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लोक एवं जनजातीय संस्कृति का संरक्षण इस धरती के हित में है

लोक एवं जनजातीय संस्कृति का संरक्षण इस धरती के हित में है



 लोक एवं जनजातीय साहित्य और संस्कृति : सार्वभौमिक मानव मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी संपन्न




संजा लोकोत्सव 2020 के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी में हुई दुनिया के कई देशों की लोक संस्कृति पर चर्चा




देश की प्रतिष्ठित संस्था प्रतिकल्पा सांस्कृतिक संस्था, उज्जैन द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित संजा लोकोत्सव के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन रविवार को किया गया। यह संगोष्ठी लोक एवं जनजातीय साहित्य और संस्कृति : सार्वभौमिक जीवन मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में अभिकेंद्रित थी। संगोष्ठी के प्रमुख अतिथि प्रसिद्ध प्रवासी साहित्यकार एवं अनुवादक श्री सुरेश चंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे थे। संगोष्ठी की अध्यक्षता चौधरी चरणसिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के हिंदी विभागाध्यक्ष एवं आईसीसीआर हिंदी चेयर, सुसु, चीन के पूर्व आचार्य डॉ नवीनचंद्र लोहनी ने की। प्रमुख वक्ता विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलानुशासक , हिंदी विभागाध्यक्ष एवं लोक संस्कृतिविद् प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा तथा विशिष्ट अतिथि महात्मा गांधी संस्थान, मॉरीशस की वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ अलका धनपत एवं जनजातीय संस्कृति की अध्येता डॉ हीरा मीणा, नई दिल्ली थीं। संस्था की निदेशक डॉ पल्लवी किशन ने संजा लोकोत्सव एवं संगोष्ठी की संकल्पना और रूपरेखा पर प्रकाश डाला।


मुख्य अतिथि प्रवासी साहित्यकार एवं अनुवादक श्री सुरेश चंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे ने संबोधित करते हुए कहा कि नॉर्वे में जनजातीय समुदाय के लोग भी बड़ी संख्या में रहते हैं। उत्तरी नॉर्वे में रहने वाले सामी जाति के लोगों की विशिष्ट भाषा है। सामी लोग एशियाई मूल के हैं। नॉर्वे और रूस के उत्तरी क्षेत्र के जनजातीय समुदाय के लोगों ने देशों की राजनीतिक दूरी के बावजूद सरहदों के आर पार मानवीय रिश्ता बनाया हुआ है। उनका गहरा रिश्ता प्रकृति और जीव - जंतुओं के साथ बना हुआ है। सामी लोक संगीत आज भी जीवित है।


कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. नवीन चंद्र लोहनी ने कहा कि उत्तराखंड एवं कौरवी क्षेत्र में अनेक लोक और जनजातीय समुदायों के लोग रहते हैं, जिनकी विशिष्ट परम्पराएँ आज भी प्रासंगिक हैं। चीन में हक्का सहित कई जनजातीय समुदायों की संस्कृति के संरक्षण के लिए महत्त्वपूर्ण प्रयास किए जा रहे हैं। वहाँ की जनजातियों के प्राकृतिक वास स्थान को यूनेस्को ने विश्व की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में महत्त्व दिया है। चीन के दर्शन के अनुरूप लकड़ी के ये क्लस्टर बनाए गए हैं। चीन में अनेक प्रकार की चाय मिलती है, जिन्हें जनजातीय समुदाय के लोगों ने संरक्षित किया है। वहाँ की जनजातियां पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती हैं।



मुख्य वक्ता लोक संस्कृतिविद् प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि लोक एवं जनजातीय संस्कृति का संरक्षण और अंगीकार इस धरती के हित में है। मानवीय लोक संस्कृतियों में वैविध्य है, लेकिन वह अंतर बाहरी है। सभी को एक समान जीवन मूल्य आधार देते हैं। सत्य, शांति, अहिंसा, प्रेम, सह अस्तित्व और पर्यावरण संरक्षण जैसे सार्वभौमिक मानव मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं का संदेश लोक और जनजातीय संस्कृतियों से मिलता है। संजा जैसे लोक पर्व हमारे व्यावहारिक और ब्रह्मांडीय जीवन को जोड़ते हैं। यह लोक पर्व मनुष्य और प्रकृति के सह अस्तित्व और मानवीय रिश्तों की ऊष्मा के साथ इस धरती के स्त्री पक्ष के सम्मान का सन्देश देता है। हमारे प्राकृतिक संसाधन छीजते जा रहे हैं। परस्पर प्रेम, सद्भाव और समरसता का संसार संकट में है। ऐसे में लोक और जनजातीय संस्कृति के मूल्य, जीवन दृष्टि, संवेदना और जीवन शैली इन संकटों का मुकाबला करने की सामर्थ्य देते हैं।


महात्मा गांधी संस्थान, मॉरीशस की वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ अलका धनपत ने कहा कि मॉरीशस के लोग अपनी संस्कृति और भाषा की रक्षा के लिए चिंतित हैं। सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण के लिए मॉरीशस वासी निरन्तर प्रयासरत हैं। गौवंश के प्रति गहरी निष्ठा मॉरीशस वासियों में है। मॉरीशस के लोक समुदाय सिद्ध करते हैं कि श्रेष्ठ संस्कार जीवन भर बने रहते हैं। उनकी जड़ें बहुत गहरी हैं। आज भी वहाँ पदयात्रा करते हुए कावड़ यात्रा निकाली जाती है। वर्षा की कामना के लिए भोजपुरी लोकगीत गाए जाते हैं। विवाह के मौके पर हरदी गीत गाए जाते हैं। मॉरीशस के लोगों में लोक संस्कृति अंदर तक रची - बसी है।



जनजातीय संस्कृति की अध्यक्षता डॉ. हीरा मीणा, नई दिल्ली ने कहा कि जनजातीय समुदायों ने सदियों से प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण किया हुआ है। वे मानते हैं कि पूर्वज प्रकृति की रक्षा करते हुए वह धरोहर हमें देकर जाते हैं। इसलिए पुरखों के प्रति श्रद्धा का भाव जनजातीय समुदायों की विशेषता है। वे पुरखों को याद करते हुए पक्षियों और जीवों को भी बुलाते हैं।


संस्था के अध्यक्ष श्री गुलाब सिंह यादव, सचिव कुमार किशन एवं निदेशक डॉ पल्लवी किशन ने वेब पटल पर अतिथियों का स्वागत किया।


संगोष्ठी का संचालन डॉ श्वेता पंड्या ने किया एवं आभार प्रदर्शन संस्था के अध्यक्ष श्री गुलाबसिंह यादव ने किया।



अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का जीवंत प्रसारण प्रतिकल्पा सांस्कृतिक संस्था, उज्जैन के फेसबुक पेज पर किया गया, जिसमें देश - विदेश के सैकड़ों लोक संस्कृतिप्रेमियों, विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और साहित्यकारों ने सहभागिता की।


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