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गुरु की साधना के अनुभव से ही शास्त्र ज्ञान सम्भव


भारतीय परंपरा में गुरु तत्त्व पर केंद्रित
राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी संपन्न 


उज्जैन। राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना द्वारा भारतीय परंपरा में गुरु तत्त्व पर केंद्रित राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी आयोजित की गई। प्रमुख अतिथि वरिष्ठ विद्वान, पूर्व कुलपति एवं संभागायुक्त डॉ मोहन गुप्त थे। विशिष्ट अतिथि विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलानुशासक एवं हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना के अध्यक्ष श्री ब्रजकिशोर शर्मा ने की।



संगोष्ठी का उद्घाटन व्याख्यान देते हुए मनीषी डॉ मोहन गुप्ता ने कहा कि गुरु को विद्यादाता और जीवन में संस्कार प्रदान करने वाला माना गया है। वेद एवं उपनिषदों में गुरु के लिए आचार्य शब्द का प्रयोग मिलता है। उसी अर्थ में बाद में गुरु शब्द बहुप्रचलित हुआ। गुरु की अवधारणा का पूर्ण विकास महाकाव्यों में हुआ है। वहां गुरु शब्द को नया अर्थवैभव मिला। जो जीवन में व्याप्त अंधकार को दूर करता है, वह सही अर्थों में गुरु है। श्रेष्ठ आचार - व्यवहार के लिए शास्त्र को प्रमाण माना गया है, किंतु शास्त्र से सीधे ग्रहण करना मुश्किल है। उसके लिए गुरु की साधना के अनुभव का लाभ लिए जाने पर बल दिया गया है।



प्रोफेसर शैलेंद्र कुमार शर्मा ने संबोधित करते हुए कहा कि भारतीय परंपरा में गुरुतत्त्व की महिमाशाली उपस्थिति रही है। शास्त्र ज्ञान और लोक व्यवहार के व्यापक संसार में गुरु ही सही राह दिखाते हैं। गुरु के कई रूप भारतीय परंपरा में मिलते हैं, इनमें प्रेरक, सूचक, वाचक, दर्शक, शिक्षक और बोधक रूप महत्त्वपूर्ण हैं। वे हमें सूचना और ज्ञान से बोध के स्तर तक ले जाते हैं। गुरु पूर्णिमा का पर्व शाश्वत ज्ञान परंपरा की आराधना का पर्व है। यह गुरु के प्रति कृतज्ञता का पर्व है, जो परम ज्ञान की साधना का अवसर देता है। 


शिक्षाविद श्री ब्रजकिशोर शर्मा ने अध्यक्षीय उद्बोधन देते  हुए कहा कि गुरु का महत्त्व जीवन में ज्ञान का सम्प्रसार करने के साथ ही नई दृष्टि देने के लिए है। श्रेष्ठ गुरु अपने आचरण और ज्ञान के माध्यम से हमारे  जीवन में व्यापक बदलाव लाता है। वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति के बावजूद जीवन में गुरु का महत्त्व सदैव बना रहेगा। 



प्रारंभ में स्वागत भाषण एवं आयोजन की रूपरेखा संस्था के महासचिव डॉ प्रभु चौधरी ने प्रस्तुत की। वाग्देवी की वंदना कवि श्री सुंदर लाल जोशी, नागदा ने की। लोक गायक श्री प्रीतम मालवीय ने गुरु भक्ति पर केंद्रित निर्गुणी गीत सुनाया।  संचालन कवयित्री रागिनी शर्मा, इंदौर ने और आभार प्रदर्शन श्री राकेश छोकर, नई दिल्ली ने किया।  


कार्यक्रम में श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुम्बई, श्री राकेश छोकर, नई दिल्ली, श्री मोहनलाल वर्मा, जयपुर, डॉ. उर्वशी उपाध्याय, प्रयाग, डॉ. शैल चन्द्रा रायपुर, डॉ हेमलता साहू, अम्बिकापुर, डॉ. कविता रायजादा आगरा, श्री जी.डी. अग्रवाल, इन्दौर, श्रीमती अमृता अवस्थी इन्दौर, डॉ. दर्शनसिंह रावत उदयपुर, श्रीमती प्रभा बैरागी उज्जैन, श्री सुन्दरलाल जोशी ‘सूरज‘ नागदा, श्रीमती रागिनी शर्मा राऊ, डॉ. संगीता पाल कच्छ,  डॉ. सरिता शुक्ला लखनऊ, श्रीमती तुलिका सेठ गाजियाबाद, श्रीमती दिव्या मेहरा कोटा, श्रीमती तरूणा पुन्दीर दिल्ली, डॉ. शिवा लोहारिया जयपुर, सुश्री खुशबुसिंह, रायपुर, डॉ भेरूलाल मालवीय, डॉ श्वेता पंड्या, सुरेश पाटीदार, विजय शर्मा आदि सहित देश के विभिन्न राज्यों के प्रतिभागी, साहित्यकार और शोधकर्ता उपस्थित रहे।




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