Skip to main content

उज्जैन शहर में मप्र के बाहर से आने वाले आगन्तुकों की सम्बन्धित क्षेत्र के पुलिस थानों पर अथवा पुलिस कंट्रोल रूम 0734-2525253 पर जानकारी देना अनिवार्य किया गया


उज्जैन 02 जुलाई। कलेक्टर एवं जिला दण्डाधिकारी श्री आशीष सिंह ने दंड प्रक्रिया संहिता-1973 की धारा-144 के अन्तर्गत जनसामान्य के हित, स्वास्थ्य एवं लोकशान्ति को बनाये रखने के लिये प्रतिबंधात्मक आदेश जारी करते हुए उज्जैन शहर में प्रतिदिन मप्र के बाहर से आने वाले आगन्तुकों की जानकारी सम्बन्धित क्षेत्र के पुलिस थानों पर अथवा पुलिस कंट्रोल रूम 0734-2525253 पर देने के निर्देश जारी किये हैं। जिससे कि आगन्तुकों का स्वास्थ्य सत्यापन किया जाकर कोरोना वायरस संक्रमण की रोकथाम सुनिश्चित की जा सके। उज्जैन शहर में आने वाले आगन्तुकों की जानकारी उपलब्ध न होने की स्थिति में सम्बन्धित आगन्तुकों का हैल्थ चेकअप एवं स्क्रीनिंग नहीं हो पाती है।


      कलेक्टर द्वारा जारी किये आदेश में उज्जैन शहर के सभी मकान मालिकों एवं निवासियों को निर्देशित किया गया है कि यदि उनके घर पर कोई व्यक्ति मप्र के बाहर से आता है तो सभी मकान मालिकों को उक्त सूचना उसी दिन पुलिस कंट्रोल रूम अथवा थाने पर करना अनिवार्य होगा। सभी यात्रीगणों, होटल, लॉज, धर्मशाला को अपने यहां मप्र के बाहर से आने वाले सभी व्यक्तियों की सूचना, यदि मकान एवं दुकान मालिक द्वारा मप्र के बाहर के किरायेदार रखे जाते हैं तो सम्बन्धित थाने में इसकी सूचना उसी दिन दी जाना अनिवार्य किया गया है। इसी तरह यदि घरेलु नौकर एवं व्यावसायिक नौकर मप्र के बाहर के हैं और उनको कार्य पर रखा जाता है तो सम्बन्धित स्वामी को थाने में सूचना दी जाना अनिवार्य किया गया है। निजी छात्रावासों में यदि मप्र के बाहर के छात्र एवं छात्राओं की आमद होती है तो सम्बन्धित छात्रावास के संचालक अथवा स्वामी को, भवन निर्माण कार्य में लगे पेशेवर मजदूरों एवं कारीगरों की सूचना सम्बन्धित ठेकेदार को, पेइंग गेस्ट की सूचना सम्बन्धित मकान मालिक को थाने पर अथवा पुलिस कंट्रोल रूम के दूरभाष नम्बर पर उपलब्ध कराना होगी। उक्त सभी मामलों में बाहर से आये हुए व्यक्ति यदि 14 दिवस से उज्जैन नगर में रह रहे हैं तो इस आशय की सूचना भी सम्बन्धित मालिक के द्वारा यदि नहीं दी गई है तो तत्काल उक्त सूचना थाने में अथवा पुलिस कंट्रोल रूम में दिया जाना अनिवार्य किया गया है। धारा-144 के तहत जारी किये गये आदेश का उल्लंघन विभिन्न अधिनियमों के प्रावधानों के अन्तर्गत दण्डनीय होगा।


Comments

Popular posts from this blog

आधे अधूरे - मोहन राकेश : पाठ और समीक्षाएँ | मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे : मध्यवर्गीय जीवन के बीच स्त्री पुरुष सम्बन्धों का रूपायन

  आधे अधूरे - मोहन राकेश : पीडीएफ और समीक्षाएँ |  Adhe Adhure - Mohan Rakesh : pdf & Reviews मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और कथाकार मोहन राकेश का जन्म  8 जनवरी 1925 को अमृतसर, पंजाब में  हुआ। उन्होंने  पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए उपाधि अर्जित की थी। उनकी नाट्य त्रयी -  आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे भारतीय नाट्य साहित्य की उपलब्धि के रूप में मान्य हैं।   उनके उपन्यास और  कहानियों में एक निरंतर विकास मिलता है, जिससे वे आधुनिक मनुष्य की नियति के निकट से निकटतर आते गए हैं।  उनकी खूबी यह थी कि वे कथा-शिल्प के महारथी थे और उनकी भाषा में गज़ब का सधाव ही नहीं, एक शास्त्रीय अनुशासन भी है। कहानी से लेकर उपन्यास तक उनकी कथा-भूमि शहरी मध्य वर्ग है। कुछ कहानियों में भारत-विभाजन की पीड़ा बहुत सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुई है।  मोहन राकेश की कहानियां नई कहानी को एक अपूर्व देन के रूप में स्वीकार की जाती हैं। उनकी कहानियों में आधुनिक जीवन का कोई-न-कोई विशिष्ट पहलू उजागर

मालवी भाषा और साहित्य : प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा

MALVI BHASHA AUR SAHITYA: PROF. SHAILENDRAKUMAR SHARMA पुस्तक समीक्षा: डॉ श्वेता पंड्या Book Review : Dr. Shweta Pandya  मालवी भाषा एवं साहित्य के इतिहास की नई दिशा  लोक भाषा, लोक साहित्य और संस्कृति का मानव सभ्यता के विकास में अप्रतिम योगदान रहा है। भाषा मानव समुदाय में परस्पर सम्पर्क और अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। इसी प्रकार क्षेत्र-विशेष की भाषा एवं बोलियों का अपना महत्त्व होता है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति से जुड़े विशाल वाङ्मय में मालवा प्रदेश, अपनी मालवी भाषा, साहित्य और संस्कृति के कारण महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ की भाषा एवं लोक-संस्कृति ने  अन्य क्षेत्रों पर प्रभाव डालते हुए अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। मालवी भाषा और साहित्य के विशिष्ट विद्वानों में डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। प्रो. शर्मा हिन्दी आलोचना के आधुनिक परिदृश्य के विशिष्ट समीक्षकों में से एक हैं, जिन्होंने हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं के साथ-साथ मालवी भाषा, लोक एवं शिष्ट साहित्य और संस्कृति की परम्परा को आलोचित - विवेचित करने का महत्त्वपूर्ण एवं सार्थक प्रयास किया है। उनकी साह

हिंदी कथा साहित्य / संपादक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा

हिंदी कथा साहित्य की भूमिका और संपादकीय के अंश : किस्से - कहानियों, कथा - गाथाओं के प्रति मनुष्य की रुचि सहस्राब्दियों पूर्व से रही है, लेकिन उपन्यास या नॉवेल और कहानी या शार्ट स्टोरी के रूप में इनका विकास पिछली दो सदियों की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। हिंदी में नए रूप में कहानी एवं उपन्यास  विधा का आविर्भाव बीसवीं शताब्दी में हुआ है। वैसे संस्कृत का कथा - साहित्य अखिल विश्व के कथा - साहित्य का जन्मदाता माना जाता है। लोक एवं जनजातीय साहित्य में कथा – वार्ता की सुदीर्घ परम्परा रही है। इधर आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य का विकास संस्कृत - कथा - साहित्य अथवा लोक एवं जनजातीय कथाओं की समृद्ध परम्परा से न होकर, पाश्चात्य कथा साहित्य, विशेषतया अंग्रेजी साहित्य के प्रभाव रूप में हुआ है।  कहानी कथा - साहित्य का एक अन्यतम भेद और उपन्यास से अधिक लोकप्रिय साहित्य रूप है। मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना - सुनना मानव का स्वभाव बन गया। सभी प्रकार के समुदायों में कहानियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में तो कहानियों की सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा रही है। वेद - उपनिषदों में वर्णित यम-य