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दुनिया भर में पन्द्रह प्रतिशत से अधिक संप्रेषण हिंदी के माध्यम से हो रहा है – प्रो. शर्मा

सादर प्रकाशनार्थ



दुनिया भर में पन्द्रह प्रतिशत से अधिक संप्रेषण हिंदी के माध्यम से हो रहा है – प्रो. शर्मा



विश्व में हिंदी : सफलता और सम्भावनाएँ पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी संपन्न




देश की प्रतिष्ठित संस्था राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना द्वारा विश्व में हिंदी : सफलता और सम्भावनाएँ पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी के प्रमुख अतिथि ओस्लो, नॉर्वे के वरिष्ठ प्रवासी साहित्यकार एवं अनुवादक श्री सुरेशचंद्र शुक्ल शरद आलोक थे। प्रमुख वक्ता विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के हिंदी विभाग के अध्यक्ष एवं कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा थे। सारस्वत अतिथि संस्था के अध्यक्ष श्री ब्रजकिशोर शर्मा, उज्जैन थे। विशिष्ट अतिथि नागरी लिपि परिषद, नई दिल्ली के महामंत्री डॉ हरिसिंह पाल, श्री मनीष वर्मा, इंदौर, डॉ रीता सिंह, कुल्लू, श्री हरेराम वाजपेयी, इंदौर एवं संस्था के महासचिव डॉ प्रभु चौधरी ने विचार व्यक्त किए। अध्यक्षता डॉ शहाबुद्दीन नियाज़ मोहम्मद शेख, पुणे ने की। यह संगोष्ठी हिंदी पखवाड़े के समापन अवसर आयोजित की गई।




मुख्य अतिथि प्रवासी साहित्यकार श्री सुरेश चंद्र शुक्ला शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे ने कहा कि हिंदी दुनिया की एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में स्वीकृत है। मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, नॉर्वे सहित अनेक देशों में हिंदी के पठन-पाठन और पत्र - पत्रिकाओं के प्रकाशन के माध्यम से महत्वपूर्ण कार्य हो रहा है। विभिन्न क्षेत्रों में हिंदी के प्रयोग को अधिकाधिक बढ़ावा देना आवश्यक है। विदेशों में हिंदी के प्रसार एवं शिक्षण के लिए भारतीय दूतावासों का सहयोग एवं परामर्श लिया जाना चाहिए।




प्रमुख वक्ता लेखक एवं आलोचक प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि हिंदी विश्व आज व्यापक संदर्भों में यथार्थ बन गया है। दुनिया में विभिन्न रूपों में लगभग पन्द्रह प्रतिशत से अधिक संप्रेषण हिंदी के माध्यम से हो रहा है। भारत की सीमाओं से परे साढ़े तीन करोड़ से अधिक भारतवंशी इसे विश्व भाषा के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। हिंदी भारतीय संस्कृति, एवं परंपरा की संवाहिका के साथ ही साहित्यिक एवं विभिन्न संचार माध्यमों में अभिव्यक्ति का माध्यम बनी हुई है। दुनिया के कई देशों में शिक्षा एवं राजकीय प्रयोजनों में भी हिंदी का प्रयोग हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी की प्रतिष्ठा के लिए व्यापक प्रयासों की आवश्यकता है। हिंदी भिन्न - भिन्न देश, संस्कृति और भाषाओं के मध्य सेतु का कार्य कर रही है।


कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे ने कहा कि विश्व भाषा के रूप में हिंदी के विकास में अनेक व्यक्तियों और संस्थाओं का योगदान रहा है। दुनिया के कोने कोने में हिंदी अनेक माध्यमों से पहुंच गई है। देश विदेश के भाषा प्रेमी हिंदी के महत्व को पहचानें और इसकी प्रगति के लिए निरंतर प्रयास करें। 



विशिष्ट अतिथि डॉ हरिसिंह पाल, नई दिल्ली ने कहा कि भारत की सीमाओं से परे अनेक देशों में हिंदी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है। प्रवासी साहित्य ने हिंदी के प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। स्वयं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में इंडियन ओपिनियन का प्रकाशन हिंदी, तमिल आदि भाषाओं में किया था।



सारस्वत अतिथि शिक्षाविद् श्री ब्रजकिशोर शर्मा, उज्जैन ने कहा कि नवीन शोध के अनुसार हिंदी विश्व में प्रथम स्थान पर प्रतिष्ठित हो गई है। भारतीय संस्कृति को समझने के लिए हिंदी आवश्यक है। वर्तमान में विश्व में हिंदी के प्रयोग से जुड़े हुए विभिन्न पहलुओं को लेकर व्यापक सर्वेक्षण एवं अनुसंधान की आवश्यकता है। इससे हिंदी के संबंध में अनेक नवीन तथ्य उद्घाटित होंगे भारतीय दूतावासों में हिंदी के पठन-पाठन की व्यवस्था होनी चाहिए।


विशिष्ट अतिथि डॉ रीता सिंह, कुल्लू एवं श्री मनीष वर्मा, इंदौर ने हिंदी की वैश्विक स्थिति और संभावनाओं पर प्रकाश डाला।



स्वागत भाषण सुवर्णा जाधव मुंबई ने दिया। हिंदी पखवाड़े के अंतर्गत आयोजित विभिन्न गतिविधियों का ब्यौरा डॉक्टर लता जोशी मुंबई ने प्रस्तुत किया।



संगोष्ठी की प्रस्तावना डॉ शम्भू पंवार, झुंझुनूं ने प्रस्तुत की। संस्था की गतिविधियों का परिचय महासचिव डॉ प्रभु चौधरी ने प्रस्तुत किया। स्वागत भाषण एवं संस्था परिचय डॉ शिवा लोहारिया, जयपुर ने दिया।




संगोष्ठी में डॉ रीता सिंह, रेणुका अरोरा, डॉ वी के मिश्रा, इंदौर, डॉ रश्मि चौबे, डॉ मुक्ता कौशिक, डॉ रोहिणी डाबरे, अहमदनगर, डॉ प्रवीण बाला, पटियाला, ममता झा, श्रीमती राधा दुबे, श्री राजकुमार यादव, मुंबई, डॉ भरत शेणकर, डॉ शिवा लोहारिया, जयपुर, प्रभा बैरागी, डॉ शम्भू पंवार, झुंझुनूं, आर्यावर्ती जोशी, डॉ ज्योति सिंह, इंदौर, अनुराधा अच्छावन, ज्योति तिवारी, शैल चंद्रा,, पुष्पा गरोठिया, अनुराधा अच्छवान, नई दिल्ली, जयभारती चंद्राकर, पूर्णिमा जेंडे, रविकांत सिंह, संगीता पाल, कच्छ, संजय कुमार शर्मा, मंजुला डाबरे इलाही शेख, अनुराधा सिंह, शिरीष जोशी, डॉ ममता झा, विनोद विश्वकर्मा, अरुणा शुक्ला, आलोक कुमार सिंह आदि सहित देश के विभिन्न भागों के साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी एवं प्रतिभागी उपस्थित थे।


प्रारंभ में सरस्वती वंदना ज्योति तिवारी, इंदौर ने की।


कार्यक्रम का संचालन डॉ सविता नागरे, अहमदनगर ने किया। आभार प्रदर्शन सुश्री रागिनी शर्मा, इंदौर ने किया।


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