Skip to main content

पथ व्यवसाइयों के कल्याण के लिये योजना शुरू

मध्यप्रदेश पथ विक्रेता योजना 


भोपाल : गुरूवार, जुलाई 2, 2020, 15:18 IST


प्रदेश में पथ व्यवसाइयों के कल्याण और उनको आजीविका चलाने के उचित अवसर देने के उद्देश्य से मध्यप्रदेश पथ विक्रेता योजना-2020 प्रारंभ की गयी है। पथ विक्रेताओं का सर्वेक्षण हर 3 वर्ष में कम से कम एक बार किया जायेगा। पथ व्यवसायी को पोर्टल के माध्यम से पहचान-पत्र और विक्रय प्रमाण-पत्र मिलेगा। नगरीय क्षेत्र के भीतर आवेदक को केवल एक विक्रय स्थल की अनुमति मिलेगी।









प्रमाण-पत्र 5 वर्ष के लिये होगा वैध




  • पथ व्यवसाई का कार्ड अहस्तांतरणीय होगा।




  • विक्रय के समय कार्ड रखना अनिवार्य होगा।




  • अधिकारियों द्वारा माँगे जाने पर कार्ड दिखाना होगा।




  • विस्फोटक सामग्री के व्यवसाय के लिये कार्ड का प्रयोग प्रतिबंधित रहेगा।




  • एक परिवार में एक व्यक्ति को ही लाभ मिलेगा।





विक्रय प्रमाण-पत्र 5 वर्ष के लिये वैध होगा। इसका अगले 3 वर्ष के लिये नवीनीकरण किया जा सकेगा। विक्रय प्रमाण-पत्र रद्द करने का कोई आदेश बगैर सुनवाई के नहीं दिया जायेगा। पथ विक्रेता यह सुनिश्चित करेगा कि उसके विक्रय क्षेत्र के निकट अवैध पार्किंग नहीं की जाये। विक्रय शुल्क में प्रति वर्ष न्यूनतम 5 प्रतिशत की वृद्धि की जायेगी।विक्रय क्षेत्र में उपलब्ध स्थान से विक्रेताओं की संख्या अधिक होने पर, विक्रेताओं को अलग-अलग पाली में विक्रय के लिये समय आवंटित किया जायेगा।


निषेध क्षेत्र


सचिवालय, कलेक्ट्रेट, जिला पंचायत, नगर निगम, नगरपालिका, नगर परिषद, केंटोनमेंट बोर्ड के कार्यालय, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और राज्य पुरातात्विक स्थलों के 200 मीटर के क्षेत्र में क्रय-विक्रय नहीं किया जा सकेगा। क्रॉसिंग के पास 50 मीटर तक भी क्रय-विक्रय प्रतिबंधित रहेगा।


फुटपाथ का उपयोग पथ विक्रय के लिये नहीं किया जा सकेगा। नगर विक्रय समिति का सामाजिक अंकेक्षण भी करवाया जायेगा। इससे संबंधित मामलों के समन्वय के लिये राज्य स्तर पर एक नोडल ऑफिसर नियुक्त किया जायेगा।


4 प्रकार के बाजार


योजना में 4 प्रकार के बाजार निर्धारित किये गये हैं। उत्सव बाजार- ऐसा बाजार, जहाँ विक्रेता और क्रेता परम्परागत रूप से त्यौहारों के दौरान उत्पादों या सेवाओं के क्रय-विक्रय के लिये इकट्ठे होते हैं। विरासत बाजार- ऐसा बाजार, जहाँ क्रेता और विक्रेता पारम्परिक रूप से उत्पादों और सेवाओं के लिये एकत्रित होते हैं और जो 50 वर्ष से भी अधिक समय से एक ही स्थान पर लग रहा हो। प्राकृतिक बाजार- नगर विक्रय समिति की अनुशंसा पर शुरू किया गया ऐसा बाजार, जहाँ क्रेता-विक्रेता परम्परागत रूप से एकत्रित होते हैं। रात्रि बाजार- ऐसा बाजार, जहाँ क्रेता-विक्रेता रात में उत्पादों और सेवाओं के क्रय-विक्रय के लिये एकत्रित होते हैं।


Bkk News


Bekhabaron Ki Khabar - बेख़बरों की खबर


Bekhabaron Ki Khabar, magazine in Hindi by Radheshyam Chourasiya / Bekhabaron Ki Khabar: Read on mobile & tablets - http://www.readwhere.com/publication/6480/Bekhabaron-ki-khabar


Comments

मध्यप्रदेश खबर

नेशनल न्यूज़

Popular posts from this blog

आधे अधूरे - मोहन राकेश : पाठ और समीक्षाएँ | मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे : मध्यवर्गीय जीवन के बीच स्त्री पुरुष सम्बन्धों का रूपायन

  आधे अधूरे - मोहन राकेश : पीडीएफ और समीक्षाएँ |  Adhe Adhure - Mohan Rakesh : pdf & Reviews मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और कथाकार मोहन राकेश का जन्म  8 जनवरी 1925 को अमृतसर, पंजाब में  हुआ। उन्होंने  पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए उपाधि अर्जित की थी। उनकी नाट्य त्रयी -  आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे भारतीय नाट्य साहित्य की उपलब्धि के रूप में मान्य हैं।   उनके उपन्यास और  कहानियों में एक निरंतर विकास मिलता है, जिससे वे आधुनिक मनुष्य की नियति के निकट से निकटतर आते गए हैं।  उनकी खूबी यह थी कि वे कथा-शिल्प के महारथी थे और उनकी भाषा में गज़ब का सधाव ही नहीं, एक शास्त्रीय अनुशासन भी है। कहानी से लेकर उपन्यास तक उनकी कथा-भूमि शहरी मध्य वर्ग है। कुछ कहानियों में भारत-विभाजन की पीड़ा बहुत सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुई है।  मोहन राकेश की कहानियां नई कहानी को एक अपूर्व देन के रूप में स्वीकार की जाती हैं। उनकी कहानियों में आधुनिक जीवन का कोई-न-कोई विशिष्ट पहलू उजागर

हिंदी कथा साहित्य / संपादक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा

हिंदी कथा साहित्य की भूमिका और संपादकीय के अंश : किस्से - कहानियों, कथा - गाथाओं के प्रति मनुष्य की रुचि सहस्राब्दियों पूर्व से रही है, लेकिन उपन्यास या नॉवेल और कहानी या शार्ट स्टोरी के रूप में इनका विकास पिछली दो सदियों की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। हिंदी में नए रूप में कहानी एवं उपन्यास  विधा का आविर्भाव बीसवीं शताब्दी में हुआ है। वैसे संस्कृत का कथा - साहित्य अखिल विश्व के कथा - साहित्य का जन्मदाता माना जाता है। लोक एवं जनजातीय साहित्य में कथा – वार्ता की सुदीर्घ परम्परा रही है। इधर आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य का विकास संस्कृत - कथा - साहित्य अथवा लोक एवं जनजातीय कथाओं की समृद्ध परम्परा से न होकर, पाश्चात्य कथा साहित्य, विशेषतया अंग्रेजी साहित्य के प्रभाव रूप में हुआ है।  कहानी कथा - साहित्य का एक अन्यतम भेद और उपन्यास से अधिक लोकप्रिय साहित्य रूप है। मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना - सुनना मानव का स्वभाव बन गया। सभी प्रकार के समुदायों में कहानियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में तो कहानियों की सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा रही है। वेद - उपनिषदों में वर्णित यम-य

चौऋषिया दिवस (नागपंचमी) पर चौऋषिया समाज विशेष, नाग पंचमी और चौऋषिया दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं

चौऋषिया शब्द की उत्पत्ति और अर्थ: श्रावण मास में आने वा ली नागपंचमी को चौऋषिया दिवस के रूप में पुरे भारतवर्ष में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता हैं। चौऋषिया शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द "चतुरशीतिः" से हुई हैं जिसका शाब्दिक अर्थ "चौरासी" होता हैं अर्थात चौऋषिया समाज चौरासी गोत्र से मिलकर बना एक जातीय समूह है। वास्तविकता में चौऋषिया, तम्बोली समाज की एक उपजाति हैं। तम्बोली शब्द की उत्पति संस्कृत शब्द "ताम्बुल" से हुई हैं जिसका अर्थ "पान" होता हैं। चौऋषिया समाज के लोगो द्वारा नागदेव को अपना कुलदेव माना जाता हैं तथा चौऋषिया समाज के लोगो को नागवंशी भी कहा जाता हैं। नागपंचमी के दिन चौऋषिया समाज द्वारा ही नागदेव की पूजा करना प्रारम्भ किया गया था तत्पश्चात सम्पूर्ण भारत में नागपंचमी पर नागदेव की पूजा की जाने लगी। नागदेव द्वारा चूहों से नागबेल (जिस पर पान उगता हैं) कि रक्षा की जाती हैं।चूहे नागबेल को खाकर नष्ट करते हैं। इस नागबेल (पान)से ही समाज के लोगो का रोजगार मिलता हैं।पान का व्यवसाय चौरसिया समाज के लोगो का मुख्य व्यवसाय हैं।इस हेतू समाज के लोगो ने अपन