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देवनारायण जी ने प्राकृतिक और सांस्कृतिक संक्रमण को रोका

राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना के तत्वावधान में अंतरराष्ट्रीय आभासी संगोष्ठी का आयोजन किया गया ।  विषय- 'लोक देवता श्री देवनारायण प्रकृति , प्राणी और संस्कृति के संदर्भ में'  डॉ.देवनारायण गुर्जर मुख्य वक्ता के रूप में अपना मंतव्य दे रहे थे । उन्होंने आगे कहा,  देव ज्योति द्वारा हम देव चेतना यात्रा के माध्यम से  सामाजिक समरसता ,  जन जागरण का कार्य कर सकते हैं।  भगवान देवनारायण जी के आदर्श पर चलकर वृक्षारोपण करके,  आयुर्वेद को मजबूत बना सकते हैं।

विशिषट वक्ता मोहनलाल वर्मा , जयपुर ने  प्रस्तावना में कहा कि- भगवान देवनारायण का जन्म माघ मास की सप्तमी को हुआ।  इससे पहले रथसप्तमी और सूर्य सप्तमी के रूप में इस दिन को मनाया जाता रहा है । साडू की भक्ति के वशीभूत,  स्त्री धर्म की रक्षा और मातृ धर्म की रक्षा के लिए एवं धर्म उद्धार के लिए भगवान ने जन्म लिया और  भगवान की पूजा ईटों के श्याम के रूप में होती है। भगवान देवनारायण  के अनुसार चरित्र निर्माण के लिए  व्यक्तित्व का विकास करना होगा,  भगवान ने सभी को समान रूप से पूजा का अधिकार दिया और  प्रकृति के संतुलन के लिए कार्य किया । 

विशिष्ट अतिथि बी.के. शर्मा, अध्यक्ष,  राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना, उज्जैन ने कहा कि- भगवान देवनारायण ने   गीता में सातवें अध्याय में कृष्ण ने  पराशक्ति का वर्णन किया है , उसके आठ स्वरूप हैं,  पांच तत्वों के बाद मन, बुद्धि , अहंकार में सब मिलकर अष्टधातु पराशक्ति बन जाती है। मन, बुद्धि, अहंकार को सहज रूप से जोड़ने का  कार्य किया । हम भी राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना में विचारों के माध्यम से व्यक्ति को जगाने का कार्य करते हैं और लता जी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि- हमारे जीवन में जब लय होती है तो,  हमारा जीवन संतुलित होता है। जहां लय नहीं वहां प्रलय है । इसलिए संगीत का विशेष स्थान है ।विशिष्ट अतिथि डॉ.हरिसिंह पाल,  नई दिल्ली ने कहा कि- देवनारायण जी ने आतताइयों का विनाश किया । सामाजिक  संगठन को बनाया ।एकता की भावना स्थापित की । भारतीय समाज को अत्याचार,  अनाचार , कदाचार से लड़ने के लिए  लोक साहित्य को संरक्षित किया।

मुख्य अतिथि प्रो.शैलेंद्र कुमार शर्मा, हिंदी विभागाध्यक्ष,  विक्रम विश्वविद्यालय,  उज्जैन ने कहा कि- देवनारायण जी से जुड़ना एक व्यापक चेतना से जुड़ना है।  उनकी सूक्ष्म चेतना सभी में है। वे आज जागृत देवता हैं।  व्यक्ति की पुकार सुनकर आ जाते हैं और भील , शहरिया आदि लोग भी उनकी पूजा करते हैं । उन्होंने वीरान जंगलों में पशुपालन की रक्षा की।  ईमानदारी और सच्चाई पर चलने की कोशिश की और मातृभूमि की रक्षा की । कहा कि , इन से संबंधित साहित्य को सहेजा जाना चाहिऐ राकेश छोकर जी ने कहा कि - भगवान ने प्रेम -भक्ति के रूप में सांसारिक जीवन को किस तरह से जिया जाए बताया और भारत भूमि पर संक्रमण काल में चेतन  प्रदान की,  पशु भाव से मुक्त किया। 

आयोजक डॉ. प्रभु चौधरी ,  महासचिव, उज्जैन ने कहा कि - शादियों के लिए इनका आशीर्वाद प्राप्त करने जाते हैं और इनकी पूजा  नीम पत्तियो से होती है । अगाध विश्वास व्यक्त करते हुए दूध के तालों का वर्णन किया । लता जी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अटल बिहारी वाजपेई जी को याद किया।डॉ.शहावुद्दीन  नियाज मोहम्मद शेख , राष्ट्रीय संयोजक , पुणे , महाराष्ट्र ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा- लता जी स्वर साम्राज्ञी  थीं।  उन्होंने 36 से ज्यादा भाषाओं में गीत गाकर राष्ट्र की सेवा की । आज राष्ट्र मैं शोक व्याप्त है।

विशिष्ट  अतिथि गोपाल बघेल 'मधु',  कनाडा से जुड़े उन्होंने कहा कि- देवनारायण भगवान ने नीम की महत्ता को बताया और आत्मा में परमात्मा का वास होता है,  परमात्मा के सारे गुण आत्मा में होते हैं, हमें उन गुणों की वृद्धि करना चाहिए । कविता सुनाई।  लता जी को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उनका जाना परमात्मा की इच्छा है।

कार्यक्रम का उत्तम संचालन डॉ.रश्मि चौबे,  मुख्य महासचिव महिला इकाई , गाजियाबाद ने किया और स्वागत भाषण डॉ. प्रभु चौधरी महासचिव जी ने दिया। आभार मोहनलाल वर्मा जी ने व्यक्त किया।  कार्यक्रम के अंतर्गत सुरेखा मंत्री आदि अन्य अनेक गणमान्य उपस्थित रहे।संगोष्ठी के समापन अवसर पर स्वर साम्रागी लता जी को मोन आदरांजलि दी ।।

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