी उपस्थित थे।


प्रारंभ में छत्तीसगढ़ी में सरस्वती वंदना डॉ जयभारती चंद्राकर, रायपुर एवं संगीतमय वंदना डॉ आभा श्रीवास्तव, रायपुर ने की।


कार्यक्रम का संचालन डॉ मुक्ता कौशिक, रायपुर किया। आभार प्रदर्शन डॉ आशीष नायक, रायपुर ने किया।



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