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सुखी जीवन की कुंजी है, वात्सल्यमयी जीवन


सुखी जीवन की कुंजी है : वात्सल्यमयी जीवन


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#प्रवचन #श्रृंखला


#श्री #दिगंबर #जैन #सिद्धक्षेत्र , #बावनगजा ( #चूलगिरी)


जिला - #बड़वानी (#मध्यप्रदेश - #भारत)


#रविवार_09_08_2020


बावनगजाजी प्रवचन


सिद्धक्षेत्र बावनगजाजी मे परम पूज्य मुनिश्री 108 अध्ययन सागरजी महाराज व परम पूज्य 105 आर्यिका विदक्षाश्री माताजी का चातुर्मास हो रहा है। श्रावकाचार ग्रंथ का स्वाध्याय कराते हुये मुनिश्री अध्ययन सागरजी महाराज ने अपने उदबोधन में कहा कि -


पुज्य मुनिश्री ने सम्यग्दृष्टि जीव के वात्सल्य अंग पर व्याख्यान करते हुये कहा की जिस प्रकार गाय अपने बछडे से कोई अपेक्षा नही रखती, और निश्छल प्यार अपने बछडे से करती है, उस पर ममता उडेलती है। उसके हृदय में कोई छल कपट नहीं रह जाता,उसी प्रकार जो जीव साम्यदृष्टि रखने वाला होता है, जो निश्चल व करूणामयी होता है, सब के भले की बात सोचता है वही जीव वात्सल्य अंग का धारी होता है। ऐसे व्यक्ति का निष्ठुरता, कठोरता, से नाता टूट जाता है। जो एक दूसरे के प्रति प्रेम स्नेह के भाव रखता है। वही पर कर्कशता व कडवाहट अपना स्थान छोड देती है। साथ मे रहने वालो के साथ साथ प्राणी मात्र के प्रति सुंदर भावना, रखना उनको आगे बढ़ाने की भावना होना इसी का नाम वात्सल्य है।


जहाँ दिल मे कोई उलझी हुई सोच न हो सभी के प्रति सामंजस्य आदर के भाव ही हमे उन्नत व उँचा उठाते है, समाज मे महत्वपूर्ण स्थान दिलाते है, सर्वत्र प्रशंसा होती हैं, सभी लोग उसको पसंद करते है, उसे अपने पास बैठाते है, यह है हमारे वात्सल्य का प्रभाव। यदि हम जगत मे सभी के चहेते व लाडले बनना चाहते है तो दूसरो की प्रशंसा व उनके गुणो की चर्चा अनुमोदना सभी से करे, मैत्री भाव स्थापित करे, सुख बाटे - सुख देना सीखे, अच्छी सीख को लेना सीखे, वसुधैव कुटुम्कम की भावना को समाहित करे। यदि हम सुई बनकर सभी को जोड़ने का कार्य करेगे, तब तो हमारा सामाजिक स्तर पर हॅसना, मुस्कुराना, गले लगाना, सार्थक होगा। नहीं तो यह छलकपट माना जायेगा।


हमे तलवार बनकर लोगो को तोडने का कार्य नही करना है, अपितु दिलो को जोडने का कार्य करना है, सभी जीवो के प्रति दया, करूणा, अहिंसा, सुख, शांति, मित्रता के भाव रखना है। हमारे द्वारा किसी भी जीव का दिल न दुःखे, हमारे द्वारा कोई जीव सताया न जाये, किसी भी जीव के सम्मान को ठोस न पहुँचे। अपने द्वारा अशांति, युद्ध. कोलाहल, वैमनस्याता, शत्रुता आदि स्थापित न हो, जितना भी बन सके, हम दूसरो के काम आये सभी के दुःखो को दूर करने में सहयोगी बने । ऐसी पवित्र भावना सभी जीवो की होना चाहिये।


प्रबंधक
प्रबंधक श्री दिगम्बर जैन सिद्धक्षेत्र
बावनगजा (घूलगिरी)


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