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लघुकथा - मैं भी सिपाही : नीरज त्यागी

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          दादा जी इस कोरोना काल में हमने तो कोई भी देश के सिपाही की तरह काम नहीं किया और दूसरी तरफ हमारी सेना बॉर्डर पर दिन रात हमारे लिए काम करती है। 14 साल के राहुल ने बड़ी मासूमियत से यह सवाल अपने दादा जी से पूछा। राहुल के दादा जी ने बडी ही समझदारी से राहुल को समझाते हुए कहाँ कि बेटा बेशक हम सभी लोग घर पर रहे है। लेकिन कोरोना काल में हम सभी ने एक सिपाही की तरह ही काम किया है।


          राहुल ने अचंभे से अपने दादा जी से पूछा कि दादा जी हम तो घर में थे, फिर हमने ऐसा कब किया। दादा जी कहते है, बेटा तुम्हारा बड़ा भाई जो कि एक व्यापारी है उसने इस समय में अपना काम बंद कर घर में रहना उचित समझा क्योंकि गलत तरीकों से नकली सैनिटाइजर बनाकर अगर वह कुछ समय के लिए ज्यादा पैसा कमा भी लेता।लेकिन वह समाज के लिए एक बड़ा ही निंदनीय काम होता इसलिए तुम्हारा भाई भी एक सिपाही है जिसने घर में  रहकर बिना किसी को केमिकल नुकसान पहुचाये अपना समय व्यतीत किया।



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          वहीं तुम्हारी बडी बहन जो फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर रही है। उसने इस समय में घर पर रहकर 700-800 मास्क बनाकर समाज के जरूरतमंद लोगों को बांटे . एक तरीके से उसने भी भारत के लोगों के लिए एक सिपाही का ही काम किया है। तुम्हारी माँ ने भी समय-समय पर आसपास के कुछ गरीबों को खाना खिला कर उन्हें भूख से मरने से बचाया इसलिए उसने भी कहीं ना कहीं एक सिपाही का काम किया है। 



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          अरे तो दादा जी अब तो आप और हम ही रह गए जिन्होंने कोई भी काम देश के लिए नही किया। तभी दादा जी ने राहुल को बताया ऐसा नहीं है बेटा, मैं अपनी इस उम्र में बिना मतलब बाहर ना घूम कर घर में रहा और समय-समय पर अपना ध्यान करता रहा और तुमने भी इस समय में अपने खेलकूद का त्याग कर दिया इसलिए तुमने भी एक सिपाही का ही काम किया है क्योंकि तुम्हे ऐसा करते देख तुम्हारे सभी दोस्त भी घर में ही रह रहे है। अब राहुल अपने दादा जी की बात से संतुष्ट हो गया था।



नीरज त्यागी
ग़ाज़ियाबाद ( उत्तर प्रदेश ).


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