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■ मध्यप्रदेश मंत्रिमंडल विस्तार में भाजपा नेताओं के नामों पर मंथन जारी ■ भाजपा के 18 मंत्रियों के बनने की संभावना, 3 बने, 15 बनेंगे ■ सिंधिया समर्थक व निर्दलीय विधायकों सहित 12 के मंत्री बनने की संभावना, 2 मंत्री बने, 10 बनेंगे


भोपाल, रविवार, 03 मई, 2020 । मध्यप्रदेश में इन दिनों भाजपा की शिवराज सरकार के सामने दो बड़े संकट हैं, एक तो #Covid19 कोरोना संक्रमण और दूसरा मंत्रिपरिषद का विस्तार । दोनों ही संकट ऐसे हैं, जिनसे आसानी से पार नहीं पाया जा सकता। कोरोना संक्रमण से तो डॉक्टर्स, प्रशासन, समाजसेवी, क्षेत्रीय नागरिक और अफसर निपट लेंगे । पर, मंत्री न बन पाने से चूके विधायक जो रूठकर संकट खड़ा करेंगे, उसका इलाज कोरोना से कहीं ज्यादा मुश्किल है । यही कारण है कि, इस बार मंत्रिपरिषद विस्तार आसान नहीं है । मंत्री पद का राजनीतिक आश्वासन देने हेतु राजनीतिक समीकरण के चलते शिवराज सिंह चौहान अभी केवल मंत्री पद के लिए 30 लोगों का ही चयन करेंगे, अपनी मंत्रिपरिषद के लिए, जिसमे से 5 को मंत्री बनाया जा चुका है। अब जो 25 जगह बची है, उसमें 10 सीट ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थकों, सपा, बसपा एवं निर्दलीय विधायक का मंत्री पद रिज़र्व संभावित है, क्योंकि ऐसा ही वादा देकर, शिवराज की सरकार बनी है । अगर, शिवराज सरकार वादा निभाने में फेल होती हैं तो सरकार जाने के साथ ही जनाधार भी खिसक सकता है । वह इसलिए कि, सभी ने सिंधिया समर्थक तात्कालिक विधायक तथा सपा, बसपा व निर्दलीय विधायकों के वीडियो सोशल मीडिया पर देखें हैं, जिसमे उन्होंने क्या क्या कहा, सभी को पता है । अंत में जो 15 मंत्री पद की जगह बचती है, उसके लिए भाजपा में ही तीन दर्जन दावेदार हैं और सब ख़म ठोंककर बैठे हैं। इस खेमेबंदी में मुख्यमंत्री के लिए संतुलन बनाना आसान नहीं लग रहा ।



शिवराजसिंह के सामने सिंधिया के 8 लोगों को तथा सपा, बसपा, व निर्दलीय विधायक सहित 04 को मंत्री बनाना एक तरह से राजनीतिक बाध्यता है । ये संख्या किसी भी स्थिति में कम होने के कोई आसार नहीं है, क्योंकि---- प्रदेश में भाजपा के सरकार में आने का आधार यही सिंधिया समर्थक हैं। यदि 25 मंत्री (जिसकी संभावना नहीं) शपथ लेते हैं, तो भाजपा के 15 विधायकों को ही मंत्रिपरिषद में जगह मिलेगी। लेकिन, इन 15 में किसे शामिल किया जाएगा, ये ऐसा यक्ष प्रश्न है जिसका जवाब आसान नहीं है। भाजपा सरकार के सामने ये ऐसा पेंच है, जो परेशानी का कारण भी बन सकता है। कई बड़े नेता ऐसे हैं, जिन्हें किनारे करना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा । कहा जा रहा है कि, भाजपा अपने कुछ बड़े चेहरों को एडजस्ट करने के लिए सिंधिया समर्थकों की संख्या में कुछ काटछांट करने की कोशिश में है ...... किंतु, ये ज्योतिरादित्य सिंधिया को मंजूर नहीं है । 🤔 सूत्र बताते हैं कि, इस मुद्दे पर सिंधिया ने अपना पक्ष गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को बता भी दिया।



ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा की राजनीति को बहुत अच्छी तरह जानते हैं। बदली परिस्थितियों में कब, कौनसी चाल चलना है, उन्हें ये भी पता है। निश्चित रूप से भाजपा का दामन थामने से पहले उन्होंने ऐसी सारी संभावनाओं को टटोल भी लिया होगा। फिलहाल सिंधिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने 22 लोगों को उपचुनाव में जितवाना है। क्योंकि, उनकी जीत पर ही शिवराज सरकार और खुद उनका राजनीतिक भविष्य टिका है। इस बार के मंत्रिमंडल विस्तार में उनके समर्थकों को जगह मिलेगी, तभी उनके लिए चुनाव जीतना आसान होगा । इस बात को जितना सिंधिया समझते हैं, उतना भाजपा संगठन भी । ऐसे में सारा त्याग भाजपा के उन नामचीन विधायकों को करना होगा, जो कुर्सी की आस लगाए बैठे थे।



भाजपा नेताओं का मानना है कि, मई के अंत तक राज्यसभा चुनाव के लिए मतदान होने के आसार हैं। इसलिए भी मंत्रिमंडल विस्तार जरूरी है। मुख्यमंत्री की कोशिश है कि कोरोना संक्रमण की स्थिति में नए मंत्रियों को शपथ दिलाकर उन्हें जिलों का दायित्व सौंप दिया जाए । ऐसा करने से मुख्यमंत्री का काम थोड़ा बंट सकेगा और नए मंत्री भी अपनी इमेज बना सकेंगे । 😊 सबसे ज्यादा फ़ायदा सिंधिया समर्थकों को होगा, जिन्हें 4 महीने बाद चुनाव लड़ना है। सिंधिया के 17 समर्थक ग्वालियर-चम्बल संभाग से हैं। तीन मालवा से एक बुंदेलखंड से और एक विंध्य से है। अभी मालवा (सांवेर) से तुलसी सिलावट और बुंदेलखंड (सुरखी) से गोविंद राजपूत मंत्री बने हैं। अब इमरती देवी, महेंद्र सिंह सिसौदिया, प्रद्युमन सिंह तोमर और प्रभुराम चौधरी का मंत्री बनना पक्का है। जबकि, अन्य चार में हरदीपसिंह डंग, एदलसिंह कंसाना, बिसाहूलाल सिंह और राजवर्धन सिंह दत्तीगाँव को मंत्री बनाए जाने की संभावना है साथ ही प्रदीप जायसवाल (गुड्डा) व बसपा विधायक श्रीमती रामबाई गोविंद सिंह (पथरिया-जिला-दमोह) को भाजपा नेताओं ने मंत्री पद का आश्वासन दिया था..... लेकिन, अभी बहुत कुछ होना बाकी है।



सिंधिया समर्थकों और सपा, बसपा और निर्दलीयों के मामले में ज्यादा पेंच नहीं है । सबसे ज्यादा मुश्किल भाजपा में है जहाँ पार्टी सबको साधकर रखने की कोशिश कर रही है क्योंकि, ऐसे में जरा सी चूक उपचुनाव में भारी पड़ सकती है, जो भाजपा नहीं चाहती । भाजपा को अपने नेताओं को संतुष्ट करने के साथ ही साथ उन्हें उपचुनाव में मदद के लिए भी तैयार करना है । जैसे कि.... गोविंद राजपूत सुरखी से चुनाव तभी जीत सकते हैं, जब गोपाल भार्गव और भूपेंद्र सिंह कमर कस लें। अभी भाजपा के जिन नेताओं के नाम चर्चा में आए हैं, वे भूपेंद्र सिंह, पारस चन्द्र जैन, गोपाल भार्गव, राजेंद्र शुक्ल , रामपाल सिंह, यशोधरा राजे सिंधिया, संजय पाठक, विश्वास सारंग, अरविंद भदौरिया, विजय शाह, जगदीश देवड़ा, हरिशंकर खटीक, प्रदीप लारिया, रमेश मेंदोला, गोपीलाल जाटव और डॉ सीतासरन शर्मा हैं। नाम तो सुरेंद्र पटवा का भी सुना जा रहा है, पर वे चैक बाउंस के मामले में फंसे हैं। राज्यपाल को दी जाने वाली अंतिम सूची के बाद जो राजनीतिक उथल-पुथल मचेगी, उसका अंदाजा लगाना अभी मुश्किल है।



✍ राधेश्याम चौऋषिया
सम्पादक : बेख़बरों की खबर


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