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हरियाले आँचल का हरकारा हरीश निगम – सम्पादक डॉ. शैलेंद्रकुमार शर्मा

मालवी कविता के प्रतिनिधि स्वर को सहेजती पुस्तक : भूमिका से 


समकालीन भारतीय कविता को लेकर प्रायः यह चिंतातुर स्वर सुनने में आता है कि कविता लोक सामान्य से दूर होती जा रही है। इसके पीछे एक प्रमुख कारण रहा है कि कथ्य, विचार और भाषा - सभी स्तरों पर कविता का लोक, लोक कविता या यूँ कहें समूची लोकधारा से परे होता जा रहा है। इस विलगाव के रहते कथित शिष्ट साहित्य में जटिलता और रूपवादी रुझान उभार पर हैं। देश के विभिन्न अंचलों की बोलियों में रची जा रहीं कविताएँ इस तरह के संकटों से प्रायः मुक्त रही हैं। अन्य आंचलिक बोलियों की तरह भारत के हृदय प्रदेश मालवा की सुगंध और मार्दव को समेटे मालवी की समकालीन कविता का यहाँ की भूमि, जन और संस्कृति से गहरा रिश्ता है, जो उसे वैशिष्ट्य देता है।

 

मालवी के स्तरीय काव्य मंचों की जो तस्वीरें मेरे मनोमस्तिष्क पर अंकित हैं, उसके सबसे आभामय चेहरों में एक हैं - श्री हरीश निगम (3 मई 1928)। मालव माटी से जुड़ी उनकी सरस अभिव्यक्तियाँ, कर्ण मधुर आवाज, लयपूर्ण गायकी और जीवन के सामान्य से सामान्य क्रियाकलापों और दृश्यों में कविता के कथ्य को खोज लेने की उनकी जन्मजात क्षमता - यह सब मुझे निरंतर आकृष्ट करते रहे हैं। प्रायः समस्त मालवी प्रेमियों की तरह मैं भी उनका श्रोता और दर्शक पहले रहा हूँ, पाठक बाद में। तब से लेकर अब तक लोक मन में उनकी गहरी प्रतिष्ठा को मैंने देखा - महसूस किया है। उनकी छवि लोक जीवन के अत्यंत समर्थ और भावुक हृदय कवि के रूप में लोकमानस में अंकित है। मालवी कविता के प्रमुख स्तम्भ श्री हरीश निगम की चर्चित काव्य कृतियाँ हैं - कुसुम कुंज (1958), हरियालो आंचल (1961 एवं 1980), हिरना सांवली (1982), अपरंच (2004) आदि। उन्होंने संस्कृत - हिंदी की अनेक कृतियों के मालवी रूपांतर किए, जिनमें प्रमुख हैं- भास का स्वप्नवासवदत्ता (सपना में रानी), शूद्रक का मृच्छकटिक (गारा की गाड़ी), तुलसी के रामचरितमानस का नाट्य रूपांतर लोकमानस राम आदि। लोक संस्कृति पर केंद्रित पत्रिका सांझी के संपादक के रूप में उन्होंने अनेक विशेषांक निकाले, जिनमें प्रमुख हैं - भर्तृहरि विशेषांक, तुलसी विशेषांक, लोक संस्कृति विशेषांक, लोक कथा विशेषांक, भेराजी विशेषांक, तुलसी पंचशती विशेषांक, सिंहस्थ विशेषांक आदि।

 

श्री निगम के काव्य का स्वाभाविक स्वर शृंगार और हास्य - व्यंग्य का रहा है, जिसमें उन्होंने मालवा के आंतरिक राग और उल्लास को काव्यमय निष्पत्ति दी है। उनका यह स्वर एक सजग कवि के रूप में समय-समय पर परिवर्तित - विस्तारित भी होता रहा। चीन या पाकिस्तान से युद्ध का दौर रहा हो या श्रम और निर्माण की नई तस्वीरें गढ़ने का वक्त, कविवर श्री निगम उत्कट चेतनाशीलता के साथ अपने युग का नमक अदा करते रहे। कवि और आस्वादक के बीच बढ़ती संवादहीनता के दौर में भी उन्होंने अपने लोकधर्मी काव्य के माध्यम से साहित्य के लोकमंगल विधान और कांतासम्मित उपदेश जैसे प्रयोजनों को सिद्ध कर दिखाया। 

 

श्री हरीश निगम लोक मन और लोक छवि के रचनाकार हैं। इसलिए उनके काव्य का वैशिष्ट्य सहज और सामान्य हो जाने में है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार सच्चा कवि वह है, जिसे लोक हृदय की पहचान हो। श्री निगम ऐसे ही कवि हैं, जिन्होंने लोक हृदय के अपार एवं अद्भुत सागर का अवगाहन किया है और उसकी अतल गहराइयों से शब्दार्थ एवं संवेदना रूपी रत्न लाकर साहित्य जगत् को सोपे हैं। कवि की चिंता लोक की चिंता है और कवि का सुख लोक का सुख। यही वजह है कि श्री निगम की कविता की परिव्याप्ति में लोक जीवन के हास – अश्रु, उल्लास - संघर्ष, प्रेम – विरह - सभी कुछ समाहित हैं, वही राष्ट्र जीवन की समस्याएँ भी अनछुई नहीं रही हैं। श्री निगम का मालवा के लोक जीवन से तादात्म्य संबंध है। इसी लोक जीवन से उन्होंने शब्दों का चयन किया है, बिंबों और प्रतीकों को आत्मसात किया है और उसी से छंद और लय प्राप्त किए हैं। उनकी कविताएं आधुनिक होने के बावजूद वाचिक परंपरा से गहरे जुड़ी हैं। 

 

प्रसिद्ध रचना हरियालो आँचल में मालवा की रंगत को उन्होंने कुछ इस तरह शब्दों में ढाला है: 

दिल्ली तो देखी ली रानी, म्हारे साते चाल वो।

भारत माता का हिरदा में जड्यो रतन सो मालवो।

 

मालवा सहित मध्यप्रदेश की लोक परम्पराएँ यहाँ पूरी धज के साथ उतरती हैं :

आल्हा - उदल, ताल, ठुमरी, नौटंकी और ब्रह्मानंद। 

गरबा, माच, राम की लीला हुइरिया हे स्वर्गीय आनंद। 

चंद्रसखी का भाव गीत में बाजे कितरा साज वो 

नानी बई का मामेरा में बाजे कितरा साज वो। 

रामदेव को ब्याव गवई रियो, भर्यो हुओ चौपाल वो 

भारत माता का हिरदा में जड्यो रतन सो मालवो।

  

इस कविता को पद्मभूषण पं सूर्यनारायण व्यास ने मालवा की जीवती - जागती झाँकी कहा है :  मेघदूत में जिस तरा हर जगे को वर्णन उना स्थान की खास विशेषता के अपने सामने लई दे है। उनी तरेज हरीश जी की कविता तीर्थ यात्रा में अपना साथ लई जावे हे  प्रत्येक स्थान का वर्णन सरस, मनोहारी और सजीव बनी गयो हे। फिर मालवी को अपनो मीठोपन  ऊ में दूध में शक्कर की तरे घुली मिली के और भी रसमय बनई दियो हे।  पूरी कविता मालव प्रदेश की जीवती जागती झांकी है।

 

उनकी एक प्रसिद्ध रचना है जिसमें उन्होंने ग्राम बाला के सौंदर्य और गतिमयता को ध्वनि - संगीत और प्रकृति के हृदयग्राही वातावरण के साथ एक रूप कर दिया है: 

 

गोरड़ी चले मन मोरड़ी चले

रुनक - झुनक बिछिया पे ताल है बजे,

सांवरा की बंसरी पर ख्याल है बजे।

दिवला से बात मिले, तरुवर से पात मिले,

छलिया को प्यार देख, आज है छले, गोरड़ी चले।

 

आजादी के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था आई और पुरानी परिपाटी समाप्त होने लगी। शोषण और दमन के प्रतीक ढहने लगे, तब उन्होंने जागीरदारी प्रथा पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी लिखी : 

 

जागीरदार की गयी जागीरी, गयो मूँछ को ताव

अब पड़ेगा मालूम ठाकर लूण, तेल, लकड़ी का भाव।

मोटा-मोटा पोत्या बाँधा, कम्मर में खूँसी तलवार,

छोरा-छोरी खाए जलेबियाँ, गिरवे है आखो घर बार। 

 


डॉ शैलेंद्रकुमार शर्मा की पुस्तक हरियाले आँचल का हरकारा हरीश निगम

 

मालवी कवि श्री हरीश निगम इस देश के हरियाले आँचल अर्थात् मालवा के प्रतिनिधि कवि हैं। उन्होंने हरियालो आँचल नाम से एक सुदीर्घ कविता लिखी है, जो देश भर में बहुचर्चित - बहुप्रशंसित रही है। इस कृति में उन्होंने कालिदास के मेघदूत की शृंखला में नई प्रयोगधर्मिता के साथ मालवा की छवि को कल्पनाकुशल ढंग से अंकित किया है। यह छवि मात्र नैसर्गिक या सांस्कृतिक ही नहीं है, उसमें बहुत सारे आयाम अनायास ही समाहित हो गए हैं। इन सारे आयामों को कवि ने एक हरकारे (संदेशवाहक) के रूप में देशवासियों तक संप्रेषित करने के लिए समर्थ प्रयास किया। इसके अतिरिक्त अन्य गीत और कविताओं के माध्यम से भी उन्होंने स्वतंत्र भारत के संवर्धन, सुरक्षा, सद्भाव और सुसंगति के लिए भी जन - जन तक सरस संदेश पहुंचाए हैं, हरियाली आंचल के कर्मनिष्ठ हरकारा बनकर। उनके हरकारा रूप में कालिदास से लेकर कबीर तक और निराला से लेकर नवीन तक अनेक संदेशदाता कवियों की छवियों को महसूस किया जा सकता है।

 

भारत के लोक सांस्कृतिक परिदृश्य को देखें तो मालवी लोक साहित्य एवं संस्कृति की उत्कृष्टता पद्मभूषण पंडित सूर्यनारायण व्यास, डॉ श्याम परमार, डॉ चिंतामणि उपाध्याय, डॉ बसंतीलाल बम, डॉ प्रह्लादचंद्र जोशी आदि के व्यापक प्रयत्नों से स्थापित तथ्य बन गई है। इधर मालवी की नई रचनाधर्मिता के मूल्यांकन - समीक्षण का अभाव सुधीजनों को खटकता रहा। इस दृष्टि से मालवी के प्रतिनिधि कवि श्री हरीश निगम के विविधायामी व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर पुस्तक की योजना तैयार हुई, जो डॉ शैलेंद्रकुमार शर्मा द्वारा संपादित पुस्तक हरियाले आंचल का हरकारा हरीश निगम के रूप में आपके सम्मुख है।

 

पुस्तक में पद्मभूषण सूर्यनारायण व्यास, पद्मभूषण डॉ शिवमंगलसिंह सुमन, श्री गोपालदास नीरज, सुल्तान मामा, डॉ चिंतामणि उपाध्याय, श्री बालकवि बैरागी, श्री मदनमोहन व्यास, डॉ शिव शर्मा, डॉ प्रभातकुमार भट्टाचार्य, श्री बटुक चतुर्वेदी, प्रो कलानिधि चंचल, डॉ बसंतीलाल बम, डॉ श्यामसुंदर निगम, आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी, डॉ शिवसहाय पाठक, आचार्य श्री निवास रथ, डॉ मोहन गुप्त आदि की टिप्पणियाँ और संस्मरण संकलित हैं।

 

सुधी साहित्यकार डॉ प्रहलादचंद्र जोशी, डॉ शिवकुमार मधुर, श्री नटवरलाल स्नेही, श्री राजशेखर व्यास, श्री रामरतन ज्वेल, श्री हरिनारायण व्यास, डॉ भगवतीलाल राजपुरोहित, श्री मोहन सोनी, डॉ शिव चौरसिया, डॉ विष्णु भटनागर, श्री नरहरि पटेल, श्री चंद्रशेखर दुबे, श्री ललितनारायण उपाध्याय, प्रो हरीश प्रधान, अशोक वक्त, डॉ पूरन सहगल, डॉ विनय कुमार पाठक, डॉ भगीरथ बड़ोले, डॉ शैलेंद्रकुमार शर्मा, श्री बसंत निरगुणे,  श्री नर्मदाप्रसाद उपाध्याय, डॉ जगदीशचंद्र शर्मा, डॉ हरीशकुमार सिंह, श्री वेद हिमांशु, डॉ रश्मिकांत व्यास, डॉ विलास गुप्ते, श्री झलक निगम, डॉ विवेक चौरसिया, श्रीमती उर्मिला निरखे, श्रीमती जयश्री भटनागर, डॉ राजी अशोक, श्रीमती मंजू निगम, श्री प्रदीप बैस, सीमा निगम आदि के आलेख, संस्मरण एवं टिप्पणियां इस पुस्तक में समाहित हैं। 

 


- प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा

हरियाले आँचल का हरकारा हरीश निगम

संपादक : डॉ. शैलेंद्रकुमार शर्मा

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