Skip to main content

तुलसी के मानस को विदेशों में बसे भारतीयों ने दिल से लगाया हुआ है 

तुलसी जयंती पर नॉर्वेजियन भाषा में तुलसी के मानस के अंशों का अनुवाद बना ऐतिहासिक उपलब्धि



उज्जैन। भारत की प्रतिष्ठित संस्था राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना द्वारा तुलसी जयंती पर अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह संगोष्ठी गोस्वामी तुलसीदास : वैश्विक परिप्रेक्ष्य में पर एकाग्र थी। आयोजन के प्रमुख अतिथि प्रख्यात प्रवासी साहित्यकार एवं अनुवादक श्री सुरेशचंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे एवं मुख्य वक्ता समालोचक एवं विक्रम विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता शिक्षाविद् श्री बृजकिशोर शर्मा ने की। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि श्री राकेश छोकर, नई दिल्ली एवं श्री हरेराम वाजपेयी, इंदौर थे। संगोष्ठी की प्रस्तावना संस्था के महासचिव डॉ प्रभु चौधरी ने प्रस्तुत की।



प्रमुख अतिथि ओस्लो, नॉर्वे के श्री सुरेशचंद्र शुक्ल शरद आलोक ने कहा कि तुलसी के रामचरितमानस को विदेशों में बसे भारतीयों ने अपने दिल से लगाया हुआ है। भारतवंशी जहां भी गए हैं, वहाँ अपने साथ भाषा, संस्कार और शिष्टाचार के साथ तुलसी जैसे महान् भक्तों की वाणी को ले गए हैं। उन्होंने नॉर्वेजियन भाषा में तुलसी के रामचरितमानस के चुनिंदा अंशों का अनुवाद प्रस्तुत किया, जो संगोष्ठी की ऐतिहासिक उपलब्धि बना। स्वीडन, डेनमार्क, नॉर्वे जैसे देशों में प्रचलित स्केंडनेवियन भाषाओं के बीच पहला होने के कारण यह अनुवाद ऐतिहासिक महत्त्व का है। श्री शुक्ला ने नॉर्वे में बसे भारतवंशियों के जीवन पर तुलसी साहित्य के प्रभाव की भी चर्चा की।



संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में समालोचक एवं साहित्यकार प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा ने अपने व्याख्यान में वैश्विक संस्कृति पर तुलसी के मानस के प्रभाव और व्याप्ति पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि तुलसी की विश्व दृष्टि अत्यंत व्यापक है। उनका साहित्य विश्व संस्कृति को बहुत कुछ दे सकता है। दुनिया को पारिवारिक और सामुदायिक जीवन में परस्पर प्रेम, बन्धुत्व और समरसता की दृष्टि की आवश्यकता है, जो तुलसी साहित्य से सहज ही मिल सकती है। विश्व के अनेक देशों में तुलसी की कृतियों की अनुगूंज सुनाई देती है। उनकी रचनाएं देश विदेश के लोगों की जीवन दृष्टि के विकास में सहायक बनी हुई हैं। तुलसी का रामचरितमानस मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद जैसे अनेक देशों में बसे लगभग तीन करोड़ लोगों के बीच सांस्कृतिक धरोहर और प्रेरणा पुंज के रूप में जीवंत है। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी, रूसी, फारसी आदि भाषाओं के बाद श्री सुरेश चंद शुक्ल द्वारा नॉर्वेजियन में किए जा रहा रामचरितमानस का अनुवाद नई सदी की उपलब्धि है। तुलसी काव्य में निहित सार्वभौमिक जीवन मूल्यों का प्रादर्श विश्व मानव को उनकी विलक्षण देन है। तुलसी का रामराज्य और जीवन दर्शन महात्मा गांधी के यहां स्वराज्य, सत्याग्रह, अहिंसा, असहयोग, आत्म त्याग के रूप में उतरे हैं, जो वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य हुए। गांधी जी ने तुलसी के साहित्य का प्रयोग व्यापक राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के लिए किया।



विशिष्ट अतिथि श्री राकेश छोकर, नई दिल्ली ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी कृतियों के द्वारा राम के आदर्श को प्रस्तुत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने जन भाषा के माध्यम से उदात्त जीवन मूल्यों को प्रसारित करने का अविस्मरणीय प्रयास किया। 



कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए संस्था के अध्यक्ष श्री बृजकिशोर शर्मा ने कहा कि तुलसी का चिंतन अत्यंत व्यापक है। उनका साहित्य संवेदना और विचार का अथाह सागर है। उनकी रचनाएं शांति और सद्भाव का बोध कराती हैं। तुलसी सही अर्थों में महामानव थे। वे एक साथ परंपराशील और प्रगतिशील दोनों हैं।



प्रारंभ में संगोष्ठी की प्रस्तावना रखते हुए संस्था के महासचिव श्री प्रभु चौधरी ने कहा कि तुलसी का साहित्य सही अर्थों में वैश्विक है। उन्होंने जन जन के मध्य भारतीय जीवन मूल्यों की प्रतिष्ठा की।



आयोजन में श्री हरेराम वाजपेयी, इंदौर, एवं श्री सुंदर लाल जोशी, नागदा ने तुलसी के जीवन और व्यक्तित्व से जुड़ी कविताएं प्रस्तुत कीं। श्री हरिराम वाजपेयी की कविता तुलसी में की पंक्तियाँ थीं, तुलसी पर्याय है भावना और पवित्रता का। तुलसी पर्याय है अनेकता में एकता का। तुलसी ही भक्त है तुलसी ही भगवान है। राम में बसा है तुलसी तुलसी में राम है। 



कवि श्री सुंदर लाल जोशी की काव्य पंक्तियां थीं, पथ प्रदर्शक जन जन के, आत्माराम सपूत। चित्रकूट के घाट पर, मिला राम का दूत। तुलसी ने संसार को, दिया अनोखा ग्रंथ। पकड़े इसकी राह जो, मिले स्वर्ग का पंथ।



इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में श्री मोहनलाल वर्मा, जयपुर, डॉ शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे, शम्भू पँवार, जयपुर, डॉ कविता रायजादा, आगरा, तूलिका सेठ, गाजियाबाद, जी डी अग्रवाल, इंदौर, श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुंबई, श्री अनिल ओझा, इंदौर आदि सहित देश के विभिन्न राज्यों के विद्वानों और प्रतिभागियों ने भाग लिया।


संगोष्ठी की सूत्रधार निरूपा उपाध्याय, देवास थीं। आभार प्रदर्शन साहित्यकार श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुंबई ने किया।


कार्यक्रम में डॉ. उर्वशी उपाध्याय, प्रयाग, डॉ. शैल चन्द्रा, रायपुर, डॉ हेमलता साहू, अम्बिकापुर, डॉ कृष्णा श्रीवास्तव, मुंबई, डॉ ज्योति सिंह, इंदौर, श्रीमती प्रभा बैरागी, उज्जैन, डॉ. संगीता पाल, कच्छ, डॉ. सरिता शुक्ला, लखनऊ, प्रियंका द्विवेदी, प्रयाग, विनीता ओझा, रतलाम, पायल परदेशी, महू, जयंत जोशी, धार, अनुराधा गुर्जर, दिल्ली, राम शर्मा परिंदा, मनावर, डॉ मुक्ता कौशिक, रायपुर, डॉ संजीव कुमारी, हिसार, अनुराधा गुर्जर, दिल्ली, डॉ श्वेता पंड्या, विजय कुमार शर्मा, प्रियंका परस्ते, कमल भूरिया, प्रवीण बाला, लता प्रसार, पटना, मधु वर्मा, श्रीमती दिव्या मेहरा, कोटा, डॉ. शिवा लोहारिया, जयपुर, सुश्री खुशबु सिंह, रायपुर आदि सहित देश के विभिन्न राज्यों के साहित्यकार, प्रतिभागी और शोधकर्ता उपस्थित थे।


 


Comments

Popular posts from this blog

आधे अधूरे - मोहन राकेश : पाठ और समीक्षाएँ | मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे : मध्यवर्गीय जीवन के बीच स्त्री पुरुष सम्बन्धों का रूपायन

  आधे अधूरे - मोहन राकेश : पीडीएफ और समीक्षाएँ |  Adhe Adhure - Mohan Rakesh : pdf & Reviews मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और कथाकार मोहन राकेश का जन्म  8 जनवरी 1925 को अमृतसर, पंजाब में  हुआ। उन्होंने  पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए उपाधि अर्जित की थी। उनकी नाट्य त्रयी -  आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे भारतीय नाट्य साहित्य की उपलब्धि के रूप में मान्य हैं।   उनके उपन्यास और  कहानियों में एक निरंतर विकास मिलता है, जिससे वे आधुनिक मनुष्य की नियति के निकट से निकटतर आते गए हैं।  उनकी खूबी यह थी कि वे कथा-शिल्प के महारथी थे और उनकी भाषा में गज़ब का सधाव ही नहीं, एक शास्त्रीय अनुशासन भी है। कहानी से लेकर उपन्यास तक उनकी कथा-भूमि शहरी मध्य वर्ग है। कुछ कहानियों में भारत-विभाजन की पीड़ा बहुत सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुई है।  मोहन राकेश की कहानियां नई कहानी को एक अपूर्व देन के रूप में स्वीकार की जाती हैं। उनकी कहानियों में आधुनिक जीवन का कोई-न-कोई विशिष्ट पहलू उजागर

हिंदी कथा साहित्य / संपादक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा

हिंदी कथा साहित्य की भूमिका और संपादकीय के अंश : किस्से - कहानियों, कथा - गाथाओं के प्रति मनुष्य की रुचि सहस्राब्दियों पूर्व से रही है, लेकिन उपन्यास या नॉवेल और कहानी या शार्ट स्टोरी के रूप में इनका विकास पिछली दो सदियों की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। हिंदी में नए रूप में कहानी एवं उपन्यास  विधा का आविर्भाव बीसवीं शताब्दी में हुआ है। वैसे संस्कृत का कथा - साहित्य अखिल विश्व के कथा - साहित्य का जन्मदाता माना जाता है। लोक एवं जनजातीय साहित्य में कथा – वार्ता की सुदीर्घ परम्परा रही है। इधर आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य का विकास संस्कृत - कथा - साहित्य अथवा लोक एवं जनजातीय कथाओं की समृद्ध परम्परा से न होकर, पाश्चात्य कथा साहित्य, विशेषतया अंग्रेजी साहित्य के प्रभाव रूप में हुआ है।  कहानी कथा - साहित्य का एक अन्यतम भेद और उपन्यास से अधिक लोकप्रिय साहित्य रूप है। मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना - सुनना मानव का स्वभाव बन गया। सभी प्रकार के समुदायों में कहानियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में तो कहानियों की सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा रही है। वेद - उपनिषदों में वर्णित यम-य

मालवी भाषा और साहित्य : प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा

MALVI BHASHA AUR SAHITYA: PROF. SHAILENDRAKUMAR SHARMA पुस्तक समीक्षा: डॉ श्वेता पंड्या Book Review : Dr. Shweta Pandya  मालवी भाषा एवं साहित्य के इतिहास की नई दिशा  लोक भाषा, लोक साहित्य और संस्कृति का मानव सभ्यता के विकास में अप्रतिम योगदान रहा है। भाषा मानव समुदाय में परस्पर सम्पर्क और अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। इसी प्रकार क्षेत्र-विशेष की भाषा एवं बोलियों का अपना महत्त्व होता है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति से जुड़े विशाल वाङ्मय में मालवा प्रदेश, अपनी मालवी भाषा, साहित्य और संस्कृति के कारण महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ की भाषा एवं लोक-संस्कृति ने  अन्य क्षेत्रों पर प्रभाव डालते हुए अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। मालवी भाषा और साहित्य के विशिष्ट विद्वानों में डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। प्रो. शर्मा हिन्दी आलोचना के आधुनिक परिदृश्य के विशिष्ट समीक्षकों में से एक हैं, जिन्होंने हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं के साथ-साथ मालवी भाषा, लोक एवं शिष्ट साहित्य और संस्कृति की परम्परा को आलोचित - विवेचित करने का महत्त्वपूर्ण एवं सार्थक प्रयास किया है। उनकी साह